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शिक्षा में निवेश और धन के महत्व को शामिल होना ही चाहिये ? [ Investment and importance of money should be part of our education system]

    लगभग सभी लोग अपने जीवन के महत्वपूर्ण १६-२० वर्ष शिक्षा ग्रहण करते हैं, परंतु उस शिक्षा में कहीं भी यह नहीं सिखाया जाता है कि धन कैसे कमाया जाता है, धन कितना महत्वपूर्ण है, धन को सही तरीके से कैसे निवेश किया जाये इत्यादि।

    शिक्षा में हम ग्रहण करते हैं, विषयगत ज्ञान, जो कि इतिहास, भौतिक विज्ञान, वनपस्पति विज्ञान, हिन्दी इत्यादि होते हैं। जिनसे हम उन विषयों में पारंगत तो हो जाते हैं, पर धन की महत्वपूर्णता को समझ नहीं पाते हैं, और न ही ये सीख पाते हैं कि अगर निवेश किया जाये तो कहाँ।

जब कमाने लगते हैं तो रिश्तेदारों के, दोस्तों के या माता पिता के कहने पर उनके अनुभव से धन को निवेश करने लगते हैं। परंतु क्या कभी आपने सोचा है कि जब २० वर्ष शिक्षा ग्रहण अपने बलबूते पर की, उन विषयों में पारंगत हुए तो फ़िर धन के निवेश में क्यों नहीं, जबकि हमने शिक्षा ग्रहण इसलिये की है कि हम अपना भविष्य सामाजिक और आर्थिक रुप से सुदृढ़ रख पायें।

जब नौकरी लगती है और निवेश की बारी आती है तो अच्छे अच्छे लोगों के दिमाग हिल जाते हैं, भले ही वे अपने विषयों में पारंगत हो, परंतु निवेश में कतई नहीं। निवेश में पारंगत होना केवल और केवल व्यक्तिगत रुचि है। निवेश भी अपने आप में एक बहुत बड़ा विषय है और इसमें पारंगत होना सभी के लिये अनिवार्य होना चाहिये परंतु हमारी शिक्षा में निवेश विषय नहीं है।

नौकरी के बाद पहली बार आयकर रिटर्न भरना होता है तो पसीने छूटने लगते हैं, जबकि आयकर विभाग ने अपने रिटर्न बहुत ही आसान कर दिये हैं, हम जब से नौकरी कर रहे हैं, तब से हम खुद ही अपना रिटर्न भर रहे हैं, आप बताईये क्या आप भी खुद ही आयकर रिटर्न भरते हैं या फ़िर इसे भरना बहुत बड़ा सरदर्द मानकर कुछ फ़ीस देकर बाजार से भरवा लेते हैं।

तो बताईये शिक्षा में निवेश और धन के महत्व को शामिल होना चाहिये या नहीं ?

ऑटो की हड़ताल , किराये में बढ़ौत्तरी और हम आम आदमी… मुंबई में विवेक रस्तोगी

    सुबह ९ बजे तक सब ठीक था, परंतु एकाएक सीएनबीसी आवाज पर एक न्यूज फ़्लेश देखा कि मुंबई में ऑटो की हड़ताल, फ़िर हम दूसरे न्यूज चैनलों पर गये परंतु कहीं भी कुछ नहीं आ रहा था।  अपने सहकर्मी के साथ रोज ऑटो में जाते थे उसका फ़ोन आया कि आ जाओ हम घर से निकले तो वो अपनी मोटर साईकिल पर आया हुआ था, हम उसकी मोटर साईकिल पर लद लिये। सड़कों पर दूर दूर तक ऑटो और टेक्सियाँ कहीं दिखाई नहीं दे रही थीं।

