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मानव प्रजाति के लिये शताब्दी का सबसे कठिन समय है

मार्च 2020 से मानव प्रजाति के लिये शताब्दी का सबसे कठिन समय है, यह कोरोना आया था लगभग नवंबर 2019 में और अब जून 2021 भी लगभग ख़त्म ही होने को आया है। यह डेढ़ साल सदियों के जैसा बीता है, शुरू में तो बहुत मज़ा आया, कि घर पर ही रहना है कहीं नहीं जाना है। पर धीरे धीरे यह भी कठिन होता गया। सब अपने आप में सिमट गये, नहीं यह कहना ठीक नहीं होगा कि सिमट गये, दरअसल समाज की भी यह अपनी मजबूरी थी अपने आपको सिमटने की। नहीं तो सभी को कोई न कोई नुक़सान हो सकता था।

सिमटने के चक्कर में हमारे मानसिक अवस्था पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा, मुझे लगता नहीं कि कोई भी इन प्रभावों से बच पाया होगा। जो निडर बनकर घूमते रहे कि हम स्वस्थ हैं हमें कोरोना नहीं होगा, सबसे पहले कोरोना ने उन्हें ही शिकार बनाया। फिर मौतें कम होने लगीं तो लोग बिना किसी डर के फिर से घूमने लगे और हमने अपने कई दोस्तों, परिचितों और रिश्तेदारों को मौत के मुँह में जाते देखा, पता नहीं इस वर्ष तो मैं कितनी बार और कितनी देर तक कई बार रोया हूँ, आज भी उनके चेहरे यकायक ही आँखों के सामने आ जाते हैं, और वे मुझसे अपनी ही आवाज़ों में बात करने लगते हैं, कभी कभी लगता है कि मैं पागल हो गया हूँ, परंतु ऐसा नहीं है, पता नहीं भाग्य को यही मंज़ूर था या उनकी थोड़ी सी लापरवाही से ऐसा हुआ।

कई मित्र ऐसे थे, जिनके लिये कार्य ही सर्वोपरि था, वे रोज़ ही अपने कार्यस्थल जाने में कोई देरी नहीं करते थे, परंतु कभी उन्होंने अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा, यह दुख होता है। वे लोग बड़े स्वार्थी थे, हमारी इतनी बातें होती थीं, मिलकर, कॉ़ल पर, व्हाट्सऐप पर, ऐसा कुछ बचा नहीं जहाँ, अपने लोगों से बात नहीं होती थी, मैं बस अपने लोगों से यही कहता था, यहाँ तक कि जब मौक़ा मिलता जो अपरिचित थे, उनको भी कहने से नहीं चूकता था, कि परिवार अंततः आपके साथ रहेगा, अगर आपको कुछ हो गया तो कार्यस्थल पर तो सारे काम कोई ओर सँभाल लेगा, परंतु आपकी कमी परिवार में कोई पूरी नहीं कर पायेगा। जिस परिवार को आप सबसे आख़िरी प्राथमिकता पर रखते हो, वही हमेशा आपके काम आयेगा। कुछ दोस्तों को जब वे अपने अंतिम समय में अस्पताल में साँसों के लिये लड़ रहे थे, शायद बात समझ में भी आई, परंतु बस वह वक़्त समझने का नहीं था।

अंतिम वक़्त में कोई कितना भी समझ ले, अच्छा बुरा सब समझ ले, परंतु जो जीवन में खो गया वह खो गया। इतने लोगों के जाने के बाद अब मैं आत्मा को ढूँढने लगा हूँ, कई फ़िल्म, डाक्यूमेंट्री देखीं, किताबें पढ़ीं, और भी पढ़ रहा हूँ, कई बार लगता है कि यह सब बस कहने की बात है, अगर इस दुनिया में सभी तरह के लोग हैं ओर कोई बुरा है कोई अच्छा है, तो क्या वाक़ई कहीं इस सबका इंसाफ़ भी होता होगा। धरती पर इतनी जनसंख्या हो गई, भगवान भी इतनी आत्माओं का प्रोडक्शन करने में थक गये होंगे, शायद उनके यहाँ भी अब जगह न होगी। सब जगह किसी एक निश्चित संख्या में ही लोग रह सकते हैं। क्या वाक़ई मरने के बाद भी कोई दुनिया होती है, क्यों हम इतने सीधा सादा जीवन अपने किसी न किसी उसूल पर बिता देते हैं, क्यों कोई ग़लत कार्य करने के बाद अपने मन और दिमाग़ पर बोझ बना लेते हैं, इसका जवाब तो खैर मेरे पास नहीं। आत्मा और परमात्मा को कोई साफ़ उत्तर कहीं नहीं है, बस एक ही चीज मिली कि ख़ुद को ढूँढे पर सही तरीक़ा बताने वाला कोई है नहीं।

