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मेरी चाहतें ….. रोज उठना ना पड़ता, रोज नहाना न पड़ता…, रोज खाना ना पड़ता…, काश कि बुशर्ट भी पेंट जैसी ही होती…, जिससे प्रेस जल्दी होती.. ।

    रोज रात को सोने के बाद …. सुबह उठना क्यों पड़ता है … कितना अच्छा होता कि …. रोज उठना ना पड़ता, रोज नहाना न पड़ता…, रोज खाना ना पड़ता…, रोज पानी ना भरना पड़ता, रोज बस मीठी नींद के आगोश में रहते…, रोज सुबह की सैर पर नहीं जाना पड़ता…, रोज ऑफ़िस न जाना पड़ता…, सप्ताहांत सप्ताह में एक की जगह दो होते…

    ऐसी मेरी चाहें तो अनगिनत हैं पर कभी पूरी नहीं होती हैं, सब सपना सा है, दो दिन सप्ताहांत पर आराम करने के बाद सोमवार को ऑफ़िस जाना जान पर बन आता है, कि हाय ये सोमवार इतनी जल्दी क्यों आ गया, हमने ऐसा कौन सा पाप किया था, कि ये ऑफ़िस में हर सोमवार को आना पड़ता है।

    शुक्रवार को तो मन सुबह से प्रसन्न होता रहता है कि बेटा बस आज और काम करना है फ़िर तो दो दिन आराम, अहा !!! कितना मजा आयेगा।

    पर चाहतें भला कब किसकी पूरी हुई हैं, ये पंखा देखो न कितनी आवाज करता है…, सोचने में विघ्न डालता है…, बंद कर दो तो पसीना सर्र से बहने लगता है…, काश कि मैं अभी कहीं ठंडे प्रदेश में छुट्टियाँ काट रहा होता…, वहाँ की वादियों को देखकर मन में सुकून काट रहा होता…, रोज ये चिल्लपों सुनकर तंग आ गया हूँ…, क्यों पेंट पर जल्दी प्रेस (इस्त्री) हो जाती है …., और बुशर्ट पर समय क्यों लगता है…, काश कि बुशर्ट भी पेंट जैसी ही होती…, जिससे प्रेस जल्दी होती.. । इस्त्री की जगह कोई ऐसी मशीन होती कि उसमें कपड़े डालो तो धुल भी जाये और इस्त्री होने के बाद बिल्कुल तह बन कर अपने आप बाहर आ जाये …, और अपने आप अलमीरा में जम जायें।

    चाहतों का कोई अंत नहीं है…, अभी दरवाजे पर दस्तक हुई है … शायद अखबार आया है…, तीन तीन अखबार और मैं इत्ती सी जान…, काश कि इन अखबारों को पढ़ना न पड़ता…, कोई अखबार का काढ़ा आता … हम उसे पी जाते और उसका ज्ञान अपने आप दिमाग में चला जाता…, पर ऐसा नहीं है… इसलिये हम चले अखबार बांचने और आप जाओ टिप्पणी बक्से में टीपने, और पसंद का चटका लगाने…।

ऐसे ही कीबोर्ड तोड़ता रहूँगा… “यार अपनी किस्मत में तो सटर्डे और सन्डे कपड़े धोना ही लिखा है” … आधुनिक युग में मजदूरी… स्क्रोल व्हील

