Category Archives: अनुभव
त्योहारों पर वास्तविक छूट या उपभोक्ताओं के साथ छल (Sale on Festival Season…)
आजकल सुबह अखबार में देखो तो लगभग आधे से ज्यादा अखबार त्योहारों पर छूट के विज्ञापनों से भरे रहते हैं, जैसे कि सारा समान मुफ़्त में ही देने वाले हैं। मैंने कुछ चीजों पर विश्लेषण किया तो पाया कि अधिकतर समानों पर बताई जा रही छूट सामान्यत: वर्षभर एक जैसी होती है, केवल त्यौहार पर बताने का तरीका बदल दिया जाता है।
कुछ अन्य वस्तुओं पर देखा जाये तो पता चलेगा कि इतनी छूट आखिरकार क्यों मिल रही है । वह इसलिये कि क्योंकि कंपनियाँ वे उत्पाद बंद करने वाली हैं और अभी उनके पास बहुत सारा स्टॉक पड़ा है तो कंपनियाँ कुछ उपहारों के साथ वह उत्पाद त्यौहार के बाजार में उतार देती हैं।
और वैसे भी जो नयी वस्तुएँ या सामान बाजार में उतारा जाता है उसमें कोई छूट नहीं होती है। कई बार देखा है कि छूट का विज्ञापन तो बहुत बड़ा दिया गया है परंतु नीचे एक तारा लगाकर लिख दिया जाता है कि छूट चुनिंदा वस्तुओं पर । जब ग्राहक विज्ञापन पढ़कर दुकान पर जाता है तो पता चलता है कि केवल एक छोटी सी अलमारी में ही छूट का समान है और वह भी उसके लिये किसी काम का नहीं है, तो ग्राहक का मन तो खराब होता ही है और समय भी बर्बाद होता है। परंतु इसके पीछे दुकानदार का मन होता है कि कम से कम ग्राहक दुकान पर तो आयेगा।
आजकल ग्राहक भी बहुत समझदार हो गया है, वह लगभग हर जगह भाव पता कर लेता है और उसी के बाद खरीदारी करता है।
खैर खासबात तो यह है कि अगर छूट देखकर कहीं किसी वस्तु की खरीदारी के लिये जा रहे हैं तो सारी बातों का पता करके ही जायें और यह निश्चिंत कर लें कि जो छूट दी जा रही है वह वास्तविक है या केवल लुभावना ऑफ़र है।
एक सीट की हार से तूफ़ान का अंदाजा लगाईये..नहीं तो बहुत देर हो जायेगी
सरकार की तरफ़ से बयान आया है कि केवल एक सीट की हार से सरकार की कार्यप्रणाली आंकना ठीक नहीं है। चलो हम भी इस बात से सहमत हैं कि एक सीट की हार से किसी की हार जीत का पैमाना तय नहीं होता है, परंतु जनता का रूख लगता है कि कांग्रेस भांप नहीं पा रही है, कि उनका सफ़ाया तय है, क्योंकि जो भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मुहीम चल रही है उसमें कांग्रेस सबसे बड़ा रोड़ा अटका रही है, अभी लोकपाल बिल पास करना केवल उनके पाले में आता है।
अण्णा की टीम और अण्णा खुद कांग्रेस के विरोध में सड़क पर उतर आये हैं, और जो नकारात्मक दृष्टिकोण जनता के बीच में रख रहे हैं, उसे कांग्रेस को सकारात्मक दृष्टिकोण में बदलना असंभव नजर आ रहा है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जिन्होंने १० वर्ष शासन किया और तानाशाही जैसा माहौल पैदा कर दिया। तब मजबूरी में जनता को भाजपा को चुनना पड़ा, उस समय मध्यप्रदेश में भाजपा की स्थिती ऐसी थी कि वह किसी को भी कोई सी भी सीट से टिकट दे देती तो वह जीत जाता। और यह हुआ भी, उस समय भी इन मुख्यमंत्रीजी ने हाईकमान को कहा था कि कांग्रेस की जीत तय है, जबकि सतही स्तर की सुगबुगाहट ये भांप ही नहीं पाये। और जनता ने कांग्रेस को धूल चटाकर इतिहास रच दिया। तब इन मुख्यमंत्री महोदय ने चुनाव के पहले बोला था कि अगर कांग्रेस हार गई तो वे अगले १० वर्ष तक कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे।