इस लंबे समय में घर के दौरान यह समझ में आया कि हम सामाजिक हैं अगर हमें अकेले ही रहने को लिये छोड़ दिया जाये तो हम पागल हो जायेंगे, हमें अपने आसपास लोग चाहिये, उनका अहसास चाहिये, हमारे जीवन में हर तरह का रस होना चाहिये। जीवन जीने के लिये अपना नहीं, साथ रहने वाले और साथ चलने वाले लोगों का खुश होना ज़रूरी है।

इस लंबे समय में कई नये कार्य हाथ में लिये, पर शायद ही कोई कार्य लगातार कर पा रहा हूँ, ऐसा लगता है कि करना तो सब कुछ चाहता हूँ परंतु क्यों करूँ? इसका उत्तर नहीं मिल रहा। दिमाग़ चलने बंद हो गया, मैं लोगों को किसी काम के लिये हाँ कह देता हूँ, यह भी कह देता हूँ कि मैं बहुत आलसी हूँ, परंतु सही बात तो यह है कि मैं आलसी नहीं हूँ अगर गोया आलसी होता तो इतना लंबा हिन्दी में यह बकवास या क़िस्सा लिख नहीं रहा होता, मैं कहीं कुछ ढूँढने में व्यस्त हूँ, जो मुझे मिलने से बहुत दूर है। मैं क्या ढूँढ रहा हूँ वह मुझे साफ़ है, पर कैसे और कहाँ से मिलेगा यह मुझे पता नहीं, न ही मैं लोगों से पूछना चाहता हूँ और न इस बारे में बताने चाहता हूँ।

प्रेम अपनी जगह है और संसार की व्यवहारिकता अपनी जगह है, कहते हैं कि मरने के बाद लोगों की बुराई नहीं करनी चाहिये, मैं बरसों से लोगों को समझा रहा हूँ कि हमेशा अपने परिवार के बारे में सोचो, वे ही हैं तुम्हारे पीछे, वे तुमसे किसी टार्गेट की उम्मीद नहीं करते, अगर किसी दिन बिना रोटी लिये घर आओगे न तो वे तुमसे उस दिन की रोटी नहीं माँगेंगे, वे बिना रोटी के भूख सहन करके सो जायेंगे, वे आपको ओर परेशान नहीं करेंगे, क्योंकि आप पहले से परेशान हैं, परंतु क्या वाक़ई आप अपने परिवार को मन से दिल से अपना पाये, या यह सब सोच पाये, नहीं तो कृप्या सोचिये।

मैं कोई नहीं होता किसी पर दबाव डालने वाला, बस विनती ही कर सकता हूँ, क्योंकि यह सदी का सबसे कठिन समय है, कब यह काल विकराल का रूप धर लेगा, किसी को पता नहीं।

सोनू सूद

काश हमारा हर अभिनेता सोनू सूद होता

हम लोग बचपन से फ़िल्में देखकर बड़े हुए, फिर टीवी के धारावाहिक देखे, फ़िल्मों और धारावाहिकों से हमारे मन और व्यवहार पर बहुत प्रभाव पड़ता है। इतने अभिेनेता अभिनेत्री हमारे फ़िल्म जगत में हैं, टीवी जगत में हैं, उनसे कई बार हम लोग इतनी चीजें सीखे। परंतु असल ज़िंदगी में वे लोग हमें सिखाने में असफल रहे। काश कि हमारा हर अभिनेता अभिनेत्री सोनू सूद जैसा बल रखता, मदद करने की इच्छा अंदर से होती है। अगर अभिनेता लोग अपने सेलिब्रिटी स्टेटस का उपयोग करते हैं तो बहुत से संसाधनों को जुटाना बहुत आसान हो जाता है।