    क्या लिखूँ समझ में नहीं आ रहा है, क्यों लिखूँ ये भी समझ में नही आ रहा है, बस लिखना है इसलिये लिखते जा रहा हूँ, बहता जा रहा हूँ और ये क्रम रोज ही जारी है, परेशान भी नहीं हो रहा हूँ…. और ना ही परेशान होने की कोशिश कर पाता हूँ…
    कहीं दूर मन में छन से आवाज आती रहती है, कि क्या जिंदगी में पाने के लिये आये हो… क्या कर रहे हो … क्या तुम अपने आप से सन्तुष्ट हो… या अपने में ही अपनी चिंगारी दबाते जा रहे हो… और रोज रोज अपने में ही मरे जा रहे हो… क्या है यह … जिंदगी बहुत तेजी से दौड़ती जा रही है … जैसे रोज कीबोर्ड पर हमारी ऊँगलियाँ … ऊँगलियाँ कीबोर्ड पर दौड़ती नहीं हैं … मजबूरी में चल रही होती हैं … कोई अंदर से चीख रहा है कब तक मैं उसकी आवाज नही सुनूँगा … और ऐसे ही कीबोर्ड तोड़ता रहूँगा… हमेशा दिल घबराया हुआ सा रहता है … आँखें पथरायी हुई सी रहती हैं।
    अब वो देखने की कोशिश कर रहा हूँ जो होता तो है पर मैं उस तरफ़ ध्यान नहीं देता हूँ या सिंपली कहूँ इग्नोर कर देता हूँ..।
    मेरी दिनचर्या के कुछ दृश्य जो घटित तो रोज होते हैं, पर ध्यान मैंने आज दिया –

१. वाशरूम – दो लड़के जो मुंबई से कहीं बाहर से आये हुए लग रहे है, आज शुक्रवार है, इसलिये सब लोग जीन्स और टीशर्ट में ही दिख रहे हैं, मैं लघुशंका के लिये शौचालय खाली है ?, ढ़ूँढ़ता हूँ और कान में उन लड़कों की बातें भी सुनाई दे रही हैं… देखिये हमारा शरीर भी कितना मल्टीटास्किंग है .. हाथ से हम वाशरुम का दरवाजा खोल रहे हैं और कानों से उन दोनों लड़कों की बातें सुन रहे हैं, पहला लड़का दूसरे से “अरे यार कल फ़िर धोबी बनने का दिन आ गया है”, दूसरा बोला “यार अपनी किस्मत में तो सटर्डे और सन्डे कपड़े धोना ही लिखा है”, “कितने साल हो गये कपड़े धोते हुए ….!!!” । इतने में हम वाशरुम के अंदर चले जाते हैं, और वो आवाजें सुनाई देना बंद हो जाती हैं, पर अपने अंदर से आवाज आने लगती हैं, “सोच क्या रहा है, बेटा थोड़े समय पहले तेरी भी यही हालत होती थी, बस अब तेरे दिन फ़िर गये हैं”, और यही सोचते हुए वापिस अपने क्यूबिकल तक आ गये।

२. कैंटीन – शाम चार बजते बजते दिन बोझिल सा होने लगा है.. जैसे इस नीरस सी जिंदगी में और कुछ बचा ही नहीं है … अंदर ए.सी. की ठंडी हवा भी अजीब सी घुटन पैदा करती है … आज भूख कुछ ज्यादा लगी तो सोचा कि चलो आज कैंटीन में कुछ खा लेते हैं .. पता चला कि आज मिस्सल पाव है … पहले तो मन एकदम खिल गया कि चलो आज यही खा लेते हैं … वैसे भी अपना मनपसंद है … पर जैसा हर बार होता है … अपने साथ … वही हुआ … पाव खत्म हो गया और ब्रेड से मिस्सल खानी पड़ी … हर बार ऐसा ही होता है जिंदगी में, मैं सोच में डूब गया कि मुझे जो चाहिये होता है या जो करने का मन होता है वह या तो होता ही नही है या फ़िर कुछ हिस्सा बचा होता है … और हमेशा हम अपनी कुँडली को कोसते रहते हैं, क्योंकि इसमें हम कुछ कर नही सकते हैं।
३. क्यूबिकल – अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा हम इस क्यूबिकल में गुजार देते हैं, जहाँ बेजान सी लकड़ी की डेस्क, सामने काँच का पार्टीशन, एक फ़ोन, पानी की बोतल और हर समय कोसता हुआ खाली चाय का कप रहता है, पास ही भगवान श्रीकृष्ण का फ़ोटो जो काम के बीच में याद दिलाता रहता है कि तुम अभी भी जिंदा हो और तुम्हारी जिंदगी में धार्मिकता बची हुई है, अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठकर मजदूरी करके शाम को ए.सी. की तपन से बाहर आकर गरम हवा बिल्कुल हिमालय की ताजगी देती है।
४. मजदूर – आज के इस आधुनिक युग में मजदूरी की परिभाषा वही है, बस मजदूरी बदल गयी है, काम बदल गया है, मजदूरी का पैमाना बदल गया है, हम धूप में पत्थर नहीं तोड़ते हैं न ही हमारा शरीर हट्टा कट्टा है और न ही शरीर से पसीना चू रहा होता है … और न ही सूखी रोटी खा रहे होते हैं … केवल एक ही समानता है विद्रुप आहत दिल। और मजदूर मजबूरी में, जो कि केवल पैसे के लिये अपने दिल और मन  पर बारबार चोट कर रहा है। हम हुए आधुनिक मजदूर पर दिल और मन से बिल्कुल अभिन्न हैं पारंपरागत मजदूरी से …  हम उससे जुड़े हुए हैं।
५. माऊस – अपनी कुर्सी में धँसकर केवल माऊस चलाते जाओ, कभी लेफ़्ट क्लिक करो कभी राईट, कभी स्क्रोल व्हील घुमाते रहो। इतने साल हो गये इस माऊस को पर देखो टेक्नोलाजी कि माऊसे आगे की कोई चीज आयी ही नहीं, वो बेचारा माऊस सोच रहा होगा कि ये इंसा कब तक ट्रेकबाल या रोशनी के सहारे मुझे दौड़ाता रहेगा, मुझे भी आजादी दो, मुक्ति दो मैं थक गया हूँ।