अब ये बेचार चुनाव तो लड़ नहीं सकते क्योंकि जनता के बीच में बोल दिया था, और मध्यप्रदेश में कांग्रेस का बंटाढ़ार करने के बाद अब आजकल ये बेबी बाबा के मुख्य सलाहकार हैं, और अब ये केन्द्र स्तर पर कांग्रेस की लुटिया डुबाने में भरपूर योगदान दे रहे हैं, और तो और कांग्रेस में इनसे एक से एक बड़े वाले हैं जो कि लुटिया डुबाने में नंबर १ की होड़ में हैं।
यह कह दिया जाये कि लोकपाल बिल को न लाने से कांग्रेस अपने ताबुत में आखिरी कील ठोंक रहा है तो गलत नहीं होगा। अब भ्रष्टाचार पर इस लोकपाल बिल से कितना अंकुश लगेगा यह तो बिल पारित होने के बाद लागू होने पर ही पता चलेगा और तब इसमें शायद व्यवहारिक सुधारों की दरकार होगी।
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पिटने को तैयार रहें, भारत में अराजकता पैर पसार चुकी है ।
कल पटियाला हाऊस कोर्ट के सामने जो भी हुआ अन्ना के समर्थकों के साथ उससे प्रशासन और भारत सरकार का संदेश साफ़ है कि आम जनता और अन्ना के समर्थक पिटने को तैयार रहें, वे सीधे नहीं पीट सकते हैं तो कुछ गुंडे जिनको सरकार ने शह दी है या फ़िर उनके ही हैं, वे जनता को पीट सकते हैं, और इसका सीधा मतलब है कि भारत में अराजकता पैर पसार चुकी है।
अब जनता या तो पिटने को तैयार रहे या फ़िर प्रशासन और इन गुंडों के खिलाफ़ खुद ही लठ्ठ लेकर तैयार रहे। क्योंकि प्रशासन की जाँच का हश्र तो सभी जानते हैं, जाँच चलती रहेगी और इन गुंडों पर केस चलते रहेंगे।
नाम भी श्रीराम का लिया है, वे श्रीराम जो कि समाज के लिये आदर्श हैं, मर्यादा पुरूषोत्तम हैं, पिता के वचन के लिये वनवास स्वीकार लिया । धिक्कार है ऐसे लोगों पर जो श्रीराम के नाम पर सेना का निर्माण कर रहे हैं और श्रीराम के नाम का गलत उपयोग कर रहे हैं।
हरी मिर्च वाली धनिये की चटनी का स्वाद (Taste of Green Chilli Chutney)
हरी मिर्च वाली धनिये की चटनी बचपन से खाते आ रहे हैं, पहले जब मिक्सी घर में नहीं हुआ करती थी तब सिलबट्टे पर मम्मी या पापा चटनी पीसकर बनाते थे, अभी भी अच्छे से याद है कि थोड़ा थोड़ा पानी पीसने के दौरान डालते थे और चटनी बिल्कुल बारीक पिसती थी, अच्छी तरह से याद है कि उस समय धनिया पत्ती की एक एक पत्ती तोड़कर पीसने के लिये रखते थे, एक भी धनिये का डंठल नहीं गलती से भी नहीं छूटता था। मसाला धनिया, मिर्च, ट्माटर को ओखली में डालकर मूसल से कूटते थे और फ़िर सिलबट्टे पर चटनी को पिसा जाता था।
