मनीष हाड़ा उवाच (द्वितीय)
गूढ़ ज्ञान :-
* फैसला करूँ या न करूँ, ये फैसला है; फैसला कर न सकूँ, ये नाकामी है.
* बेवकूफ अगर अनगिनत हों तो उनकी ताक़त को कम कर के आंकना नादानी है.
* कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वाभाविक मूर्खता का मुकाबला नहीं कर सकती.
* आपके चारों ओर हाहाकार है,लेकिन आप शांत हैं तो इसका मतलब है कि स्थिति की गंभीरता आपके पल्ले नहीं पड़ी है.
* किसी चीज पर लिखा हो कि एक ही साइज़ सबको फिट आता है तो इसका मतलब है वो किसी को फिट नहीं होगा.
* इतना आसान कोई काम नहीं होता कि उसे बिगाड़ा न जा सके.
* खुद न करना पड़े तो कोई काम नामुमकिन नहीं होता.
* अगर आप कामयाब नहीं होते,तो इस बात के सारे सबूत नष्ट कर देना ही श्रेयस्कर होता है कि आपने कोशिश की थी.
* अगर आप कुशल कार्यकर्ता हैं तो सबसे ज्यादा काम आपके पल्ले पड़ेगा, आप अतिकुशल कार्यकर्ता हैं तो ज्यादा काम से पल्ला झाड़ने की जुगत आप यक़ीनन कर लेंगे.
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इसी का नाम दुनिया है : हमारे मित्र का उवाच –
हमारे मित्र हैं, जिनसे वर्षों हो चुके हैं मिले हुए उनके उवाच ( मनीष हाड़ा उवाच J
इसी का नाम दुनिया है :
* कोई दूसरा चमचागिरी करे तो वो जी-हुजूरी है,हम करें तो वो उच्चाधिकारी के लिए सम्मान है.
* कोई दूसरा टिप न दे तो वो कंजूस है,हम टिप न दें तो हम पैसे की कीमत समझने वाले हैं.
* कोई दूसरा “आउट” हो जाये तो वो पी के उधम मचाने वाला गैर-जिम्मेदार शख्स है,उन्ही हालत मैं हम पार्टी की जान हैं.
* कोई दूसरा कहीं लेट पहुंचे तो वो वक़्त का पाबन्द नहीं, हम वक़्त के गुलाम थोड़े ही हैं.
* कोई दूसरा मुंह फाड़े तो उसे अपनी जुबान पर काबू नहीं है,हम ऐसा करें तो इसलिए क्योंकि हम मुक्त संवाद में आस्था रखते हैं.
* कोई दूसरा नुक्ताचीनी करे तो वो खुन्दकी है,हम ऐसा करें तो हम पारखी निगाह रखते हैं.
* कोई दूसरा कोई नुकसान करे तो वो गैर-जिम्मेदार है,उसे कमाना नहीं पड़ता न, वही नुकसान हम करें तो आखिर गलती इंसान से ही होती है.
* कोई दूसरा चुगली करता है, हम वही कहते हैं जो सच है.
* कोई दूसरा टिप न दे तो वो कंजूस है,हम टिप न दें तो हम पैसे की कीमत समझने वाले हैं.
* कोई दूसरा “आउट” हो जाये तो वो पी के उधम मचाने वाला गैर-जिम्मेदार शख्स है,उन्ही हालत मैं हम पार्टी की जान हैं.
* कोई दूसरा कहीं लेट पहुंचे तो वो वक़्त का पाबन्द नहीं, हम वक़्त के गुलाम थोड़े ही हैं.
* कोई दूसरा मुंह फाड़े तो उसे अपनी जुबान पर काबू नहीं है,हम ऐसा करें तो इसलिए क्योंकि हम मुक्त संवाद में आस्था रखते हैं.
* कोई दूसरा नुक्ताचीनी करे तो वो खुन्दकी है,हम ऐसा करें तो हम पारखी निगाह रखते हैं.
* कोई दूसरा कोई नुकसान करे तो वो गैर-जिम्मेदार है,उसे कमाना नहीं पड़ता न, वही नुकसान हम करें तो आखिर गलती इंसान से ही होती है.