    पर आज कमाल की बात हुई कि हम केवल १० मिनिट में ही ऑफ़िस पहुँच गये जो कि रोज से लगभग आधा है, और तो और बसें भी अपनी पूरी स्पीड से चल रही थीं, ऐसा लगा कि ये ऑटो और टेक्सी वाले ही ट्राफ़िक न्यूसेंस करते होंगे, तभी तो कहीं भी कोई ट्राफ़िक नहीं, ऐसा लग रहा था कि हम मुंबई नहीं कहीं ओर हैं, और इस शहर में ऑटो और टेक्सियों की पाबंदी है।

    सी.एन.जी. गैस की कीमत ३३% बढ़ायी गई है, और ऑटो यूनियनों की मांग थी कि बेस फ़ेयर १.६ किमी के लिये ९ रुपये से बढ़ाकर १५ रुपये कर दिया जाये और उसके बाद प्रति किमी ५ से बढ़ाकर ६.५० रुपये कर दिया जाये। तो मांग मान ली गई और बेस फ़ेयर ९ रुपये से बढ़ाकर ११ रुपये कर दिया गया और उसके बाद प्रति किमी. ५ से बढ़ाकर ६.५० रुपये कर दिया गया है। सीधे सीधे २५% की ऑटो किराये में बढ़ौत्तरी कर दी गई है। अभी तक हमें एक तरफ़ के ४० रुपये लगते थे अब ५० रुपये लगेंगे, याने कि महीने के ५०० रुपये ज्यादा खर्च होंगे।

    अब सरकार को कन्वेन्स एलाऊँस ८०० से बढ़ाकर २००० रुपये कर देना चाहिये जिससे आयकर में ही कुछ राहत मिले।

    पूरा मुंबई बिना ऑटो और टेक्सी के बहुत ही अच्छा लग रहा था, अगर इनको हटा दिया जाये और बेस्ट अपनी बसें बड़ा दे तो ज्यादा अच्छा है।

    शाम को ऑफ़िस से निकले तो फ़िर ऑटो की तलाश शुरु की, क्योंकि हमारे सहकर्मी को कुछ काम था तो पहले आधे घंटे तक तो ऑटो ही नहीं मिला फ़िर सोचा कि चलो बस से बोरिवली जाते हैं और फ़िर वहाँ से अपने घर तक की बस मिल जाती है, तो थोड़े इंतजार के बाद ही सीधे घर के ओर की ही बस मिल गई। बस के पिछले दरवाजे पर लटकते हुए अगले स्टॉप पर अंदर हो पाये। फ़िर थोड़ी देर में ही बस लगभग खाली जैसी थी, तो हमने कंडक्टर से पूछा ये रोज ऐसी ही खाली आती है क्या ? वो बोला कि आज खाली है ऑटो के हड़ताल के कारण लोग ऑफ़िस नहीं जा पाये।

    खैर हम घर पहुँचे तो टीवी पर खबर देखी कि दिल्ली में तो लूट ही मच गई है, पहले २ किमी के लिये २० रुपये और फ़िर २ किमी. के बाद ६.५० रुपये कर दिया गया है। शायद अब दिल्ली में ऑटो वाले मीटर से चलें।

    खैर अपन तो आम जनता है और हमेशा से अपनी ही जेब कटती है और हम कुछ बोलते नहीं हैं, बोल भी नहीं पाते हैं। बस हमेशा लुटने को तैयार होते हैं, और हम कर भी क्या सकते हैं।

आपके डेस्कटॉप पर क्या है ? कहीं कोई आपकी फ़ाईलों से फ़ायदा तो नहीं उठा रहा है ? [What’s on Desktop ? Anyone is using your infromation ?]