दरअसल एक बात ओर है कि मदद करने की इच्छा सभी की नहीं होती, पर बस केवल एक ही अभिनेता सोनू सूद ही क्यों आगे आया, यह समझ से परे है, अभिनेता जो कि फ़िल्म स्क्रीन पर विलेन की भूमिका निभाता है, विलेन जो कि हमारे जीवन में बुरा कार्य करते हैं, पर असल जीवन में वही विलेन वाक़ई हीरो है, और बाक़ी के सारे हीरो, हीरोईन असल ज़िंदगी में विलेन लगने लगे हैं।

ये जो पर्दे के हीरो हैं वे केवल सरकार के पक्ष में ही हमेशा ट्विटर हो या समाचार का माध्यम हो, बोलते हैं। आज जब जनता के लिये बात करोगे तभी जनता को ख़ुशी होगी, केवल सरकार का पक्ष हमेशा रखने से तो किसी समस्या का समाधान नहीं होने वाला, इस तरह से असल में आप हीरो हीरोईन लोग विलेन का रोल अदा कर रहे हैं। देखते हुए लग रहा है कि आप जनता को प्यार नहीं करते, अपने चाहने वालों को नहीं चाहते, आपके लिये केवल पॉवर और पैसा ही सबकुछ है। आपके पास जो कुछ है वह चला न जाये उससे डरते हैं।

बस यही चाहत थी कि काश हमारा हर अभिनेता सोनू सूद होता, वह तो किसी फ़िल्मी ख़ानदान से भी नहीं है, अपने दम पर फ़िल्मों में अपना कैरियर बनाया, शायद सोनू सूद ही खरा सोना है। काश कि हमारे भारत में ऐसी आपदा के समय में हर क्षैत्र से सोनू सूद आते और सरकार की इस कमी को पूरा करते।

सोनू सूद के ट्वीट छोटे होते हैं परंतु ऊर्जा से भरे होते हैं, जिस तरह से वे लोगों की मदद करते हैं, उससे बहुत आशा बंधती है –

कुछ ट्वीट यहाँ बताता हूँ –

sonu sood@SonuSood·दिल टूटा है .. हौंसला नहीं।

Can’t sleep.. In the middle of night when my phone rings, all I can hear is a desperate voice pleading to save his/her loved ones. We are living in tough times but tomorrow is going to be better, just hold your reigns tight. Together we will win. Just we need some more hands.

Will be done. Your baby is our responsibility. – इस तरह की ट्वीट से विश्वास ओर बढ़ता है।

15 अगस्त को देशभक्ति दिखाने वालों के लिए संदेश ; देश के लिए कुछ करने और देशभक्ति दिखाने का इससे ज़रूरी समय कभी नहीं आएगा

सिनेमा हाल में टिकट्स की ब्लैक होते हुए देखा था। अब जान बचाने के लिए दवाइयों और ऑक्सीजन की ब्लैक होते देख रहा हूं।

मुट्ठी खोल के तो देख.. शायद तेरी हाथ की लकीरों में किसी की जान बचाना लिखा हो।

प्लेटफार्म पर राजनीति होती है। और जमीन पर काम

समय बहुत भयावह है, संयम रखें, ज़बान और दिमाग़ पर भी

समय बहुत भयावह है, संयम रखें। सबका नंबर आयेगा, अगर अब भी न सुधरे तो। कुछ दिन अपनी ज़बान पर लगाम दो, अपने फेफड़ों को मज़बूत करो, ठंडी चीजें मत खाओ पियो, ज़बान का स्वाद यह गर्मी के लिये रोक लो, इस गर्मी अपने शरीर को थोड़ा कष्ट दे लो। आप जितनी ज़्यादती अपने फेफड़ों के साथ करोगे, ऐन वक़्त पर फेफड़े आपको दगा दे जायेंगे। कोशिश करें कि साधारण तापमान का ही पानी पियें, ठंडे पानी को, बर्फीले शर्बत को न पियें। फेफड़ों को ज़्यादा तकलीफ़ न दें।