बाद में मिक्सी घर पर आ गई तो उसी में चटनी बनने लगी और धनिया पत्ती पहले की तरह ही तोड़ी जाती, बिना डंठल के, पर एक बार चटनी हम बना रहे थे तो धनिया पत्ती तोड़ने में बहुत आलस आता था, कि एक एक पत्ती तोड़ते रहो और फ़िर चटनी बनाओ, हमने धनिया की गड्डी धोई और चाकू से पीछे की जड़ें काटकर नजर बचाकर धनिये की चटनी बना डाली, घर में बहुत शोर हुआ कि लड़का बहुत आलसी है और आज चटनी में धनिये के डंठल भी डाल दिये, अब हम तो समय बचाने की कोशिश में नया प्रयोग कर दिये थे, पर फ़िर उसी में इतना स्वाद आने लगा कि हमारी विधि से ही चटनी घर में बनाई जाने लगी।
चटनी भी मौसम के अनुसार स्वाद की बनाई जाती थी, साधारण धनिये की, पुदीना पत्ती के साथ, कैरी के साथ । मसाले में नमक, लाल मिर्च डालते थे फ़िर बाद में हींग और जीरा का प्रयोग भी होने लगा। प्याज और लहसुन के साथ भी चटनी का स्वाद परखा गया।
हरी मिर्च तीखे के अनुसार कम या ज्यादा डालते हैं, अभी थोड़े दिनों पहले बहुत तीखी चटनी खाने की इच्छा हुई तो खूब सारी मिर्च डाल दी तो उस चटनी में से एक चम्मच चटनी भी नहीं खा पाये। अब सोचा कि कम मिर्च की चटनी बनायें तो पता चला कि मिर्च ही इतनी तीखी है कि ५-६ मिर्च में तो बहुत तीखा हो जाता है। बचपन की याद है ७-८ मिर्च में भी चटनी इतनी तीखी नहीं होती थी तो लाल मिर्च डालते थे।
सिलबट्टे पर चटनी पीसने से बैठकर मेहनत करनी होती थी, परंतु मिक्सी में वह सब मेहनत खत्म हो गई, आँखों में जो मिर्च की चरपराहट होती होगी उसका अहसास ही आँखों में पानी ला देता है। अब तो चटनी बनाते समय आँखों में चरपराहट का पता नहीं चलता है। मिक्सी में तो चटनी बनाते समय बीच में दो बार चम्मच घुमाई और चटनी २-३ मिनिट में बन जाती है, हो सकता है कि चटनी उतनी ही बारीक पिसती हो जितनी कि सिलबट्टे पर, अब याद नहीं, और अब सिलबट्टा है नहीं कि पीसकर देख लें। पर हाँ गजब की तरक्की की है, पहले सिलबट्टे पर पीसने में चटनी का बनने वाला समय कम से कम ३० मिनिट का होता था और अब ज्यादा से ज्यादा ५ मिनिट का होता है।
पर यह तो है कि सिलबट्टे की चटनी का स्वाद अब मिक्सी वाली चटनी में नहीं आता ।
ऑनलाईन भुगतान के लिये ग्राहक का विश्वास रेल्वे ने दिया है (Railway created faith in consumers for online payment and delivery)
पारिवारिक समय का कत्ल कर रहे है अंतर्जाल और फ़ेसबुकिया दोस्त (Facebook and Internet are killing family time)
अभी कुछ समय से अपने ऊपर ही विश्लेषण कर रहा हूँ कि एक बार लेपटॉप पर कुछ थोड़ा सा कार्य लेकर बैठे तो कार्य तो खत्म हो गया, किंतु बाकी का समय फ़ेसबुक, ट्विटर या ब्लॉग पढ़ने में निकल जाता है, और यह समय किस तेजी से भागता है, यह तो सिस्टम ट्रे की घड़ी और सामने दीवार पर लगी घड़ी दोनों बताते रहते हैं।
वर्षों पहले बचपन की सुनहली तस्वीर सामने आती है, जब न बुद्धुबक्सा था न अंतर्जाल तक पहुँचाने वाला ये तकनीकी यंत्र नहीं था, तब लगभग सभी परिवार अपने आप में बेहद मजबूती से बंधे हुए थे, और सबको एक दूसरे के दुख सुख का अहसास होता था, पता होता था। सामाजिक मूल्यों की परिभाषा अलग होती थी और अब सामाजिक मूल्यों की परिभाषा में बदलाव सहज ही देखा जा सकता है।