* कोई दूसरा चुगली करता है, हम वही कहते हैं जो सच है.
मेरे छोटे पहलवान के फ़ोटो, उसकी फ़ुटबॉल के फ़ोटो और मेरी एक किताब
सुबह का अलार्म अच्छा लगता है क्या “किर्र किर्र” ? आप भी बताईये अपने अनुभव…. ? हमने तो इस पर विजय प्राप्त कर ली :)
रोज सुबह उठने के लिये अलार्म की आवाज अच्छी लगती है क्या ?
अलार्म की “किर्र किर्र” किसे अच्छी लगती है, जब हमने सुबह घूमने जाने का निर्णय लिया था तब तो अलार्म दुश्मन जैसा जान पड़ता था कि “हाय” अभी तो मीठी नींद चल ही रही थी, अभी तो सोये ही थे और ये मुआ अलार्म बज पड़ा और जैसे ही अलार्म की किर्र किर्र कान में पड़ती, हम उसका टेंटुआ ऐसा दबाते कि जैसे किसी दुश्मन का दबाते हों, पर ये मुआ अलार्म तो रोज ही बजता जाता है। अगर दुश्मन का टेंटुआ दबाते तो वो शायद ही उठ पाते पर ये अलार्म जान पर ही आ पड़ता है।
अब धीरे धीरे अलार्म की जरुरत खत्म हो गयी है, हमारी जैविक घड़ी अब सक्रिय हो गई है। इसलिये अब अलार्म का “किर्र किर्र” करने का भाने या न भाने का संबंध ही खत्म हो गया है।
अब हमारी तो जैविक घड़ी अपनी सक्रियता से चल रही है, और हम तो अलार्म बजने के पहले ही उठ पड़ते हैं।
आप बताईये अपने अनुभव कि कैसा अनुभव है अलार्म का ….?
उच्च रक्ताचाप, चाय बिस्किट, चाय की नाट और पेट पर अत्याचार
रोज की दिनचर्या बदलती जा रही है सुबह की सैर और दवाईयाँ जीवनचर्या में शामिल हो गई है। बिना मसाले की सब्जियाँ, बिना घी की रोटी, अचार बंद, पापड़ बंद, मिठाईयाँ बंद, नमकीन बंद, तला हुआ बंद सब कुछ बंद, ये डॉक्टर है या क्या, सब कुछ बंद कर दिया, अब न खाने में स्वाद है और न ही खाने की इच्छा होती है, हम भी पक्के हैं कार्य के दिनों में यह सब पालन करते हैं और बाकी के दो दिन जमकर यही सब उड़ा लेते हैं।
अगर बाकी के दो दिन भी पूरा वही खाना खा लिया तो बस समझो कि अपन तो बहुत ही जल्दी सन्यासी होने वाले हैं, अरे जब कुछ खाना ही नहीं है तो नौकरी किसलिये करनी है, मजा में अपने शहर में जाकर ताजी हवा में रहें, इस महानगरी की दौड़ा दौड़ी से तो निजात मिलेगी।
दिनभर में चाय ४-५ आ जाती है पर अब हम २ पर टिक गये हैं, और चाय वाले समय अपनी सीट से गायब होने में ही अपनी भलाई समझते हैं। या फ़िर ये है कि आधी चाय ले ली जाये अब आती है तो मना तो करते नहीं बनता ना। क्योंकि चाय की नाट बुरी होती है।
दोपहर को खाना लेकर जाते हैं, मजे में खाना खाते हैं पर समस्या शुरु होती है ४बजे के बाद, लोगों को भूख लगने लग जाती है और चिप्स, बिस्किट और नमकीनों के पैकेट अपनी डेस्क पर ही खुलने शुरु हो जाते हैं, और हम अपने क्यूबिकल वालों को देखते रहते हैं, सोचते रहते हैं कि ये मुए कितनी कैलोरी खाते हैं, जैसे मेरी बंद हो गई है इन सबकी बंद हो जायेगी एक दिन।