केवल फेफड़े ही नहीं, जितनी ज़्यादा काम आप अपने शरीर के अंगों से करवायेंगे, उतना ही ज़्यादा समस्या है। कुछ लोग इस बात को हँसी में लेंगे, पर दरअसल उन्हें पता ही नहीं कि हम प्लेट प्लेट भर खाना खाने वाले इंसानों को मुठ्ठीभर खाना ही ऊर्जा के लिये काफ़ी होता है। खाने में ऊर्जा नहीं होती, यह हमारे मन का वहम है। जैसे सुबह हम कहते हैं कि नाश्ता नहीं किया तो ऊर्जा कहाँ से आयेगी, पर वहीं दिन का खाना या रात का खाना खाने के बाद आप शिथिल क्यों हो जाते हो। जब भी कुछ खाओ तो उस हिसाब से तो हमेशा ही ऊर्जा रहनी चाहिये। पर यह तर्क भी लोगों को समझ में नहीं आता।

जब भूख लगे तभी खाओ, यह नियम ज़िंदगी में बना लेंगे तो हमेशा खुश रहेंगे। हम क्या करते हैं कि खाने के समय बाँध लेते हैं, सुबह ८ बजे नाश्ता करेंगे, ११ बजे फल खायेंगे फिर १ बजे दोपहर का भोजन करेंगे, ४ बजे शाम का नाश्ता करेंगे, ७ बजे खाना खायेंगे। कुछ लोग तो शाम को दो बार भी नाश्ता कर लेते हैं और फिर कहते हैं आज तो कुछ खाया नहीं फिर भी पेट भरा हुआ है, अब रात का खाना थोड़ा ओर देर से करेंगे। इस तरह हमने अपना हाज़मा भी बिगाड़ रखा है, और अपनी जीवनशक्ति के साथ हम खिलवाड़ करते हैं।

मुझे जब भी भूख लगती है, तो सबसे पहले मैं बहुत सारा पानी पीकर चेक करता हूँ कि वाक़ई मुझे भूख लग रही है या फिर दिमाग़ खाने का झूठा सिग्नल भेज रहा है, क्योंकि दिमाग़ को तो ज़बान ने कह दिया कि कुछ खाने का इंतज़ाम करो बढ़िया सा, जिसमें बढ़िया स्वाद हो, ताकि यह समय बहुत अच्छा निकले, तो दिमाग़ को खाने का झूठा सिग्नल भेजा जाता है, परंतु अगर मन अपना वश में रखें और स्वादग्रंथियों को पानी का एक लीटर स्वाद चखने को मिल जाये, फिर पेट भी सिग्नल भेजता है, कि अब कुछ ओर रखने के लिये जगह नहीं है, यहाँ मामला फ़ुल है। तो बस ज़बान निराश हो जाती है और चुपचाप रहकर कुछ ओर समय का इंतज़ार करती है। उस समय ज़बान फिर नाटक करेगी, ज़बान कसैली या स्वादहीन हो जायेगी, जिससे आर्टीफीशियली दिमाग़ को लगेगा, इससे शरीर को तकलीफ़ हो सकती है तो दिमाग़ भी सिग्नल देगा, कुछ तो खा लो, भले चुटकी भर कोई चूरण खा लो, ये ज़बान बहुत परेशान कर रही है।

पूरी प्रक्रिया यही है, लिखने को तो बहुत कुछ है, परंतु अब अगले ब्लॉग में, अगर इन स्वाद ग्रंथियों ओर शरीर के इन अवयवों पर कंट्रोल कर लिया तो हम ज़्यादा सुरक्षित हैं। हालाँकि इसके लिये दिमाग़ को वैसा ही पढ़ने लिखने के लिये साहित्य भी देना होगा, साथ ही अपने आसपास का वातावरण भी ऐसा हो सुनिश्चित करना होगा।