उज्जैन की प्रसिद्ध चीजों के बारे में, हमारे मित्र “बल्लू” का एस.एम.एस

हमारे प्रिय मित्र ने एक एस.एम.एस. भेजा था जिसमें उज्जैन की वो लगभग सारी चीजें हैं जिससे हरेक उज्जैनवासी का लगाव हो न हो पर हमारे मित्र मंडल का लगाव बहुत है आप भी पढ़िये उज्जैन की प्रसिद्ध चीजों के बारे में, और यकीन मानिये अगर आप उज्जैन में रहते हैं और नीचे लिखी एक भी चीज को नहीं जानते हैं तो निकल पड़ें, और ढूँढें, और सूचि को पूरा करें –

हमारे मित्र बल्लू का एस.एम.एस. बल्लू हम मित्र को प्यार से बोलते हैं ।

वो महाकालेश्वर का मंदिर
वो टेकड़ी की चढ़ाई
वो भोलागुरु के गुलाबजामुन
वो टॉप एन टाऊन की आईसक्रीम
वो क्षीरसागर स्टेडियम के मैच
वो विक्रमवाटिका की हरियाली
वो जैन की कचौरी
वो पेटिस लक्ष्मी बेकरी वाला
वो नरेन्द्र टाकीज की मूवीज
वो श्री की फ़ेक्टरी
वो शहनाई की शादियाँ
वो गंगा बेकरी के पेस्ट्री
वो बस स्टैंड का पोहा
वो मद्रासी का डोसा
वो आनंद की चाट
वो ओम विलास का समोसा
वो इस्कॉन की रौनक
वो सर्राफ़े की गलियाँ
वो ऐरोड्रम का सन्नाटा
वो राजकुमार की दाल
वो मामा की दुकान का पान
वो बल्लू की दोस्ती
यही सब तो है हमारे उज्जैन की शान

भारत के विभिन्न भागों में कार ड्राइविंग :-

मनीष हाड़ा उवाच


भारत के विभिन्न भागों में कार ड्राइविंग :-

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर,दूसरा हार्न पर.

यू.पी.

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर, दूसरा खिड़की से बाहर.

पंजाब

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर, दूसरा अखबार पर,पाँव एक्सीलेटर पर.

तमिलनाडु

* दोनों हाथ स्टियरिंग व्हील पर,आँखें बंद, दोनों पाँव ब्रेक पर.

