Category Archives: अनुभव

सुपारी देना किसको कहते हैं और सुपारी के गुण और उसकी गाथा

सुपारी देना शब्द कहाँ से आया बहुत ढूँढ़ा कहीं मिला नहीं, वैसे हमें तो केवल इतना पता है कि सुपारी पान बीड़ा का एक अवयव है, परंतु यही सुपारी कब इस अलग रूप में आ गई, पता ही नहीं चला, खासकर फ़िल्मों और सीरियलों में बहुत सुनने को मिलता है कि फ़लाने की सुपारी दे दी, मतलब कि हत्या करने के लिये किसी को पैसे दिये गये ।
वैसे सुपारी तो हमारी संस्कृति का अंग है और सुपारी को पूजा में भी रखा जाता है। आखिरकार अपने पुराने जमाने वाले लोगों ने जिन्होंने सुपारी को खाने लायक समझा होगा, उनको दाद देनी होगी कि इतने कठोर फ़ल को भी खाने में और पूजा में प्रयुक्त किया, और सुपारी को खाने के लिये सरौते का भी अविष्कार किया, अब कहते हैं ना कि आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है।
सुपारी के बहुत सारे औषधीय उपयोग भी हैं –
 मुंह के रोग : 10-10 ग्राम बड़ी इलायची और सुपारी को जलाकर मुंह में छिड़कने से मुंह के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
और भी उपयोग होंगे परंतु और याद नहीं हैं, स्वाद बिल्कुल पानी जैसा कि कोई स्वाद नहीं परंतु हाँ कुछ मिला लो तो इसका स्वाद बेहतरीन है तभी तो आजकल मीठी सुपारी मिलती है, परंतु वह भी प्रोसेस्ड होती है, उसे तो बिल्कुल खाना ही नहीं चाहिये।
सुपारी भी कई प्रकार की होती है, हमें तो बस इतना ही पता है कि सुपारी कच्ची भी होती है और पक्की भी या शायद भुनी हुई होती हो। सुपारी भी अलग अलग तरह में काटी जाती है, जैसे कि बोल्डर, चिप्स इत्यादि, अब सुपारी इतनी कठोर होती है कि हमें खाने में बहुत दिक्कत होती है और मसूढ़े भी छिल जाते हैं, तो हम चिप्स खाते थे परंतु अब यहाँ दक्षिण में भाई लोग बोल्डर ही देते हैं।
एक हमारे मित्र हैं जिनके केरल में समुद्रीय इलाके में खेत हैं वह भी सुपारी के, वहाँ सुपारी की ही खेती होती है और उनसे पता चला कि किसान को ज्यादा पैसा नहीं मिलता, सुपारी महँगी है और उसके पीछे कारण है बिचौलिये और सेठ लोग जो कि सुपारी खरीदते हैं।
सुपारी कहाँ से याद आई थी और उस पर इतना सारा लिख भी दिया, दरअसल कहीं से एक सुपारी खाने के लिये मिली थी जो कि पूजा के बाद की थी और उसे हमें ही खाना था, पहले तो इसी आस में जेब में पड़ी रही कि कभी हाथ से तोड़कर खा लेंगे । बहुत प्रयास किया हाथ से नहीं टूटी, फ़िर दाँत से तोड़ने की कोशिश की तो उसमें भी असफ़ल रहे और जल्दी ही समझ में आ गया सुपारी तो नहीं टूटेगी अपने दाँत जरूर टूट जायेंगे, फ़िर मूसल से तोड़ने की कोशिश की उसमें भी नाकाम। आखिरकार पान की दुकान पर जाकर सरौते से कटवाना पड़ी, पान वाले से पूछा कि सुपारी और किस तरीके से तोड़ी या काटी जा सकती है तो उसने बताया कि केवल सरौते से ही काटी जा सकती है, वह तो अच्छा हुआ कि हमने जितने उपाय किये थे वे नहीं बताये वरना सुपारी के ऊपर हमारे किये गये एक्सपीरियमेंट पर हँस हँस कर लोट पोट हो लेता। सोचा कि अपना ब्लॉग वो थोड़े ही पढ़ेगा तो यहीं लिख देते हैं।