    आपके डेस्कटॉप पर कितना कचरा है और कितनी काम की फ़ाईले हैं, उसमें कितनी सार्वजनिक हैं, कितनी निजी हैं, कितनी गोपनीय और कितनी अतिगोपनीय हैं। क्या कभी सोचा है ?
    सोचा भी है तो कभी ध्यान नहीं दिया, कभी अपना परीक्षा का एन्ट्री टिकट की पी.डी.एफ़. फ़ाईल छोड़ दी, कभी कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज काम करते करते डेस्कटॉप पर छोड़ दिया, अपने वित्तीय आंकड़ों को छोड़ दिया। अपने कुछ निजी चित्र जो कि शायद किसी से भी शेयर नहीं करना थे, वे डेस्कटॉप पर ही कॉपी करके छोड़ दिये हैं।
    हम बहुत ही ज्यादा आलसी नहीं हैं ? अपने काम के महत्वपूर्ण दस्तावेजों को संभालने में ? सोचिये अगर ढंग से जमाया जाये तो कितना समय लगेगा। अरे १ मिनिट ज्यादा लगेगा, परंतु हम इधर से उधर घूमना, गप्पें मारने में वो एक मिनिट गंवाना उचित समझते हैं। परंतु दस्तावेजीकरण में नहीं।
    डेस्कटॉप पर कई बार कुछ फ़ाईलें ऐसी होती हैं, जो किसी एक आदमी को न बतानी हो और वो ही आपके कम्प्य़ूटर पर आकर बैठ जाये और गलती से उसकी नजर उस फ़ाईल पर पढ़ जाये, और वो खोल ले तो !!! आप तो संकोच के मारे मरे ही जा रहे हैं, तो ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिये १ मिनिट बहुत जरुरी है।
    अगर कोई जरुरी फ़ाईल ढ़ूँढ़नी है, तो नहीं मिलेगी क्योंकि आपको याद ही नहीं है कि वह फ़ाईल कहाँ सेव कर दी है, फ़िर ढूँढते रहेंगे और अपना कीमती वक्त बर्बाद करते रहेंगे। नहीं !!!
    अगर सभी श्रेणियों के फ़ोल्डर एक फ़ोल्डर के अंदर बनाकर अच्छे से दस्तावेजीकरण कर दिया जाये तो वक्त की बचत भी होगी और एक तरह के दस्तावेज एकदम मिलेंगे।
    जैसे ओफ़िस का एक फ़ोल्डर बना लिया – फ़िर अलग अलग प्रोजेक्ट के फ़ोल्डर, और निजी नाम से एक और भी जरुरत के अनुसार और फ़िर प्रोजेक्ट फ़ोल्डर में जरुरत अनुसार फ़ोल्डर बना सकते हैं, जिससे जब किसी प्रोजेक्ट की फ़ाईल की जरुरत हो तो एकदम से उस फ़ोल्डर में जाकर मिल पाये।
    थोड़े से आत्मअनुशासन से अपने गोपनीय दस्तावेजों की गोपनीयता बचा सकते हैं। अब खुद देखिये कि आपके डेस्कटॉप पर कोई ओर बैठ जाये तो कौन कौन सी फ़ाईलें नहीं दिखना चाहिये, तो शुरु हो जाईये अपना डेस्कटॉप की फ़ाईलों को करीने से लगाने में, बात मानिये पहली बार १० मिनिट से ज्यादा नहीं लगेंगे। और ज्यादा सुखी और खुशी महसूस करेंगे।

टेलिकॉलर्स, टेलिवार्ता, ३७ लाख के लिये बीमा और रिलायंस फ़ार्मा फ़ंड का विश्लेषण [Telecallers, Call, Insurance for 37 lacs, Reliance Farma Fund ]

    आजकल लगभग हर रोज कहीं न कहीं से टेलीकालर्स के कॉल से परेशान हैं, DND चालू है तब भी लगता है कि इन लोगों पर सरकार का कोई डर नहीं है और बेधड़क फ़ोन खटका रहे हैं, फ़ोन आते हैं २ प्रकार की कंपनियों के, क्रेडिट कार्ड और इंश्योरेन्स कंपनी। और दोनों से कैसे निपटना है वो हमने सीख लिया है – आप भी देखिये।

१. क्रेडिट कार्ड –

कॉलर – “सर, मैं स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से बोल रही हूँ”

मैं – “ क्यों बोल रही हैं, मत बोलिये”