कोरोना काल में मदद केवल धन से ही नहीं, अपने समय से भी कर सकते हैं

कोरोना के इस काल में अगर आप दान देना ही चाहते हैं, तो केवल किसी को सही राह दिखाकर सहायता को भी दान समझ सकते हैं, दवाइयाँ, ऑक्सीजन, अस्पताल में बिस्तर सबकी अपनी एक सीमित मात्रा है, अगर हम थोड़ा समय निकालकर फ़ोन करके, ट्वीटर के ज़रिये भी कुछ मदद कर पायें तो वह भी एक बड़ी मदद होगी। नकारात्मकता को हटाना ही होगा, कोरोना मरीज़ों से फ़ोन पर बात करके उनकी जीवटता को बढ़ाना भी मदद ही होगी, कहने का अर्थ यही है कि जितनी मदद अपनी जगह से कर सकते हों, करें। पीछे न हटें, और जो यह मदद रूपी दान आप कर रहे हैं, उसके लिये किसी को कुछ बताने की ज़रूरत नहीं। बस आप मदद करते चलें।

हमारे लगभग हर पुरातन ग्रंथों में कहा गया है कि कोई भी कार्य स्वार्थवश व भौतिक लाभ से प्रेरित की आकांक्षा से किया जाता है तो वह सात्विक नहीं होता, रजोगुणी हो जाता है। कार्य तो सभी करते हैं परंतु केवल करने का हेतु जो भी मन में होता है, अगर उसमें कुछ लालच होता है, तो ही उसका गुण बदल जाता है। इसलिये हमें सिखाया जाता है कि अपना मन भी शुद्ध रखना है। अपने मन को भटकने नहीं देना है, अपने किसी भी कार्य को दंभपूर्वक न करें, न ही उसमें किसी सम्मान, सत्कार व पूजा की आकांक्षा रखें। वहीं अगर कोई कार्य आप बहुत अच्छा कर रहे हैं, परंतु उसका मंतव्य किसी को पीड़ा पहुँचाना, किसी को नीचा दिखाना या किसी को हानि पहुँचाना है तो आपकी इच्छा तामसी हो जाती है। केवल इच्छा मात्र से ही परिणाम बदल जाता है, गुण बदल जाता है।

अगर कोई भी कार्य आप कर रहे हैं तो कोशिश करें कि अपना मन साफ़ रखें, अपने मन में किसी के लिये बुराई न हो, न ही किसी के बारे में अहित सोचें, तभी वह कार्य सात्विक हो पायेगा। जहाँ दंभ, सम्मान, सत्कार व पूजा कराने की प्रवृत्ति आ जाती है, तो यह राजसी गुण हो जाता है। जिसे रजोगुण भी कहा जाता है।

आजकल दान देना कोई बहुत आसान कार्य नहीं है, क्योंकि यह सभी को भारी पड़ता है। ध्यान रखें कि जब दान देते हैं तो परोपकार की मंशा से, कर्तव्य समझकर, बिना किसी लाभ की भावना के, सही जगह व सही स्थान और सही व योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वही दान सात्विक माना जाता है। वैदिक साहित्य में अविचारपूर्ण दान की संस्तुति नहीं है। वहीं जो दान लाभ की भावना से, कर्मफल की इच्छा से या अनिच्छापूर्वक किया जाता है, दान का गुण बदल जाता है, ऐसा दान रजोगुणी कहलाता है। दान कभी स्वर्ग जाने के लिये दिया जाता है, तो कभी अत्यंत कष्ट से तथा कभी इस पश्चात्ताप के साथ कि मैंने इतना व्यय क्यों किया, कभी कभी अपने वरिष्ठजनों के दबाव में आकर भी दान दे देते हैं। तो ऐसे दान राजस गुण युक्त होते हैं।

वहीं जो दान किसी अपवित्र स्थान, अनुचित समय में, किसी अयोग्य व्यक्ति को या बिना समुचित ध्यान व आदर के साथ दिया जाता है, ऐसा दान तामसीगुण से प्रभावित माना जाता है।किसी ऐसे व्यक्ति या संस्था को दिया गया दान, जो कि मद्यपान व द्यूतक्रीड़ा में संलग्न हो, उन्हें दान नहीं देना चाहिये।इससे ग़लत कार्यों को प्रोत्साहन मिलता है।