चिप्स के पैकेट या नमकीन के पैकेट लाकर बिल्कुल हमारे सामने ला देंगे और फ़िर मुस्कराते हुए चिढ़ाते हुए कहेंगे “ले लो विवेक एक या दो से कुछ नहीं होगा” और अगर गलती से अपना ईमान डोल गया तो बस क्यूबिकल की दूसरी साईड से आवाज आ जायेगी “विवेक हाई बी.पी. है क्या कर रहे हो ?” सबकी सोची समझी साजिश जैसी लगती है। परंतु क्या करें हम तो बेचारे हो जाते हैं।
लिखने में ब्रेक हो गया था हमारे पारिवारिक मित्र के यहाँ रात्रिकालीन भोजन पर गये थे जहाँ दबाकर “दाल ढ़ोकली” और “खरबूजे का पना” खाया गया। विशेषकर आज बहुत दिनों बाद दो चीजें भोजन में मिली एक तो घी और दूसरी “मसाला युक्त भुनी हुई हरी मिर्चें”।
फ़िर शाम को ऑफ़िस से निकले तो गेट के बाहर ही कितने ही स्टॉल वाले खड़े रहते हैं, अब नाम हमसे बताया नहीं जायेगा नहीं तो यह पोस्ट पढ़ने के बाद हमारे उपर इल्जाम लगने लग जायेंगे कि खूब ऐश चल रही है और भी बहुत कुछ फ़लाना ढ़िमकाना …। फ़िर भीकाजी फ़ूडजंक्शन पड़ता है और समोसे आलूबड़े और भी गरम व्यंजनों की खुश्बुओं से अप्रभावित हुए बिना हम निकल लेते हैं सिग्नल के पास मूवी टाईम की ओर ऑटो पकड़ने के लिये, परंतु बीच में फ़िर एक सूखी भेलपूरी वाला मिल जाता है तो हम ५ रुपये में एक भेलपूरी ले लेते हैं ये सोचते हुए कि इसमें तो तला गला कुछ है नहीं खाया जा सकता है। कभी कभी उसके आगे भी रुक जाते हैं जहाँ एक पानी बताशे वाला है और इस बात पर तो हमारे एक मित्र ने घर पर शिकायत भी कर दी थी और खूब हंगामा हुआ था, और वह आज भी हमें धमकी दे देता है कि घर पर बोल दूँगा। पर फ़िर भी हम पर कोई असर नहीं है।
“दाल ढ़ोकली” हमने बहुतायत में खा ली है और हमारा पेटेंट डायलॉग बोल देते हैं कि “आज पेट पर अत्याचार कर दिया है”, इसलिये यहीं विराम देते हैं। बाकी किसी ओर दिन… जब खाने पर लिखने का मन होगा ।
मुंबई महानगरी में मित्रों के आपसी रिश्तों की गर्मी जो कि मोबाईल और मिलने से भी ज्यादा जरुरी है .. और चोकोलावा केक… यम्मी
रोज ही जिंदगी दौड़ती जा रही है, अपनी रफ़्तार से । कहने को तो मुंबई में रहते हैं, रफ़्तार जिंदगी की देखते ही बनती है, गर कभी रफ़्तार से छुट्टी मिल जाये तो मानो लॉटरी खुल गयी हो । सप्ताहांत पर पूर्ण विश्राम और अपने पारिवारिक मित्रों के साथ मेलजोल। पर एक बात है मुंबई में सामाजिक दायरा खत्म सा होता दिखता है, हमारे बहुत सारे मित्र हैं, जिसमें सभी श्रेणी के मित्र हैं जिगरी, लंगोटिया, नौकरी के दौरान जिनसे मन मिले इत्यादि।