कल फ़ेसबुक पर बहुत सारे दोस्तों को जो कि केवल फ़ेसबुक दोस्त थे, जो इसलिये बना लिये गये थे कि उनके और हमारे कुछ कॉमन दोस्त थे, हटा रहे थे। दोस्तों की इतनी भीड़ देखकर दंग था और उनके द्वारा जारी किये गये स्टेटसों को भी देखकर, कुछ तो केवल अपनी भड़ास ही निकाल रहे थे और कुछ केवल समय का कत्ल कर रहे थे, तो हमने सोचा कि ऐसे समय का कत्ल करने वाले दोस्तों से पीछा छुड़ाना ज्यादा ठीक होगा, ठीक है थोड़ा सा अपना पारिवारिक समय का कत्ल होगा।
पीछा छुड़ाने से यह फ़ायदा तो होगा जो वाकई में दोस्त हैं उनके दुख सुख में शामिल तो हो सकेंगे उनकी वर्तमान गतिविधियों को देख तो सकेंगे। कल इतने समय फ़ेसबुक पर शायद पहली बार मैंने वक्त गुजारा और देखा कि कुछ लोग तो केवल दोस्त बनाने की होड़ में लगे हैं और सार्वाधिक दोस्त बनाने की होड़ में लगे हैं। केवल अपने मन को तृप्त करने के लिये ?
समय आ गया है कि थोड़ा अपने समय का कत्ल करके ऐसी चीजों से बचा जाये और बेहतरीन समय प्रबंधन कर परिवार को उचित समय दिया जा सके।
बदलते हुए गरबे और डांडिया..
घर के पास ही दुर्गापूजा का पांडाल लगा है, तो पहले ही दिन पूजा में हो आये, जाकर देखा तो इतना बड़ा पांडाल और इतनी सी मूर्ती, खैर अब मुंबई की आदतें इतनी जल्दी भी नहीं जायेंगी। गरबा और डांडिया का तो कहीं आस पास पता ही नहीं है और अगर है भी तो इतनी दूर वह भी रात १० बजे से शुरू होता है और पूरी तरह से व्यावसायिक, जहाँ गरबा के मैदान में जाने का टिकट है, वह भी ५०० रुपये से शुरु।
पहले झाबुआ में थे तो वहाँ असली गरबे का रंग चढ़ा था, और जो गरबे वहाँ देखे और खेले थे वह गरबे और डांडिया बस यादें बनकर रह गये हैं। झाबुआ में लगभग हर कॉलोनी में गरबे डांडिया रास का आयोजन होता था, और सभी लोग गरबे में शिरकत किया करते थे। और कहीं पर भी किसी भी जगह डांडिया खेलने की आजादी होती थी, जरूरी नहीं होता था कि कोई शुल्क दिया जाये या वहीं के रहवासी हों।
परंतु अब तो हर जगह गरबे और डांडिया ने व्यावसायिक रूप ले लिया है, डांडिया दुर्गामाता की आराधना करने का ही एक स्वरूप माना जाता है, परंतु आराधना भी अब सामान्य वयक्ति के बस की बात नहीं रह गई है।
आज भी अच्छॆ से याद है हमारे महाविद्यालय में कार्यालय में कार्यरत राठौड़ साहब इतना अच्छा गरबा गाते थे कि उनकी माँग दूर दूर तक होती थी, जैसे माँ का आशीर्वाद हो उनके ऊपर, उनका सबसे अच्छा गायन लगता था पारंपरिक गरबे पर “पंखिड़ा ओ पंखिड़ा “।
आजकल पारंपरिक गरबे के गाने तो सुनने को मिलते ही नहीं हैं, आजकल फ़िल्मी गानों पर गरबा होता है। खैर पता नहीं कि झाबुआ में भी अब गरबे का स्वरूप व्यावसायिक हो गया हो, परंतु हाँ पुराने दिन तो याद आते ही हैं।
जिंदगी की अनमयस्कता से बाहर आने की कोशिश..