क्रूरता का काल

यह क्रूरता का काल चल रहा है, इतने परिचितों की मौत की ख़बर ने अंदर तक हिलाकर रख दिया है, दिल मायूस है, लगता है कि कैसे अब उनका परिवार बिना उनके रहेगा। परंतु सत्य तो यही है कि किसी के बिना दुनिया रुकती नहीं है। कलियुग का सबसे बड़ा फ़ायदा ही यह है कि हम ज़्यादा दिन किसी बात को ध्यान नहीं रख पायेंगे, काल हमारी बुद्धि हर लेगा, हमारी याददाश्त कमजोर कर देगा। हमेशा ही कई लोगों से जीवन में ऊर्जा मिलती है, परंतु जब वे चले जाते हैं तो एक प्रकार सा मन में नकारात्मकता तो आ ही जाती है।

अब समय आ गया है कि जब हम अपना मोह त्यागें, और मज़बूत बनें क्योंकि कोई भरोसा ही नहीं कब कौन चला जायेगा, पता नहीं कौन इस वक़्त अपनी ज़िंदगी के लिये साँसों को थामे मौत से लड़ रहा होगा। पता नहीं मौत को इतना क़रीब से देखकर व्यक्ति अंतिम पल में कैसा महसूस करता होगा, सारे रिश्तेनाते, घरबार, पैसे, गहने सब यहीं छूट जायेगा। जिस पल व्यक्ति इस शरीर को छोड़ेगा, और उस पल जो उसके पास होंगे, वे लोग शायद ही उस पल को आजीवन भूल पायेंगे।

मुझे याद है जब एक मित्र के भाई की मृत्यु के बाद हम श्मशान में थे, तो एक मित्र ने मुझसे कहा था देख भई क्या है ये संसार, जब तक उन भैया के अंदर जान थी, साँसें ले रहे थे, तब तक वे इस दुनिया के लिये कुछ थे, पर अब कुछ नहीं, थोड़े समय बाद राख में बदल जायेंगे, कहने को वे अपने जीवन में बहुत कुछ थे, पर मरते समय कुछ काम न आया। मरने के बाद कोई तो ऐसा शहर होगा जहाँ आत्माओं को बसाया जाता होगा, शायद ये आत्मा कहीं अपने ही घर में किसी फूल की ख़ुशबू बन जाती है, या फिर किसी फूल का रूप ले लेती हो, पता ही नहीं चलता, यह एक अनसुलझी पहेली है।

बेहतर यह है कि हम अपने जीवन को ऐसे जियें कि जिसमें हम दूसरे को अपने स्वार्थवश कोई परेशानी में न डालें। जब हम मुसीबत में होते हैं तो कोई एक मदद का हाथ कहीं अनजाने में आता है, वह कोई परोपकारी आत्मा होती है। हम बस इतना ही ध्यान रखें कि इन सीमित संसाधनों में दूसरों की भी परेशानी समझें और निःस्वार्थ भाव से जितना हो सके उतनी एक दूसरे की मदद करें। मदद न कर सकें तो रोने के लिये कम से कम अपना कंधा तो आगे बढ़ा ही सकते हैं।

कोरोना के काल में बच्चों के सर्वांगीण विकास पर असर

कोरोना वायरस का यह समय केवल स्वास्थ्य के लिये ही नहीं, बल्कि जीवन के बहुत से पहलुओं के लिये सही नहीं है। यह कोरोना काल बेहद कठिन है, जिसे निकालना बहुत कष्टप्रद है। कोरोना के डर से न केवल बड़े, बूढ़े बल्कि बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं। बच्चों के लिये यह दौर बहुत कठिन हो रहा है, बच्चों का सर्वांगीण विकास चारदीवारी में सिमट कर रह गया है। बच्चा शुद्ध हवा के लिये भी तरस गया है।

बच्चों के लिये कोरोना बहुत कष्टप्रद साबित होता जा रहा है, बच्चों का बालपन सामाजिक तौर पर घुलने मिलने का होता है, इससे ही उन्हें समाज की बहुत सी बातों का पता चलता है, व बच्चे सामाजिक होते हैं। अब बच्चों को न पढ़ाई के लिये विद्यालय जाना है, न खेलने के लिये मैदान में, और जब बाहर जाना ही नहीं है तो दोस्तों से मिलने, उनसे बात करने की तो बात ही छोड़ दीजिये। बच्चे अपने मन की बात, दिल की बात आख़िर किस से कहें, दोस्त लोग होते हैं तो वे हँसी मज़ाक़ भी करते हैं, मस्तियाँ भी करते हैं, परंतु घर की चार दीवार में क़ैद होकर कौन मस्ती कर पाया है, स्वच्छंद हो पाया है।