गूगल क्रोम ब्राऊजर का वेब स्टोर (Web Store from Google Chrome in Browser)

गूगल क्रोम तो लगभग सभी उपयोग करते होंगे परंतु उसकी apps को बहुत ही कम लोग उपयोग करते होंगे। अभी दो दिन पहले प्रवीण पांडे जी की पोस्ट आयी थी संदेश और कोलाहल यहाँ पर ज्ञानदत्त पांडे जी की टिप्पणी थी फ़ीडली बढ़िया औजार है, गूगल रीडर से सिंक करने के लिये । और वहीं विषय से संबंधित एक टिप्पणी थी पूजा उपाध्याय की, ब्लॉग के एड्रेस के अंत में अगर /view लिख दिया जाये तो ब्लॉग सरल अवतार में मिलेगा । बस इन दो टिप्पणियों से बहुत कुछ सीखने को मिला ।
और हम जुट गये गूगल क्रोम को टटोलने में, खजाना छिपा हुआ था जरूरत थी तो केवल खंगालने की। बिल्कुल वैसे ही जैसे ईश्वर हृदय में बसा हुआ है पर हम ढूँढ़ते बाहर हैं ।
गूगल कोम ब्राऊजर खोला कर पहले ध्यान से देखा गया तो पाया कि नीचे मध्य में दो टैब दिये हुए हैं, हालांकि कुछ दिन पहले देखा था, परंतु ज्यादा दिमाग नहीं लगाकर छोड़ दिया गया था कि कभी और देखेंगे और हम यह खजाना देखने से चूक गये थे।
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यहाँ Most Visited एवं Apps टैब दे रखे हैं, जिसमें कि Most Visited में वह वैबसाईट के आईकॉन दिखाता है जो कि आप   ज्यादा घूमते हैं, जिससे नेविगेशन में आसानी होती है और आपको केवल एक क्लिक पर अपनी मनपसंदीदा वेबसाईट पर चले जाते हैं।  Apps में सबसे पहला आईकॉन दिखेगा Chrome web store, जैसे ही इस पर क्लिक करेंगे बस बहुत सारी एपलीकेशन्स का खजाना आपके सामने होगा।
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ऊपर दिये गये चित्र में देखिये पहला आईकॉन Chrome Web Store का है और आगे के आईकॉन जो एपलिकेशन मैंने अपने ब्राऊजर में संस्थापित कर रखी हैं। इन एपलिकेशन को संस्थापित करने से काम करने की गति में इजाफ़ा होता है और इससे बहुत ही ज्यादा सरलीकरण भी हो जाता है।
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ऊपर दिये गये चित्र में देखेंगे तो बायीं तरफ़ वर्गीकरण तालिका दे रखी है और दायें और उस वर्ग के एपलिकेशन्स दे रखे हैं। हमें तो बहुत सारे एपलिकेशन्स काम के मिले और उनसे हमारा काम भी बहुत आसान हो गया।
आप भी आजमाईये।