अभी २ दिन पहले ही हमने अपने एक मित्र को फ़ोन लगाया तो पता चला कि उनका मोबाईल व्यस्त है और आवाज आ रही है “थोड़ा वेड़ानी काल करा”। मोबाईल भी करो तो अपना कॉल वेटिंग पर, बात हो जाये वही बहुत है, मिलना तो दूर की बात है, और फ़िर यहाँ की सभ्यता सीख गये हैं कि अगर मोबाईल व्यस्त है तो अपने आप ही काट दिया जाये और फ़िर याद रखकर बाद में वापिस से बात की जाये या फ़िर उसका फ़ोन आ जाये, पर फ़ोन आ जाये तो बहुत ही धन्य हैं आप कि आपके मित्र ने इतनी व्यस्तता के बीच आपसे बात करना जरुरी समझा, फ़िर एक बात यह भी है कि जब वह फ़्री हो और आप व्यस्त हों तो फ़िर अपन फ़ोन काटते हैं और एस.एम.एस. करते हैं कि “अभी व्यस्त हूँ, थोड़ी देर बाद कॉल करता हूँ” और वापसी में मित्र का एस.एम.एस. आ जाता है “ओके”। तो अपने मित्रता के संबंधों में भी बहुत सारी चीजें आ गयी हैं। पर फ़िर भी केवल दिल की बात है कि घनिष्ठता कम नहीं हुई है, क्योंकि हम लोगों ने मतलब मित्रों ने आपस में बहुत सारे ऐसे पल बिताये हैं जो कि हमें बहुत करीब ले आये हैं और एक दूसरे की परेशानी समझते हैं। इन छोटी सी बातों का हमारे मधुर संबंधों में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
यहाँ मुंबई में रिश्ते भी समय सीमा के भीतर निपटा लिये जाते हैं जिससे दोनों पार्टी खुश, क्योंकि सभी का समय कीमती है।
हमारे जिगरी मित्र से फ़ोन पर बात हो रही थी अरे वोही जिनका मोबाईल व्यस्त आ रहा था, उन्होंने अपने ऑफ़िस से फ़ोन किया था हमारे मोबाईल पर। तो बस हम भी बेतकल्लुफ़ हो लिये क्योंकि अपने पैसे भी नहीं लग रहे थे और अपने मित्र से दिल की बात भी कर रहे थे। वैसे भी आजकल फ़ोन पर बात करना बहुत ही सस्ता हो गया है, पहले फ़ोन पर बात करने के पहले सोच लेते थे कि केवल ५ मिनिट ही बात करेंगे पर अब मोबाईल की कॉल दर सस्ती हो गईं हैं तो अब उतना सोचना नहीं पड़ता और हाँ अवश्य ही आमदनी भी इसका एक कारण है।
हमने मित्र को बोला कि आ जाओ शनिवार को हमारे यहीं रुकना और रविवार को निकल लेना। क्योंकि मिले हुए लगभग १ वर्ष से ज्यादा हो चुका है, महानगर में एक तरफ़ का समय किसी के यहाँ जाने का हमारे लिये तो कुछ ज्यादा ही लगता है, कि दूसरे शहर ही जा रहे हों। हमारा मानस जो दूसरे शहर का है वह तो बदल नहीं सकता है ना !!! हमारे मित्र बोले कि शनिवार को तो त्रैमासिक ऑडिट आ रहा है और रिव्यू भी है ४-५ मुश्टंडे हैडऑफ़िस से आ रहे हैं, सारी खबर लेने के लिये। तो शाम को ४-५ तो आराम बज जायेंगे, उसके बाद आ जाते हैं, हमने आगे रहकर मनाकर दिया कि अगर ८ बजे तक आओगे फ़िर क्या खाक करोगे यहाँ आकर, केवल खाना खाकर निकल लोगे, क्यों भला हम तुम्हें इतनी तकलीफ़ दें। क्योंकि रविवार को रुकने का पहले ही मना कर चुके थे, उनको उनकी श्रीमती को उनकी दीदी के घर ले जाना था, हमने सलाह दी थी कि अगले रविवार पर टलवा दिया जाये ये दीदी के यहाँ का कार्यक्रम तो हमारे मित्र बोले “दादा !!! पिछले ४-५ रविवार से यही कर रहा हूँ”, और अगर इस बार नहीं ले गये तो समझो कि शनिवार को ऑफ़िस में रिव्यू और रविवार को घर में !!!