बिहार

* दोनों हाथ इशारे करते हवा में, दोनों पाँव एक्सीलेटर पर, सिर पिछली सीट के सवार से बात करने के लिए एक सौ अस्सी के अंश पर घूमा हुआ.

हरियाणा

* एक घुटना स्टियरिंग व्हील पर,एक हाथ पेसेंजर सीट पर बैठी गर्ल फ्रेंड की पीठ पर, दूसरा उसके गिरहबान में, दूसरा पाँव दक्षता से बारी-बारी एक्सीलेटर, क्लच,ब्रेक पर.

इंदौर.

* एक हाथ हार्न पर-वहां नहीं तो खिड़की से बाहर -दूसरा गियर स्टिक पर,एक कान स्टीरियो सुनता,दूसरा मोबाइल सुनता,एक पाँव एक्सीलेटर पर,एक क्लच पर,ब्रेक पर कोई नहीं,दोनों आँखें बाजू में स्कूटी चलाती लड़की पर.

धार में आपका स्वागत है

गूढ़ ज्ञान :- हमारे मित्र का उवाच –

मनीष हाड़ा उवाच (द्वितीय)

गूढ़ ज्ञान :-

* फैसला करूँ या न करूँ, ये फैसला है; फैसला कर न सकूँ, ये नाकामी है.
* बेवकूफ अगर अनगिनत हों तो उनकी ताक़त को कम कर के आंकना नादानी है.
* कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वाभाविक मूर्खता का मुकाबला नहीं कर सकती.
* आपके चारों ओर हाहाकार है,लेकिन आप शांत हैं तो इसका मतलब है कि स्थिति की गंभीरता आपके पल्ले नहीं पड़ी है.
* किसी चीज पर लिखा हो कि एक ही साइज़ सबको फिट आता है तो इसका मतलब है वो किसी को फिट नहीं होगा.
* इतना आसान कोई काम नहीं होता कि उसे बिगाड़ा न जा सके.
* खुद न करना पड़े तो कोई काम नामुमकिन नहीं होता.
* अगर आप कामयाब नहीं होते,तो इस बात के सारे सबूत नष्ट कर देना ही श्रेयस्कर होता है कि आपने कोशिश की थी.
* अगर आप कुशल कार्यकर्ता हैं तो सबसे ज्यादा काम आपके पल्ले पड़ेगा, आप अतिकुशल कार्यकर्ता हैं तो ज्यादा काम से पल्ला झाड़ने की जुगत आप यक़ीनन कर लेंगे.

इसी का नाम दुनिया है : हमारे मित्र का उवाच –

हमारे मित्र हैं, जिनसे वर्षों हो चुके हैं मिले हुए उनके उवाच ( मनीष हाड़ा उवाच J

इसी का नाम दुनिया है :

* कोई दूसरा चमचागिरी करे तो वो जी-हुजूरी है,हम करें तो वो उच्चाधिकारी के लिए सम्मान है.
*
कोई दूसरा टिप न दे तो वो कंजूस है,हम टिप न दें तो हम पैसे की कीमत समझने वाले हैं.
*
कोई दूसरा “आउट” हो जाये तो वो पी के उधम मचाने वाला गैर-जिम्मेदार शख्स है,उन्ही हालत मैं हम पार्टी की जान हैं.
*
कोई दूसरा कहीं लेट पहुंचे तो वो वक़्त का पाबन्द नहीं, हम वक़्त के गुलाम थोड़े ही हैं.
*
कोई दूसरा मुंह फाड़े तो उसे अपनी जुबान पर काबू नहीं है,हम ऐसा करें तो इसलिए क्योंकि हम मुक्त संवाद में आस्था रखते हैं.
*
कोई दूसरा नुक्ताचीनी करे तो वो खुन्दकी है,हम ऐसा करें तो हम पारखी निगाह रखते हैं.
*
कोई दूसरा कोई नुकसान करे तो वो गैर-जिम्मेदार है,उसे कमाना नहीं पड़ता न, वही नुकसान हम करें तो आखिर गलती इंसान से ही होती है.
*
कोई दूसरा चुगली करता है, हम वही कहते हैं जो सच है.