लिव-इन रिलेशनशिप मतलब बराबर का खर्चा

आजकल लिव-इन रिलेशनशिप का फ़ंडा कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है, अभी हाल ही में एक परिचित से बात हो रही थी, तो उसने बताया कि उसके साथ काम करने वाली एक लड़की से उसकी बात हो रही थी।
उस लड़की ने बताया कि वह पिछले दो साल से लिव-इन रिलेशन में रह रही है और साथ ही होस्टल का किराया भी भरती है, जब भी लड़की के घरवाले बैंगलोर मिलने को आते हैं, वह होस्टल चली जाती है और उनके वापिस जाते ही वह वापिस उस फ़्लैट में शिफ़्ट हो जाती है। तो उसने पूछा कि शादी क्यों नहीं कर लेते हो जब दो वर्षों से लिव-इन में रह रहे हो, उसका जबाब था कि जब जिंदगी बिना टेन्शन के चल रही है और अभी शादी की जरूरत भी महसूस नहीं हो रही तो शादी क्यों कर ली जाये।
फ़िर उससे पूछा कि खर्चा कैसे करते हो, तो वह बोली कि तुम दोस्त लोग कैसे फ़्लैट शेयर करके रहते हो और खर्चा बांटते हो बस वैसे ही हम अपना खर्चा बांटते हैं, हरेक खर्च में हम दोनों बराबर के हिस्सेदार होते हैं, शादी नहीं होने के बाबजूद शादीशुदा जिंदगी का लुत्फ़ उठाते हैं, घर के हर काम में भागीदारी करते हैं।
लड़का और लड़की दोनों उत्तर भारत के रहने वाले हैं, और दोनों ही संस्कारी परिवार से हैं। परंतु आजकल के खुलेपन में शायद अपनी मर्यादाओं को भुल गये लगते हैं, उनकी सोचने की दिशा बदल गई है।
हम तो यह सोचते हैं कि अगर लिव-इन में रहना जरूरी है तो घर वालों से पर्दा क्यों, जो भी करो खुलेआम करो । किसी से डरने की जरूरत ही क्या है ?

बिस्तर पर कैसे और किसके साथ नींद में होते हैं, नींद को कभी जाना है ?

बिस्तर पर लगभग गिरा ही था और नींद के आगोश में पूरी तरह से खो चुका था, चादर की वह सल वैसी ही रही, जैसी पहले थी, और बस वह सल के साथ बिस्तर पर ढ़ह चुका था। जब नींद आती है तो वह सोने की जगह नहीं देखती। एक समय था जब बिस्तर पर एक भी सल हो मजाल है, परंतु आज इतने वर्षों में जिंदगी के इतने सारे रंग और रास्ते देखने के बाद थकान इतनी बड़ चली है कि उसे उस सल का भी ध्यान नही रहा जिससे उसे हमेशा से चिढ़ रही है।
बचपन में उसने पढ़ा था कि भगवान राम या भरत अब याद नहीं, इतने नाजुक थे कि एक बार बिस्तर पर लंबा सा बाल पड़ा रह गया था तो उनके शरीर पर लाल रंग की रेखा उभर आई थी, खैर उभर तो इसलिये ही आई होगी कि वे भी भरपूर नींद के आगोश में थे। अगर तकलीफ़ होती तो उठकर बाल नहीं हटा देते।
इसलिये मानना है कि नींद जिंदगी का सबसे बड़ा नशा है, किसी के पास कितनी भी दौलत आ जाये परंतु वह बिना नींद के रह नहीं सकता, उसे नींद लेना बहुत जरूरी है।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बिस्तर पर तभी जाते हैं जब नींद आ रही होती है और बिस्तर पर लेटते ही नींद के आगोश में खो जाते हैं, हमारे हिसाब से तो वे बहुत ही खुशकिस्मत लोग होते हैं, क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि ऐसे लोग अपना पूरा काम निपटाने के बाद इतमिनान से चिंतन करके पूरी तरह सोने की मानसिक चेतना के साथ जाते हैं।
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो कि बिस्तर पर तो चले जाते हैं क्योंकि सोने का समय हो गया है, परंतु नींद उनकी आँखों से कोसों दूर होती है, तरह तरह के नायाब नुस्खे अपनाते हैं नींद बुलाने के लिये परंतु नींद है कि आने का नाम ही नहीं लेती, हमें ऐसा लगता है कि ऐसे लोग दो प्रकार के हो सकते हैं एक वे जिनके पास कोई काम नहीं होता और थकान नहीं होती और दूसरे वे जिनको आज और कल दोनों की बहुत ज्यादा चिंता रहती है और उसी चिंता में घुले जाते हैं।
कुछ लोग उसके जैसे होते हैं, जो कि काम के बोझ के मारे होते हैं जो मजदूरों की तरह काम करते हैं और घर के लिये निकलने पर पूरी नींद में होते हैं, ये काम को बेहतरीन तरीके से करते हैं, परंतु इनके पास काम इतना होता है कि खुद के लिये सोचने का समय ही नहीं होता बस ये सोचते हैं कि नींद लेकर शरीर को रिचार्ज कर लिया जाये और अगले दिन के लिये ऊर्जा इकठ्ठी कर ली जाये।
अब वह बोल रहा था कि कम से कम बिस्तर की सल तो निकाल कर सोयेगा, नहीं तो उसे रात में २ बजे उठकर वह सल हटाना पड़ती है, मैं सोच रहा था क्या नींद में भी इतना अनुशासन जरूरी है ?