फ़िर बात हुई कि चलो अब किसी और रविवार का कार्यक्रम बनाया जायेगा।
विशेष – कल डोमिनोज पिज्जा खाया गया था और वहाँ पर सभी को चोकोलावा केक बहुत पसंद आया, अगर चॉकलेट के शौकीन हों तो जरुर चखें।
ये वॉचमेन को सारे बच्चे “मामा” क्यों बोलते हैं ? असुरक्षा की भावना पर एक प्रश्न … सभी के लिये …
आज बाजार जाते समय हम जैसे ही अपनी बिल्डिंग से बाहर निकलने लगे तभी वॉचमेन के पास कोई बच्चा आया और मामा कहकर कुछ बात कहने लगा। तो हमारी पत्नी जी ने हमारी तरफ़ मुखतिब होते हुए बोला कि ये सारे बच्चे लोग वॉचमेन को मामा क्यों कहते हैं। अनायास ही हमारे मुँह से इसका क्या जबाब निकला होगा …
जरा अंदाजा लगाईये….
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“जिससे इनकी मम्मी सुरक्षित रहें !!!”
बात मजाक की हो गई, (कृप्या महिला मंडल इस पर कोई बबाल न करे और आपसी पति पत्नी की नोंकझोंक मानकर भुला दे)
परंतु अगर मजाक की बात छोड़ दी जाये तो वाकई यह एक ज्वलंत प्रश्न है कि हम हमारे बच्चों को मामा बोलना क्यों सिखाते हैं, क्या यह हमारी असुरक्षा की भावना को कम करता है या कुछ और….. ?
पानी की विकराल समस्या और व्यक्तिगत रुप से पहल जरुरी, प्रतिबद्धता दिखाना पड़ेगी
पानी याने कि जल हमारे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है, पानी अगर समाज में सौहार्द और समृद्धि लाता है तो उसके उलट याने कि पानी न होने की दशा में पानी समाज का सौहार्द बिगाड़ता भी है और रही बात समृद्धि की तो बिना सौहार्द किसी समाज में समृद्धि नहीं आ सकती।
जीवित प्राणियों की संख्या धरती पर दिनबदिन बड़ती ही जा रही है और साथ ही पानी की खपत भी, हम पानी की खपत करने में हमेशा से आगे रहे हैं परंतु पानी को बचाने में या पानी को कैसे पैदा किया जाये उसके लिये प्रयत्नशील नहीं हैं। अगर हम लोग इस दिशा में प्रयत्नशील नहीं हुए तो जिस भयावह स्थिती का सामना करना पड़ेगा वह कोई सोच भी न पायेगा।
आज अगर लूट भौतिकतावादी वस्तुओं की है जो कि विलासिता की श्रेणी में आती हैं, अगर हम लोग पानी को बचाने में सफ़ल नहीं हुए तो पानी भी जल्दी ही विलासिता की श्रेणी में शुमार हो जायेगा। सब कहते हैं, नारा लगाते हैं “जल ही जीवन है”, “जल बिन सब सून”, “जल अनमोल है”। परंतु उपयोग करते समय शायद यह सब भूल जाते हैं और अपने अहम को संतुष्ट करने के लिये पानी का दुरुपयोग करते हैं।
अपनी इच्छाशक्ति की कमी के चलते हुए ही हम पानी के दुरुपयोग को रोक नहीं पा रहे हैं, अगर आज भी ईमानदारी से जल के क्षरण को रोक लें । प्रण करें कि जितना पानी हम रोज उपयोग कर रहे हैं, उसे अनमोल मानते हुए बचायें और पूरे समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करें। जितना पानी का उपयोग आज कर रहे हैं, कोशिश करें कि उसका आधा पानी में ही अपनी सारी गतिविधियों को समाप्त कर लिया जाये।
नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब पानी के लिये तरसना होगा और ये पानी की टंकियां और पानी के पाईप हमारी धरोहर होंगी, हमारी आगे की पीढ़ियाँ पानी के उपयोग से वंचित हों। आज हमारे लिये उस भयावह स्थिती का अंदाजा लगाना बहुत ही कठिन है, क्योंकि हमारे पास पानी है। उस समय हो सकता है कि पानी केवल आर्थिक रुप से संपन्न लोगों की बपौती बनकर रह जाये और वे पानी को बेचकर उसके बल पर ही आर्थिक रुप से संपन्न हों, जैसे रेगिस्तान में पानी के कुओं से पानी बिकता है वैसे ही इस शहरी सभ्यता में भी पानी बिकने लगे। जो कि मानव सभ्यता के लिये बहुत बड़ा सदमा होगा।