सुबह का अलार्म अच्छा लगता है क्या “किर्र किर्र” ? आप भी बताईये अपने अनुभव…. ? हमने तो इस पर विजय प्राप्त कर ली :)

रोज सुबह उठने के लिये अलार्म की आवाज अच्छी लगती है क्या ?
अलार्म की “किर्र किर्र” किसे अच्छी लगती है, जब हमने सुबह घूमने जाने का निर्णय लिया था तब तो अलार्म दुश्मन जैसा जान पड़ता था कि “हाय” अभी तो मीठी नींद चल ही रही थी, अभी तो सोये ही थे और ये मुआ अलार्म बज पड़ा और जैसे ही अलार्म की किर्र किर्र कान में पड़ती, हम उसका टेंटुआ ऐसा दबाते कि जैसे किसी दुश्मन का दबाते हों, पर ये मुआ अलार्म तो रोज ही बजता जाता है। अगर दुश्मन का टेंटुआ दबाते तो वो शायद ही उठ पाते पर ये अलार्म जान पर ही आ पड़ता है।
अब धीरे धीरे अलार्म की जरुरत खत्म हो गयी है, हमारी जैविक घड़ी अब सक्रिय हो गई है। इसलिये अब अलार्म का “किर्र किर्र” करने का भाने या न भाने का संबंध ही खत्म हो गया है।
अब हमारी तो जैविक घड़ी अपनी सक्रियता से चल रही है, और हम तो अलार्म बजने के पहले ही उठ पड़ते हैं।
आप बताईये अपने अनुभव कि कैसा अनुभव है अलार्म का ….?

उच्च रक्ताचाप, चाय बिस्किट, चाय की नाट और पेट पर अत्याचार

    रोज की दिनचर्या बदलती जा रही है सुबह की सैर और दवाईयाँ जीवनचर्या में शामिल हो गई है। बिना मसाले की सब्जियाँ, बिना घी की रोटी, अचार बंद, पापड़ बंद, मिठाईयाँ बंद, नमकीन बंद, तला हुआ बंद सब कुछ बंद, ये डॉक्टर है या क्या, सब कुछ बंद कर दिया, अब न खाने में स्वाद है और न ही खाने की इच्छा होती है, हम भी पक्के हैं कार्य के दिनों में यह सब पालन करते हैं और बाकी के दो दिन जमकर यही सब उड़ा लेते हैं।

    अगर बाकी के दो दिन भी पूरा वही खाना खा लिया तो बस समझो कि अपन तो बहुत ही जल्दी सन्यासी होने वाले हैं, अरे जब कुछ खाना ही नहीं है तो नौकरी किसलिये करनी है, मजा में अपने शहर में जाकर ताजी हवा में रहें, इस महानगरी की दौड़ा दौड़ी से तो निजात मिलेगी।

    दिनभर में चाय ४-५ आ जाती है पर अब हम २ पर टिक गये हैं, और चाय वाले समय अपनी सीट से गायब होने में ही अपनी भलाई समझते हैं। या फ़िर ये है कि आधी चाय ले ली जाये अब आती है तो मना तो करते नहीं बनता ना। क्योंकि चाय की नाट बुरी होती है।

    दोपहर को खाना लेकर जाते हैं, मजे में खाना खाते हैं पर समस्या शुरु होती है ४बजे के बाद, लोगों को भूख लगने लग जाती है और चिप्स, बिस्किट और नमकीनों के पैकेट अपनी डेस्क पर ही खुलने शुरु हो जाते हैं, और हम अपने क्यूबिकल वालों को देखते रहते हैं, सोचते रहते हैं कि ये मुए कितनी कैलोरी खाते हैं, जैसे मेरी बंद हो गई है इन सबकी बंद हो जायेगी एक दिन।

    चिप्स के पैकेट या नमकीन के पैकेट लाकर बिल्कुल हमारे सामने ला देंगे और फ़िर मुस्कराते हुए चिढ़ाते हुए कहेंगे ले लो विवेक एक या दो से कुछ नहीं होगा और अगर गलती से अपना ईमान डोल गया तो बस क्यूबिकल की दूसरी साईड से आवाज आ जायेगी विवेक हाई बी.पी. है क्या कर रहे हो ?सबकी सोची समझी साजिश जैसी लगती है। परंतु क्या करें हम तो बेचारे हो जाते हैं।