आज बहुत दिनों बाद लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, पता नहीं परंतु ऐसा लग रहा था कि दिमाग के साथ साथ लेखन पर भी विराम लग चुका है। खैर अपनी जिंदगी की अनमयस्कता से बाहर आ चुका हूँ और अब वापिस से पटरी पर आने की कोशिश जारी है। न कुछ पढ़ने का मन होता था न लिखने का, यूँ कहें कि कुछ करने का मन नहीं होता था तो ज्यादा ठीक होगा। न किसी से मिलने का, अगर मजबूरी में मिल भी लिये तो मन मारकर मिल लेते कि सामने वाले को बुरा न लगे। खैर जिंदगी में हर तरह के दौर आते हैं, जिसमें सभी तरह की घटनाएँ घटित होती रहती हैं।
जब जिंदगी बेपटरी हो जाती है तो किसी की भूख मर जाती है और किसी को ज्यादा भूख लगती है, हम दूसरे तरह के निकले, इतनी भूख लगती कि जो सामने आता खा जाते। बस खाते रहो और अपने चिंतन की गहराई में गोते लगाते रहो। कभी ऐसा लगता कि मोटापा ज्यादा बढ़ता जा रहा है, परंतु कुछ अपने से ज्यादा मोटों को देखकर थोड़ी चिंता कम होती कि चलो अपने अभी इससे तो कम हैं। खैर यह तो मन को मनाने की बात है परंतु चिंता का विषय भी है, खैर अब दिनचर्या को ठीक करने का प्रयत्न जारी है।
इसी बीच एक अच्छी और ठीक ठाक खबर यह रही कि एक और बीमा लिया तो उन्होंने पूरे शरीर की जाँच करवाई तो अपने शरीर के सारे पुर्जे बराबर पाये गये और उसमें हमें उत्तीर्ण कर दिया गया। खासकर टीमटी में तो दौड़ाकर और चलाकर और फ़िर हृदय को आराम मिलने तक जो प्रक्रिया रही तो हृदय की पूरी जाँच हो गई।
अब फ़िर से लेखन में नियमितता आ पायेगी, ऐसी उम्मीद है, इसी बीच बहुत सारे वित्तीय लेख पढे और बहुत सारे वित्तीय विषयों और प्रबंधन विषयों पर विश्लेषण भी किया अगर वे या कुछ मेरे शब्दों में ढ़ल पाये तो जल्दी ही पोस्ट ठेलायमान होगी।
लेपटॉप पर विन्डोज का हिन्दी सुविधा भी चालू कर ली है, परंतु उसका कीबोर्ड रेमिंग्टन है, क्या हम उसे फ़ोनोटिक में उपयोग कर सकते हैं ? अगर कोई यह बता दे तो अपना एक माह का समय रेमिंग्टन सीखने से बच जायेगा।
अब यह संकल्प भी लिया है कि हर महीने कम से कम एक पुस्तक तो पढ़नी ही है, और अपने मोबाईल पर पीडीएफ़ पढ़ने में थोड़ी तकलीफ़ होती है तो अमेजन किंडल फ़ायर लेने की आग मन में लगी हुई है परंतु अब सोचा जा रहा है कि भौतिक रूप से किताबों को ही पढ़ा जाये और अपनी अलमारी को ही भरा जाये।