कॉलर – “सर यह फ़ोन क्रेडिट कार्ड के लिये किया गया है, क्या आप स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का कार्ड उपयोग करते हैं”

मैं – “ जी हाँ करते हैं” [बिल्कुल नहीं करते हैं, और दूसरी तरफ़ से खुद ही फ़ोन कट हो जाता है :D]

२. इंश्योरेन्स कंपनी –

कॉलर – “सर, मैं टाटा ए.आई.जी. इंश्योरेन्स कंपनी से बोल रही हूँ”

मैं – “ क्यों बोल रही हैं, मत बोलिये”

कॉलर – “सर एक इन्वेस्टमेन्ट सेविंग स्कीम है जो कि आपको समझाना है, जो आपके लिये बहुत अच्छी है”

मैं – “नहीं समझना है, टाईम नहीं है”

कॉलर – [हावी होते हुए] “आप एक बार समझिये तो सही, केवल हर महीने २ हजार रुपये जमा करने हैं और २५ वर्ष के बाद आपको ३७ लाख रुपये मिलेंगे, कंपनी १% और २% का बोनस भी देती है” [ फ़िर कुछ गणना बताती है]

मैं – “३७ लाख रुपये !!! आप दे ही नहीं सकते हैं, झूठ बोल रही हैं आप, क्यों लोगों को गुमराह कर रही हैं”

कॉलर – “नहीं सर, ३७ लाख आपको मिलेंगे और साथ ही मिलेगा ५ लाख का बीमा और मेडीक्लेम भी”

मैं – “नहीं नहीं सब है मेरे पास”

कॉलर – “सर इतनी सुविधाएँ और किसी प्रोडक्ट में नहीं है और रिटर्न भी”

मैं – “चलिये अच्छा मैं आपकी पॉलिसी ले लेता हूँ,बशर्ते कंपनी मुझे यह लिख कर दे कि ३७ लाख रुपया मिलेगा, २५ वर्ष के बाद”

कॉलर – “नहीं सर, कोई भी कंपनी यह लिखकर नहीं दे सकती कि ३७ लाख मिलेगा, वैसे अगर ज्यादा मिला तो ?”

मैं – “अगर लिखकर नहीं दे सकते तो दावा क्यों करते हो, और अगर ज्यादा मिले तो कंपनी रख ले मुझे तो केवल ३७ लाख से मतलब है”

कॉलर – “नहीं सर कंपनी ऐसा नहीं कर सकती”

मैं – “नहीं फ़िर मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं है, अगर आप लिखकर दें कि ३७ लाख मिलेगा तो मेरा नंबर आपके पास है ही, आप फ़ोन करके अपना एजेन्ट मेरे पास भेज दीजियेगा, मैं हाथों हाथ पॉलिसी ले लूँगा”

कॉलर – [हताश होकर] “नहीं सर लिखकर नहीं दे सकते !” और फ़ोन काट देती है।

    यहाँ पर एक बात रखना चाहूँगा, अगर इश्योरेन्स कंपनियाँ जानती हैं कि अगले २५ वर्षों में इतना रिटर्न मिलेगा पर IRDA के नियम से वे लिखकर कुछ नहीं दे सकती हैं, तो क्यों हम ULIP और जमा वाले इश्योरेन्स उत्पाद लेते हैं, सीधे म्यूचयल फ़ंड में क्यों नहीं बचत करें।

    मैंने एक SIP शुरु की है रिलायंस फ़ार्मा बहुत ही अच्छा म्यूचयल फ़ंड है, और इसका प्रदर्शन बहुत ही जोरदार रहा है, और मेरा मानना है कि आने वाले समय में फ़ार्मा क्षैत्र की बिक्री बड़ने ही वाली है, तो मोनोपॉली जैसा सेक्टर है, सेक्टर फ़ंड में इससे अच्छा और कोई फ़ंड नहीं लगता। अगले ५ वर्षों में इसमें बहुत अच्छे रिटर्न्स की उम्मीद है और लंबी अवधि में तो और भी ज्यादा।