    लिखने में ब्रेक हो गया था हमारे पारिवारिक मित्र के यहाँ रात्रिकालीन भोजन पर गये थे जहाँ दबाकर दाल ढ़ोकली और खरबूजे का पना खाया गया। विशेषकर आज बहुत दिनों बाद दो चीजें भोजन में मिली एक तो घी और दूसरी मसाला युक्त भुनी हुई हरी मिर्चें

    फ़िर शाम को ऑफ़िस से निकले तो गेट के बाहर ही कितने ही स्टॉल वाले खड़े रहते हैं, अब नाम हमसे बताया नहीं जायेगा नहीं तो यह पोस्ट पढ़ने के बाद हमारे उपर इल्जाम लगने लग जायेंगे कि खूब ऐश चल रही है और भी बहुत कुछ फ़लाना ढ़िमकाना …। फ़िर भीकाजी फ़ूडजंक्शन पड़ता है और समोसे आलूबड़े और भी गरम व्यंजनों की खुश्बुओं से अप्रभावित हुए बिना हम निकल लेते हैं सिग्नल के पास मूवी टाईम की ओर ऑटो पकड़ने के लिये, परंतु बीच में फ़िर एक सूखी भेलपूरी वाला मिल जाता है तो हम ५ रुपये में एक भेलपूरी ले लेते हैं ये सोचते हुए कि इसमें तो तला गला कुछ है नहीं खाया जा सकता है। कभी कभी उसके आगे भी रुक जाते हैं जहाँ एक पानी बताशे वाला है और इस बात पर तो हमारे एक मित्र ने घर पर शिकायत भी कर दी थी और खूब हंगामा हुआ था, और वह आज भी हमें धमकी दे देता है कि घर पर बोल दूँगा। पर फ़िर भी हम पर कोई असर नहीं है।

    “दाल ढ़ोकलीहमने बहुतायत में खा ली है और हमारा पेटेंट डायलॉग बोल देते हैं कि आज पेट पर अत्याचार कर दिया है, इसलिये यहीं विराम देते हैं। बाकी किसी ओर दिन… जब खाने पर लिखने का मन होगा ।

मुंबई महानगरी में मित्रों के आपसी रिश्तों की गर्मी जो कि मोबाईल और मिलने से भी ज्यादा जरुरी है .. और चोकोलावा केक… यम्मी

    रोज ही जिंदगी दौड़ती जा रही है, अपनी रफ़्तार से । कहने को तो मुंबई में रहते हैं, रफ़्तार जिंदगी की देखते ही बनती है, गर कभी रफ़्तार से छुट्टी मिल जाये तो मानो लॉटरी खुल गयी हो । सप्ताहांत पर पूर्ण विश्राम और अपने पारिवारिक मित्रों के साथ मेलजोल। पर एक बात है मुंबई में सामाजिक दायरा खत्म सा होता दिखता है, हमारे बहुत सारे मित्र हैं, जिसमें सभी श्रेणी के मित्र हैं जिगरी, लंगोटिया, नौकरी के दौरान जिनसे मन मिले इत्यादि।