ऑनसाईट जाने की खुशी, परिवार की
“ऐ मिडम इधर का सेठ किधर है, अपुन के भाई को बात करने का है”
कभी कभी कुछ पुरानी यादें चाहे अनचाहें अपने आप जहन में आ जाती हैं, और उसमें हास्य का पुट भी होता है तो गंभीरता भी। ऐसी ही एक बात हमें हमारे पढ़ाई के समय की याद आ गई, हम कम्प्यूटर कोर्स कर रहे थे और उस समय कम्प्यूटर कोर्स करना एक फ़ैशन जैसा था कि अगर कॉलेज में पढ़ने वाले ने कोर्स नहीं किया तो उसका जीवन ही बेकार है या बेचारा अनपढ़ ही रह गया। हालांकि जॉब के तो दूर दूर तक अते पते नहीं थे कि इस कोर्स करने से क्या फ़ायदा होने वाला है, परंतु कम्प्यूटर संस्थानों का शायद वह स्वर्णिम युग था, खूब पैसा कमाया सारे संस्थानों ने उस स्वर्णिम काल में।
हम भी एक नामी संस्थान में डिप्लोमा कोर्स कर रहे थे, और फ़ीस इतनी कि सुनकर अच्छे अच्छे फ़न्ने खाँ को पसीना आ जाये, और जॉब के नाम पर कोई ग्यारण्टी नहीं। हमारे जूनी उज्जैन के कुछ इलाके हैं जो कि अपने आप में बहुत प्रसिद्ध हैं जैसे कि सिंहपुरी, तोपखाना, गुदरी इत्यादि। उस जमाने में तो इन इलाकों के नाम से ही दहशत टपकती थी, हालांकि सिंहपुरी विद्वत्ता के लिये भी प्रसिद्ध है और रहा है।
सिंहपुरी पंडितों की बस्ती है जहाँ अभिवादन की परंपरा भी निराली है, अगर दूसरे से हाल पूछना है तो पूछेंगे “देवता कई हालचाल हैं, आशीर्वाद तो हैं नी” मालवी भाषा के साथ, वहीं इस इलाके में सिंह लोगों का भी निवास था जो कि कर्म से सिंह थे याने कि धर्म से सिंह और धर्म की रक्षा हेतु हमेशा तत्पर ।
हमारे संस्थान में एक लड़की पढ़ती थी जो कि किसी सिंह की बहन थी और संस्थान ने उससे कुछ वादा किया होगा कि कम फ़ीस लेंगे या कुछ ओर हमें ज्यादा जानकारी नहीं है, तो संस्थान में उस लड़की का कुछ विवाद चल रहा था। हमारी क्लास का समय सुबह ७ बजे होता था हम हमारी क्लास में अध्ययन कर रहे थे और हमारी क्लास जो कि बिल्कुल मुख्य द्वार के सामने थी, जहाँ से हम मुख्य द्वार की सारी गतिविधियों पर नजर रख सकते थे।
माधव कॉलेज स्टाईल (ये भी बतायेंगे किसी ओर पोस्ट में) में १०-१२ लड़के धड़धड़ाते हुए संस्थान में घुस आये और सोफ़े पर धँस गये और जो वहाँ बैठे थे उन्हें उठाकर संस्थान से बाहर जाने का इशारा कर दिया गया तो बेचारे चुपचाप बाहर निकल गये। और एक चमचा स्टाईल का बंदा हाथ में हथियार लहराते हुए संस्थान में किससे बात करनी है उसे ढूँढ रहा था कि उसे एक केबिन में एक मैडम दिखाई दीं तो वहीं चिल्लाकर बोला “ऐ मिडम इधर का सेठ किधर है, अपुन के भाई को बात करने का है”। फ़िर मैडम ने जैसे तैसे उन सबको शांत किया और सर को बुलाकर लाईं और बंद केबिन में कुछ शांतिवार्ता हुई, और वापिस से सिंह लोग माधव कॉलेज स्टाईल में बाहर निकल गये।
पर सिंहपुरी के सिंहों का वाक्य आज भी जहन में गूँजता है तो बरबस ही उसमें हमें हास्य का पुट मिलता है।