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इन्श्योरेन्स के लिये पढें [चटका लगायें]

कुछ खरीदारी मैगी मसाला पास्ता, सी.एफ़.एल., पेस्ट्री, पढ़ने के लिये बच्चों को रिश्वत ? [एक सवाल]

   कल ऐसे ही घर से दोपहर के वक्त सामान लेने के लिये निकला अब हँसिये मत घर के लिये समान तो सब ही लाते हैं, बस एक दूसरे को बताते हुए शर्म खाते हैं, नहीं लाओ तो वीकेंड बर्बाद और पूरा वीक भी वीकेंड जैसा ही रहता है।

    सबसे पहले गये किराना दुकान पर, हमें बोला गया था कि मैगी का पास्ता मसाला मैनिया लाना है, हमने दुकानदार को वही बोला तो जबाब मिला कि मसाला मैनिया कुछ नहीं आता, मसाला  और कुछ अजीब सा नाम बोला तो हमने कहा कि यही दे दो २ पैकिट, ऐसा लग रहा था कि हमें ये सब चीजें पता न होने से यह लग रहा है कि हम आऊटडेटेड होते जा रहे हैं। फ़िर जेब से एकॉर के फ़ूड कूपन निकाले और कुछ चिल्लर निकालकर पेमेन्ट किया। वैसे तो और भी किराना स्टोर हैं परंतु यह सुपरबाजार जैसा है और अपने कस्बे के जैसा भी है, अगर ऑर्डर दो तो समान निकाल भी देता है, नहीं तो खुद नये जमाने के हिसाब से शॉपिंग कर लो अपनी बास्केट उठाकर।

    वहाँ से निकले तो हमें सी.एफ़.एल. लेनी थी, किराना पर पूछा तो बोला नहीं पास की दुकान पर मिलेगी, हम चल दिये अपना झोला उठाये, जी हाँ अपना झोला क्योंकि मुंबई में प्लास्टिक की पोलिथीन को प्रतिबंधित कर दिया गया है।

————— सी.एफ़.एल. के लिये हार्डवेयर की दुकान पर ———————————–

भैया, एक सी.एफ़.एल. देना,

“कितने वोल्ट की दूँ ?”,

हम बोले दे दो १२ वोल्ट की, पर ये बताईये कि इस पर कितनी गारंटी है,

“छ: महीने की”,

फ़िर हम बोले ओह मतलब जो फ़्यूज हुई है हम उसका आलरेडी ९ महीने ज्यादा इस्तेमाल कर चुके थे, मतलब १५०% का फ़ायदा।

“नहीं सा..ब वैसे तो यह ३००० घंटे चलती है और कई बार ३-४ साल भी चल जाती है, पर गारंटी छ: महीने की ही है”

ओह, अब हम याद करने लगे कि ये ३००० घंटे क्या हमारा परिवार पिछले १५ महीने में नहाता ही रहा होगा क्या ?

“वैसे आपको बाथरुम में लगानी है तो १२ वोल्ट की जगह ८ वोल्ट की लीजिये, लोग तो ५ वोल्ट की भी लगाते हैं”

हमने कहा चलो ८ वोल्ट की ही दे दो।

“टेस्ट कर देता हूँ”

फ़िर उसने सी.एफ़.एल. के ऊपर ही आज की तिथि और गारंटी खत्म होने की तिथि दोनों ही अंकित कर दीं।

——————————— मोजिनीज पर ———————————————-

    वहाँ से निकले किसी ओर दुकान के लिये परंतु वहीं मोजिनीज पेस्ट्री की दुकान दिख गई तो सोचा चलो कोई चॉकलेट वाली पेस्ट्री बेटेलाल के लिये ले लेता हूँ, क्योंकि कई दिनों से हमने पेस्ट्री नहीं खिलाई है, एक चॉकलेट फ़ुल्ली लोडेड वाली पेस्ट्री घर के लिये पैक करवा ली।