प्रोड़क्टिव मेन अवर्स बर्बाद और आभिजात्य वर्ग की मानसिक मजदूरी

अभी दो दिनों से कार्यालय जा रहे हैं, नहीं तो घर से ही काम कर रहे थे। इन दो दिनों में आना जाना और कई लोगों से मिलना हुआ।

घर से काम करने में यह तो है कि घर पर परिवार को समय ज्यादा दे पाते हैं, परंतु काम करने में थोड़ी बहुत अड़चनें भी आती हैं, खैर हमेशा परिवार के साथ रहते हैं, और आने जाने का लगभग २ घंटे का समय भी बचता है, जो कि कहीं और निवेश कर दिया जाता है।

कल जब बस स्टॉप पर बस पकड़ने के लिये खड़े थे तो ऐसा लगा कि सदियाँ बीत गईं हैं सफ़र किये हुए, और बस का इंतजार और बस के इंतजार में खड़े लोग पता नहीं कितने सारे प्रोड़क्टिव मेन अवर्स बर्बाद हो रहे थे और हम कुछ कर नहीं सकते थे, केवल देख सकते थे। व परिवार को जो समय दिया जा सकता है, वह भी कम्यूटिंग में निकल जाता है।

कोई भाग रहा है कोई दौड़ रहा है, कोई मुस्करा रहा है कोई टेंशन में है, सबकी अपनी अपनी दुविधाएँ हैं तो सबके अपने अपने सुख दुख हैं।

रोजी रोटी जो न कराये वह कम है, एक लड़की अपने मित्र का एस.एम.एस. पढ़ पढ़कर दुखी हो रही है, उसके ब्वॉय फ़्रेंड ने एस.एम.एस. में कहा है कि मैं तुम्हारे लिये बहुत सारा समय निकाल सकता हूँ परंतु मेरी और भी प्रायोरिटीज हैं, प्लीज समझा करो और मुझसे ज्यादा एक्स्पेक्ट मत करो, मैं सोचने लगा कि वाह लड़के भी आजकल इतना साफ़ साफ़ मैसेज भेजने की हिम्मत रखते हैं।

नहीं तो हम तो सोचते थे कि केवल लड़कियाँ ही साफ़ साफ़ बोलती हैं 🙂 खैर जब लिफ़्ट के पास होते हैं तो सबके हाथों में मोबाईल देखते हैं, अधिकतर आई फ़ोन लिये दिखते हैं, तो अपने ऊपर कोफ़्त होती है कि अपन इतने आधुनिक क्यों ना हुए.. और जिनके पास ब्लैक बैरी है तो पता चल जाता है कि कंपनी ने दिया है कि बेटा २४ घंटे खाते पीते उठते जागते चलते फ़िरते काम करते रहो। इससे यह तो समझ में आ गया कि आई फ़ोन वाला वर्ग विलासिता भोगी हो सकता है और ब्लैक बैरी वाला अच्छे कपड़ों में मानसिक मजदूर।

अच्छा है कि अपन अभी इन दोनों वर्गों से दूर हैं, या भाग रहे हैं, पहले जब कंपनी लेपटॉप देती थी तो लगता था कि २४ घंटे मजदूरी के लिये दे रही है, परंतु धीरे धीरे अब समय बदल गया है और अब सबको ही लेपटॉप ही दिया जाता है, अब डेस्क्टॉप का जमाना लद गया।

खैर आभिजात्य वर्ग की मानसिक मजदूरी कितने लोग देख पाते होंगे पता नहीं, जो ब्लैकबैरी और लेपटॉप में उलझा रहता है।