बच्चों का अधिकतर समय कमरे के किसी एक कोने में अपने टेबल कुर्सी पर लेपटॉप, मोबाईल पर ऑनलाइन कक्षा में ही बीत जाता है, फिर उन पर गृहकार्य का भी दवाब होता है, कोई बच्चों की मनोदशा समझना नहीं चाहता, किसी के पास समय नहीं है। बच्चों में अब इस प्रकार की दिनचर्या को जीने की आदत सी हो गई है। बच्चों में अब सामाजिकता भी ख़त्म होती जा रही है। बच्चों में प्रश्न पूछने की कला, उत्तर देने की कला जो बच्चों के बीच किसी विद्यालय के कक्ष में आती है वह कभी भी मोबाईल या लेपटॉप के सामने विकसित होने की संभावना नहीं है।

न विद्यालय इस बात के लिये चिंतित हैं और न ही शिक्षक, वे तो बस अपनी कक्षा पूर्ण करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। बच्चों में प्रतियोगी भाव भी तभी आता है जब बच्चे एक दूसरे को देखते हैं। बच्चे आपस में ही बहुत कुछ सीखते हैं, जिसे घर में नहीं सिखाया जा सकता है, परंतु यह इन बच्चों का दुर्भाग्य कहें या ख़राब समय कि उनकी इस बालावस्था में कोरोना आया है। बच्चों में यह समय कहीं न कहीं बहुत गहरे उनके दिमाग़ में पूरी ज़िंदगी बैठी रहेगी। बच्चे जब बड़े भी हो जायेंगे, तो बहुत से व्यवहारिक परिवर्तन होंगे, कुछ अच्छे होंगे तो कुछ नहीं, यह तो अब भविष्य ही बतायेगा।

भैया का जाना मेरी व्यक्तिगत क्षति है

कोरोना में बहुत से अपने जा रहे हैं, कभी कोई बहुत करीबी तो कभी कोई जान पहचान वाला, तो कभी किसी दोस्त की जान पहचान वाला, दुख यही है कि सब जा रहे हैं। जाने से कोई रोक भी नहीं सकता, क्योंकि यह बीमारी है ही ऐसी ख़तरनाक, लोग फिर भी जान से क़ीमती कुछ ओर समझ रहे हैं, अपना ध्यान न रखकर खुलेआम बाज़ार में घूम रहे हैं, काश कि सभी लोग इस गंभीरता को समझें। कल अपने मित्र के व्हाट्सएप के स्टेटस से पता चला कि भैया अचानक ही कोरोना का ग्रास बन गये।

हालाँकि यादें धुँधली हैं, परंतु फिर भी मुझे याद आता है कि भैया से पहले मुलाक़ात धार में एकलव्य में हुई थी, और हम लोग वहाँ उनके एकलव्य के ऑफिस में जाकर कभी किताबें पढ़ा करते थे तो कभी कोई विज्ञान का कोई प्रयोग सीखा करते थे, बहुत सी बातें वहाँ से सीखीं, पर एक बात ओर पता चली कि व्यवहारिक विज्ञान सीखने में बहुत से लोगों की रुचि नहीं थी। हमें एकलव्य केवल इसलिये अच्छा लगता था कि वहाँ वैज्ञानिक गतिविधियों के साथ ही कुछ किताबें भी पढ़ने को मिलती थीं।उन्होंने ही बर्ड वाचिंग के बारे में बताया, कई बार उनके साथ गया और पक्षियों को जाना, तब पता चल कि बर्ड वाचिंग भी एक शौक़, एक विधा होती है।