——————————स्टेशनरी की दुकान पर —————————————–

    मुंबई में लगभग सभी दुकानें मल्टी टास्किंग करती हैं, अपने नाम के अन्रुरुप तो समान मिलता ही है परंतु और भी समान मिल जायेगा, मसलन स्टेशनरी की दुकान पर प्लास्टिक का समान, फ़ोटोकॉपी, गेम्स सीडी और भी बहुत कुछ…

    हमारे बेटेलाल के एग्जामस शुरु होने वाले हैं सोमवार से और स्कूल में फ़ाईल को फ़्लोरोसेंट रेड कलर में कवर करके मंगाया गया है, तो कवर लेना था, खुद के लिये एक फ़ाईल लेनी थी, और जिलेटिन लेनी थी बेटेलाल की किताबों के लिये, स्कोर शीट में किताबें मैंटेन करने के भी ५ नंबर जो हैं।

    सड़क से ही एक लड़के ने दुकानदार से कुछ पूछा, दुकानदार ने कहा “है आ जाओ”, तो लड़के की मम्मी ने वहीं से कहा कि बेटा नहीं मिलेगा चलो कल देखेंगे । लड़का बोला नहीं मम्मी है चलो …. और वो जबरदस्ती खींचता हुआ मम्मी को दुकान में ले आया । लड़्के को गेम्स की सीडी चाहिये थी।

    दुकानदार ने ४-५ सीडी निकालकर दे दी और बोला कि सील मत खोलना, अगर सील खुल गई तो आपने खरीद ली है यह मान लिया जायेगा, हमने सोचा वाकई यहाँ पर सभी लोग कितने प्रोफ़ेशनल हैं, नहीं तो खरीददार का क्या है वो तो खोलकर देख ही लेगा । साथ में दुकानदार चेता भी रहा था, एक एक सीडी महँगी है, जिस गेम की लेनी हो वही लेना, ऐसा नहीं हो कि दूसरे गेम की ले जाओ और आपके पैसे फ़ालतू में खर्च हो जायें।

बात तो एकदम सही कह रहा था।

एक गेम की सीडी खरीद ली गई, और दुकानदार ने ३८० रुपये दाम बताया तो वे बोलीं कि इस पर तो ३९० लिखा है आपने बस इतना ही कम किया।

“नहीं मैंने कुछ कम नहीं किया है, देखिये ३८० रुपये ही लिखा है”

कुछ तो कम कीजिये ना अपनी तरफ़ से कुछ तो डिस्काऊँट दीजिये ??

“मैडम ये डिस्काऊँटेड प्राईस ही है”

तो वे अपने पर्स में खुल्ले तलाशने लगीं।

“५०० का नोट दे दीजिये मैं पूरी ईमानदारी से बाकी पैसे लौटाता हूँ”

उसका इतना बोलते ही हमें भी हँसी छूट गई।

    साथ में वे बोलती भी जा रही थीं – आज इसने पूरे ४ घंटे पढ़ाई की है, परसों से एग्जाम है, फ़िर अपने बेटे से भाव कर रही थीं कि यू गेट वन गेम सी.डी. एस आई प्रामिस्ड, नाऊ यू हैव टू रीड २ होवर्स मोर, ओनली ऑफ़्टर देट यू विल प्ले गेम  ओन कम्पयूटर ।

बेटा भी कुछ आरग्यूमेंट करता जा रहा था।

और वे माँ बेटे चले गये।

    फ़िर मैं दुकानदार से मुखतिब हुआ कि बताओ आजकल बच्चों को पढ़ाने के लिये भी रिश्वत देना पड़ती है, और हमारे जमाने में पूरा पढ़ लो तब भी जूते ही पढ़ते थे, ऐसे पढ़ाई करते हैं, याद तो पूरा है नहीं, ये सब करने से क्या फ़र्क पड़्ता है और भी बहुत कुछ [ मैं याद नहीं करना चाहता ..]