माई फ़ाई वाई फ़ाई राऊटर डाटा कार्ड के लिये बेहतरीन उत्पाद (MiFi H1 wifi Router for Data Card review – an ultimate product)

बहुत दिनों से कोई ऐसा वाई फ़ाई राऊटर ढूँढ़ रहे थे जिससे हम अपने घर की वाई फ़ाई वाले लेपटॉप और गेजेट्स को जोड़ सकें। समस्या छोटी सी थी अगर हम फ़िक्सड लाईन का उपयोग कर रहे होते तो कोई भी वाई फ़ाई राऊटर लगा कर अपनी समस्या का समाधान कर सकते थे। और जिस घर में हम रहते हैं वहाँ कोई भी फ़िक्स्ड लाईन वाला कनेक्शन नहीं था, हमने एयरटेल और बीएसएनएल सबके दरवाजे खट खटखटाये पर कुछ नहीं हुआ तो हमने अलग से बाजार से डाटा कार्ड खरीद लिया जिसमें ताला भी नहीं लगा था जी हाँ अनलॉक्ड हुवाई का डाटा कार्ड जिसमें कोई सी भी सिम लगा सकते हैं, पहले टाटा डोकोमो की ३जी सर्विसेस का उपयोग कर रहे थे, परंतु डोकोमो में नेट की रफ़्तार लगातार नहीं मिलती थी, बहुत समस्या होती थी।
wifi router for data cardwifi router
परंतु बीएसएनएल ने यह समस्या खत्म कर दी, बीएसएनएल की ३जी सेवाएँ जबरदस्त हैं, अब डाटा कार्ड से तेज गति के इंटरनेट की समस्या का समाधान तो हो गया परंतु अब डाटा कार्ड से एक समय में एक ही लेपटॉप चल पाता था और जो अन्य गेजेट्स हैं उसमें डाटा कार्ड लग नहीं सकता था, उसमें वाई फ़ाई से ही इंटरनेट का उपयोग किया जा सकता था।
तब ढूँढ़ शुरू हुई एक ऐसे वाई-फ़ाई राऊटर की जो कि डाटा कार्ड के साथ उपयोग में ला सकें, जिससे सारे गेजेट्स को भी इंटरनेट से जोड़ा जा सके। बैंगलोर की ही एक कंपनी ने ऐसा एक राऊटर बनाया था, परंतु उनके राऊटर का दाम लगभग ४,५०० रूपये था, जो कि हमें बहुत ज्यादा लग रहा था, और उसमें बैटरी भी नहीं थी, हमेशा पॉवर की जरूरत होती है।
कुछ दिनों पहले से ऑनलाईन साईटों पर इस तरह का वाई फ़ाई राऊटर की ढ़ूँढ़ शुरू की और पिछले सप्ताह ईबे पर माईफ़ाई का एच १ उत्पाद मिला, और वहाँ एक ऑक्शन चल रहा था जिसमें आखिरी ऑक्शन १६२० रूपये का था और अगला ऑक्शन हम १७२० रूपये का कर सकते थे, तो हमने ऑक्शन में बोली लगा दी १७२० रूपये की, चार घंटे बाद ही ऑक्शन खत्म होनी थी और हमारे पास ईमेल आ गया कि यह उत्पाद आपका हो गया, और ईबे से बिल भी आ गया। हमने भी फ़टाफ़ट भुगतान करने की सोची तभी याद आया कि ईबे से अभी दीवाली पर ही एक १५० रूपये का कुपन आया था, उसका भी उपयोग कर लिया जाये। इस प्रकार हमें यह वाई फ़ाई राऊटर मात्र १५७० रूपये का पड़ा ।
अब इसकी विशेषताओं की बात की जाये ।
हमने अपना डाटा कार्ड जैसे ही इस वाई फ़ाई राऊटर में लगाया १ मिनिट से भी कम समय में ऑटो डायल होकर इंटरनेट से जुड़ गया । फ़िर निर्देशिका में दिये गये ब्यौरे के अनुसार पहले तो एडमिन का पासवर्ड बदला और फ़िर वाई फ़ाई राऊटर को WEP Pass Phrase स्थापित किया। इसमें मोबाईल की तरह लीथियम बैटरी है जिसका बैटरी बैकअप ३-४ घंटे का है। घर में तो बढ़िया काम कर ही रहा है और साथ ही कहीं भी ले जा सकते हैं और कहीं भी हॉट स्पॉट के जैसा उपयोग कर सकते हैं। इसकी चार्जिंग यूएसबी से दी गई है और अलग से एसी एडॉप्टर भी लग सकते हैं। लैन / वैन के लिये भी एक RJ45 कनेक्टर भी दिया है। यह अधिकतम १५० एमबीपीएस तक की रफ़्तार तक का समर्थन देती है। इससे लगभग २० वाई फ़ाई वाले गजेट्स को जोड़ा जा सकता है।
इसका कुछ जानकारियाँ देखिये –
– Model: MIFI-H1
– Portable mini 3G WIFI Gateway USB modem
– Compatible with HSDPA/HSUPA/W-CDMA 1X/EVDO/TD-SCDMA (Work with an external 3G USB adapter)
– Supports WIFI speed rate up to 150Mbps
– Supports 3G, ADSL and dynamic IP
– Support IEEE 802.11b/g/n
– Shares a single IP address with up to 20 users
– Supports the high-speed gateway
– Simple handling and management over web interface
– Security through WEP, WPA and built-in firewall
– Powered by rechargeable 1500mAh battery
– Working time per charged: about 3~4 hours
उत्पाद बहुत बढ़िया है, इंटरनेट की रफ़्तार बराबर है, कहीं कोई समस्या नहीं है।