    अभी २ दिन पहले ही हमने अपने एक मित्र को फ़ोन लगाया तो पता चला कि उनका मोबाईल व्यस्त है और आवाज आ रही है थोड़ा वेड़ानी काल करा। मोबाईल भी करो तो अपना कॉल वेटिंग पर, बात हो जाये वही बहुत है, मिलना तो दूर की बात है, और फ़िर यहाँ की सभ्यता सीख गये हैं कि अगर मोबाईल व्यस्त है तो अपने आप ही काट दिया जाये और फ़िर याद रखकर बाद में वापिस से बात की जाये या फ़िर उसका फ़ोन आ जाये, पर फ़ोन आ जाये तो बहुत ही धन्य हैं आप कि आपके मित्र ने इतनी व्यस्तता के बीच आपसे बात करना जरुरी समझा, फ़िर एक बात यह भी है कि जब वह फ़्री हो और आप व्यस्त हों तो फ़िर अपन फ़ोन काटते हैं और एस.एम.एस. करते हैं कि अभी व्यस्त हूँ, थोड़ी देर बाद कॉल करता हूँ और वापसी में मित्र का एस.एम.एस. आ जाता है ओके। तो अपने मित्रता के संबंधों में भी बहुत सारी चीजें आ गयी हैं। पर फ़िर भी केवल दिल की बात है कि घनिष्ठता कम नहीं हुई है, क्योंकि हम लोगों ने मतलब मित्रों ने आपस में बहुत सारे ऐसे पल बिताये हैं जो कि हमें बहुत करीब ले आये हैं और एक दूसरे की परेशानी समझते हैं। इन छोटी सी बातों का हमारे मधुर संबंधों में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।

    यहाँ मुंबई में रिश्ते भी समय सीमा के भीतर निपटा लिये जाते हैं जिससे दोनों पार्टी खुश, क्योंकि सभी का समय कीमती है।

    हमारे जिगरी मित्र से फ़ोन पर बात हो रही थी अरे वोही जिनका मोबाईल व्यस्त आ रहा था, उन्होंने अपने ऑफ़िस से फ़ोन किया था हमारे मोबाईल पर। तो बस हम भी बेतकल्लुफ़ हो लिये क्योंकि अपने पैसे भी नहीं लग रहे थे और अपने मित्र से दिल की बात भी कर रहे थे। वैसे भी आजकल फ़ोन पर बात करना बहुत ही सस्ता हो गया है, पहले फ़ोन पर बात करने के पहले सोच लेते थे कि केवल ५ मिनिट ही बात करेंगे पर अब मोबाईल की कॉल दर सस्ती हो गईं हैं तो अब उतना सोचना नहीं पड़ता और हाँ अवश्य ही आमदनी भी इसका एक कारण है।

    हमने मित्र को बोला कि आ जाओ शनिवार को हमारे यहीं रुकना और रविवार को निकल लेना। क्योंकि मिले हुए लगभग १ वर्ष से ज्यादा हो चुका है, महानगर में एक तरफ़ का समय किसी के यहाँ जाने का हमारे लिये तो कुछ ज्यादा ही लगता है, कि दूसरे शहर ही जा रहे हों। हमारा मानस जो दूसरे शहर का है वह तो बदल नहीं सकता है ना !!! हमारे मित्र बोले कि शनिवार को तो त्रैमासिक ऑडिट आ रहा है और रिव्यू भी है ४-५ मुश्टंडे हैडऑफ़िस से आ रहे हैं, सारी खबर लेने के लिये। तो शाम को ४-५ तो आराम बज जायेंगे, उसके बाद आ जाते हैं, हमने आगे रहकर मनाकर दिया कि अगर ८ बजे तक आओगे फ़िर क्या खाक करोगे यहाँ आकर, केवल खाना खाकर निकल लोगे, क्यों भला हम तुम्हें इतनी तकलीफ़ दें। क्योंकि रविवार को रुकने का पहले ही मना कर चुके थे, उनको उनकी श्रीमती को उनकी दीदी के घर ले जाना था, हमने सलाह दी थी कि अगले रविवार पर टलवा दिया जाये ये दीदी के यहाँ का कार्यक्रम तो हमारे मित्र बोले दादा !!! पिछले ४-५ रविवार से यही कर रहा हूँ, और अगर इस बार नहीं ले गये तो समझो कि शनिवार को ऑफ़िस में रिव्यू और रविवार को घर में !!!

फ़िर बात हुई कि चलो अब किसी और रविवार का कार्यक्रम बनाया जायेगा।

विशेष – कल डोमिनोज पिज्जा खाया गया था और वहाँ पर सभी को चोकोलावा केक बहुत पसंद आया, अगर चॉकलेट के शौकीन हों तो जरुर चखें।