जो किताबें वहाँ पढ़ने को मिलती थीं, उस तरह की किताबें बाज़ार में कहीं भी पढ़ने के लिये उपलब्ध नहीं थीं, ख़ासकर चकमक जिसमें हर तरह की विधा का समावेश हुआ करता था, भैया का छोटा भाई विष्णु मेरा अच्छा मित्र रहा और है, इस कारण उनसे पारिवारिक संबंध भी रहे, जब हम धार से झाबुआ चले गये तो यह बातचीत का दौर लगभग ख़त्म सा हुआ था, परंतु बीच बीच में उज्जैन आना जाना लगा रहता था, तब भैया उज्जैन में ही रहने आ गये थे, तब मैं कई बार उनसे मिलने उनके घर चला जाता था, वे तथा उनका परिवार बहुत ही आत्मीय थे, हैं। भैया का जाना मेरी व्यक्तिगत क्षति है, जिसे भरा नहीं जा सकता। यह आघात सहने का उनके परिवार को असीम बल मिले, और आत्मा को शांति मिले, यही प्रार्थना है।

लिखने में बहुत तकलीफ़ होती है, लिखते नहीं बनता, जब कोई बहुत आत्मीय चला जाता है, परंतु अब दौर इस प्रकार का आ गया है, कि हम जाने वाले के लिये कुछ कर नहीं सकते, जो लोग जीवित हैं, उनका बचाया जाना जरुरी है, ख़ुद को बचाना ही आज की सबसे बड़ी मानवता है, अगर आपने ख़ुद को बचा लिया तो यह समझ लीजिये कि आपने समाज के कम से कम 50 लोगों को बचा लिया।घर में रहिये सुरक्षित रहिये, बाहर जाना भी पड़े तो सुरक्षा के सारे उपाय जरुर अपनायें।

महाकाल कार्तिक मास सवारी

उज्जैन के एबले नि जूनी उज्जैन के महा एबले

उज्जैन में एक मित्र से बात हो रही थी दो दिन पहले –

मैं – भिया जै महाकाल

मित्र – जै माकाल

मैं – कोरोना कैसा फैल रिया है गुरु

मित्र – अरे फैलने दो अपने को कई, अपन तो धरमिंदर ओर अमिताभ के जैसे हो रिये हैं आजकल जान हथेली पे लेके घूम रिये हैं, मास्क वास्क सोसल डिस्टनसिंग चल री है, पन बार निकलना नि छोर सकते, पहले तो उज्जैनी तो एबले नि जूनी उज्जैन के महा एबले

हमने कहा भिया ध्यान रखो

भाई बोला – भिया पेट भी है परिवार भी है, एबले बनेंगे तो ही पेट भर पायेंगे नि परिवार चला पायेंगे।

हम शब्दहीन थे।


यह तो मित्रों की बात हुई परंतु कोरोना के कारण बेहद ही ख़राब स्थिति है अपना ध्यान रखें, अभी बातों के दौरान पता चला भाई से कि उनके एक मित्रवत मात्र 29 वर्ष की आयु में ही काल का ग्रास बन गये, वहीं उज्जैन में एक दंपत्ति को लगभग एक साथ ही कोरोना के शिकार हुए।

यहाँ भाषण नहीं करेंगे वो तो सभी लोग कर रहे हैं, परंतु इतना ध्यान रखें कि क्षणिक सुख के लिये कि बाहर न निकलें, जाना ज़रूरी हो तो पहले घर पर सारी चीजों की सूचि बनाकर रख लें, बार बार बाज़ार न जायें, ध्यान से रहें, अपने कारण परिवार को तकलीफ़ में न डालें, यह ऐसी बीमारी है जो परिजनों को तो डस ही लेगी साथ ही आपको आर्थिक तौर पर भी अच्छा ख़ासा नुक़सान पहुँचायेगी, जान पहचान क्या कोई करीबी भी आपकी चाहकर भी मदद नहीं कर पायेगा। सब कुछ आपके अपने हाथों में है।

घर पर रहें, मन न लगे तो भगवान में मन रमायें, भगवान में मन न लगे तो यूट्यूब देखकर कुछ सीख लें, न सीखने का मन हो तो जो भी आप करना चाह रहे थे, पर न कर पाये वही देख लें, मनोरंजन कर लें, बस घर पर रहें। ज़रूरी हो तभी बाहर निकलें, नहीं तो बस यह समझ लीजिये कि आप साक्षात यमराज को ही घर ला रहे हैं।

जिनको न पता हो उनके लिये – उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है।