इंडियाप्लाजा की अच्छे ऑफ़रों पर घटिया सर्विसेस (Bad services on Great offers by Indiaplaza.com)

लगभग एक सप्ताह होने आया इंडियाप्लाजा से ईमेल पर एक ऑफ़र आया था, और ऑफ़र बहुत अच्छा लगा, मैंने सोचा कि इससे अच्छी डील और कहीं नहीं मिलेगी, तो फ़टाफ़ट ऑनलाईन ऑर्डर कर दिया।

इसके पहले भी कई अन्य साईटों पर ऑनलाईन ऑर्डर कर चुके हैं, तो उसका अनुभव पहले से ही था, उसके मुकाबले इंडियाप्लाजा के साथ खरीदारी का अनुभव बहुत ही खराब रहा।

जैसे ही हमने भुगतान किया एक नया पेज खुला जिस पर ट्रांजेक्शन रिफ़ेरेन्स नंबर दिया गया, यह तो अच्छा हुआ कि हमने उसे पीडीएफ़ बनाकर सहेज लिया, जो कि मैं अधिकतर ऑनलाईन ट्रांजेक्शन करने के बाद करता हूँ, और तब तक सहेज कर रखता हूँ जब तक कि समान मुझे मिल नहीं जाता है। इधर ट्रांजेक्शन पूरा हुआ नहीं कि हमने सोचा कि अब ईमेल से संपूर्ण जानकारी भेज दी गई होगी। परंतु कोई ईमेल इंडियाप्लाजा की तरफ़ से नहीं आया। हमने सोचा शायद थोड़ी देर बाद आयेगा, परंतु ईमेल न आना था और न ही आया ।

दो दिन पहले एक ईमेल इंडियाप्लाजा से ईमेल आया कि शिपिंग में देरी हो रही है और कल शिपिंग होगी, हमने सोचा कि चलो इंडियाप्लाजा वालों ने इतना तो ध्यान रखा कि देरी के लिये ईमेल लिख दिया। खैर अभी तक तो हमें समान नहीं मिला है और न ही कोई अन्य ईमेल देरी के लिये मिला है।

अगर किसी अन्य ऑनलाईन साईट पर ऑर्डर किया होता तो वे बिल के साथ साथ कूरियर का रिफ़रेन्स नंबर भी ईमेल कर देते हैं। जिससे आप कूरियर ऑनलाईन ट्रेक कर सकते हैं।

उम्मीद है कि एक दो दिन में समान मिल जाना चाहिये, आगे टिप्पणी में बताते हैं कि कब समान आता है।

बैंकों के अकाऊँट नंबर पोर्टेबिलिटी भारतीय रिजर्व बैंक के लिये आसान नहीं होगी (Bank Account Number Portability will not be easy task for RBI)

बैंकों के अकाऊँट नंबर पोर्टेबिलिटी भारतीय रिजर्व बैंक के लिये आसान नहीं होगी, यह बैंकों के लिये तकनीकी रूप से बहुत बड़ी चुनौती होगा, अभी बैंकें जितने भी सॉफ़्टवेयरों का उपयोग कर रही हैं, उसमें बैंकें अकाऊँट नंबर में अधिकतम अंकों का उपयोग कर रही हैं, और एक और व्यवहारिक समस्या है कि कई बैंकों में एक ही अकाऊँट नंबर अभी पाया जा सकता है।
बैंक पोर्टेबिलिटी
अभी बैंकों के अकाऊँट नंबर यूनिक नहीं हैं, इसलिये यह भारतीय रिजर्व बैंक के लिये बड़ी समस्या होगी, और व्यवहारिक तौर पर उतना आसान भी नहीं है। ऐसा लगता भी नहीं कि इस बैंक अकाऊँट नंबर पोर्टेबिलिटी का कोई फ़ायदा होने वाला है, क्योंकि अकाऊँट कोई सा भी हो या खाता नंबर कोई सा भी हो, बैंक का नाम तो बदल ही जायेगा।
कुछ और बातें भी हैं, खाताधारक का बैंक बदलने पर IFSC  कोड भी बदल जायेगा, जिससे उसे NEFT & RTGS में समस्या होगी, इसके लिये खाताधारक को सभी जगह बैंकों के नाम भी बदलने होंगे।
बैंकों के अकाऊँट नंबर पोर्टेबिलिटी बहुत ही मुश्किल साबित होगा भारतीय रिजर्व बैंक के लिये, क्योंकि अभी भारतीय बैंकों में अकाऊँट नंबर में अधिकतम १६ नंबर तक का उपयोग किया जाता है, और उन नंबरों से कैसे भी तकनीकी तौर पर दूसरी बैंकों के साथ मैपिंग करना बहुत मुश्किल है।
भारतीय वित्त बाजार में केवल अकाऊँट नंबर से काम नहीं चलता है, वहाँ बैंक का नाम भी देना जरूरी होता है, और तो और कोर बैंकिंग सुविधा के बावजूद ग्राहक से शाखा की जानकारी ली जाती है, जबकि वह ग्राहक उस शाखा का ग्राहक ना होकर बैंक का ग्राहक है।
मोबाईल नंबर और बैंक अकाऊँट नंबर पोर्टिबिलिटी दोनों ही बहुत अलग चीज हैं, जब से मोबाईल आया है क्या आपको कभी अपने किसी भी फ़ार्म पर यह बताने को कहा जाता है कि मोबाईल कौन सी कंपनी का है और कौन सा सर्विस प्रोवाईडर है, नहीं ना, परंतु बैंकों के लिये ऐसा नहीं है। अगर आप डीमैट खाता भी खुलवाने जायेंगे तो वहाँ फ़ॉर्म पर बैंक का नाम, शाखा, IFSC  कोड और अकाऊँट नंबर सभी जानकारी ली जायेगी।
अब देखते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक क्या निर्णय लेती है, वैसे अगर यह निर्णय आया भी तो फ़िर बैंकिंग क्षैत्र में तकनीकी तौर पर भारी फ़ेरबदल की जरूरत होगी।

नोकिया का काईनेटिक फ़ोन जिसे मोड़ा भी जा सकता है (Twistable phone from Nokia Kinetic)

नोकिया ने काईनेटिक फ़ोन का प्रोटोटाईप तैयार किया, और यह हैंड गेजेट्स की दुनिया में बिल्कुल नई क्रांति है। इस फ़ोन को आगे और पीछे मोड़ा जा सकता है, कोनों से मोड़ा जा सकता है ।

नोकिया मोबाईल फ़ोन की दुनिया में लोगों को एक बेहतरीन तोहफ़ा देने जा रही है। जब ऐसा लग रहा था कि टेबलेट मोबाईल फ़ोन को बदलने जा रहे हैं, परंतु शायद नोकिया का काईनेटिक तकनीक मोबाईल डिवाईस को बचा ले।

नोकिया की यह तकनीक नई नहीं है, परंतु व्यवहारिक रूप से बाजार में लाने वाली पहली कंपनी नोकिया होगी। नोकिया की काईनेटिक तकनीक के पीछे तापानी जौकिनेन हैं। इस मोबाईल डिवाईस पर गेम खेलने का मजा ही कुछ और होगा, कि बीच से थोड़ा सा उछाला और कार झट से सड़क से उछल जाये, और क्या क्या फ़ीचर होंगे या आ सकते हैं, यह तो डिवाईस बाजार में आने पर ही पता चलेगा।

यहाँ एक झलक देखिये –

nokia kinetic

Twisted Nokia Phone

दीपपर्व दीपावली पहली बार अकेले दक्षिण में (My first Deepawali in South India)

दीपपर्व दीपावली पर मेरी तरफ़ से आपको और आपके परिवार को बहुत बहुत शुभकामनाएँ । उम्मीद है कि सबने बहुत ही हर्षोल्लास से दीप पर्व मनाया होगा ।

जिंदगी में पहली बार ऐसा हुआ है कि मैं अपने परिवार के साथ दीपावली त्यौहार नहीं मना पाया, थोड़ा नहीं बहुत बुरा लगा परंतु कुछ मजबूरियाँ ऐसी होती हैं जिनसे समझौता करना ही होता है। खैर फ़ोन एक अच्छा माध्यम है अब कि सबसे बात कर लो । खैर पहली बार अलग दीपावली मनाने पर अटपटा लगा। हमारे भाई जो नजदीक ही रहते हैं, वे भी आ गये थे।

दीपावली के पहले कवायद शुरू हुई पूजन सामग्री की, देखा तो पता चला कि यहाँ पूजन सामग्री का टोटा है, और किसी निश्चित स्थान पर ही मिलती है, खैर जैसे तैसे करके पूजन सामग्री का प्रबंध किया गया, फ़िर बारी आई बंधनवार के लिये फ़ूलों की, यहाँ गेंदे के फ़ूल प्रचुर मात्रा में बाजार में उपलब्ध नहीं थे और सारे हिन्दी भाषी लोग जो कि यहीं त्योहार मना रहे थे, फ़ूल ढूँढ़ने में लगे थे और फ़ूल मिले भी तो उसमें भी गजब की लूट थी, आम के पत्ते तक बिक रहे थे। यहाँ गेंदे के फ़ूल अमूमन बाजार में कम ही मिलते हैं, खैर जैसे तैसे करके गेंदे के फ़ूलों का प्रबंध किया गया,  और दीपावली की पूजा की गई।

दक्षिण में नरकचतुर्दशी को माना जाता है, ये लोग दीपावली नहीं मनाते हैं, इसका कारण यह भी हो सकता है कि रावण को अपना भाई बंधु मानते हों, और रावण की पूजा करना भी इसका एक कारण हो सकता है। परंतु दशहरे पर रावण की पूजा तो विधि सम्मत तरीके से हमारे यहाँ भी की जाती है, क्योंकि रावण विद्वान था परंतु एक बुराई ने उसकी विद्वत्ता को धो दिया। और रावण बुराई का प्रतीक बन गया।

बेटेलाल को आतिशबाजी का बहुत शौक है, हमें भी है परंतु वक्त के साथ थोड़ा कम हो गया है। बेटेलाल ने खूब अनार, चकरी और फ़ुलझड़ियाँ से आतिशबाजी की और आनंदित हुए।

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