और आजकल बस कैसे भी करके पढ़ लें सिलेबस पूरा कर लें, याद है या नहीं, क्वालिटी है या नहीं उससे किसी को कोई मतलब नहीं है।

हमने भी अपना पेमेन्ट किया और घर चल दिये।

    सोच रहे थे कि हमारे बेटे ने भी तो आज जितना पढ़ाया उतना पढ़ लिया और ये पेस्ट्री कहीं हम भी रिश्वत के लिये ही तो नहीं ले जा रहे हैं, या फ़िर ये केवल पिता का प्यार है कि बेटेलाल ने बहुत दिनों से पेस्ट्री नहीं खाई है, पेस्ट्री देखकर ही खुश हो जायेगा, और बोलेगा –

“अरे वा डैडी, आप तो बहुत ही प्यारे हो, मैंने तो बहुत दिनों से पेस्ट्री नहीं खाई थी, मजा आ गया डैडी…”

सोच रहा हूँ…

वो १ मिनिट का दृश्य और उसके चेहरे का संतोष…

    वह बहुत तेजी से चावल खा रहा था, जिसमें शायद दाल और कुछ सब्जी मिली हुई थी, पीले रंग की पीतल की तश्तरी से बड़ा सा बर्तन था, उसके बाँहें जो कि साँवली नहीं नहीं काली ही थीं.. उसमें से मसल्स दिख रहे थे… गंदी मैली बनियान या शायद गंदे रंग की बनियान पहने हुआ.. और लुंगी को डबल कर मद्रासी श्टाईल में लपेट कर पहना हुआ था… चेहरे पर गजब का संतोष था.. समय शाम का था लगभग ६.३० बजे का.. चेहरे पर संतोष से ऐसा लग रहा था कि उसने आज जो भी काम किया है उससे वो संतुष्ट है और खुश है कि वह आज का कार्य पूरा कर सका। और यह तो शायद सभी ने महसूस किया होगा जिस दिन कार्य बराबर होता है तो भूख कुछ ज्यादा ही लगती है। दिमाग की किसी ग्रंथी का संबंध जरुर पेट से रहता है।
    यह दृश्य अपने कार्यालय से घर लौटते समय ऑटो से १ मिनिट से भी कम समय में हमने किसी घर में देखा, जो कि सड़क किनारे ही था। केवल १ मिनिट के दृश्य के लिये भी कभी कभी इंसान कितने ही दिन सोचने पर मजबूर हो जाता है।

यूनियन कार्बाइड की जहरीली गैस में लोग अभी भी घुटकर मर रहे हैं ।

      कल खबर सुनी कि २५ वर्ष के बाद यूनियन कार्बाइड का फ़ैसला न्यायालय ने दे दिया है, वो २ दिसंबर की काली रात एकदम गहरी स्याह हो उठी जब इस जहरीली गैस ने भोपाल को अपने आगोश में ले लिया था, और आज फ़िर ऐसा लगा कि वापिस वही गैस पूरे देश में फ़ैल गई है, और जिनके पास दिल हैं वे सभी लोग घुटकर मरे जा रहे हैं। मेरा भारत महान, उसके नेता और न्यायपालिका महान !!!


    जहरीली गैस से मरे हुए और मरने वाले लोगों और घुट रहे लोगों को नम श्रद्धांजली।

माइक्रोसॉफ़्ट का बग “मौत की काली स्क्रीन” समाधान ढूँढ़ रहे हैं, Black Screen of Death

हमारा लेपटॉप – सोनी वायो, VGN-CR506E

 हमारा लेपटॉप फ़ँस गया Black Screen of Death के चुंगल में, उपाय ढूँढ़ रहे हैं। यह एक बग है जो कि माइक्रोसॉफ़्ट के OS  में होता है। इसमें लोगिन स्क्रीन के बाद काली स्क्रीन दिखाई देती है, और हमारा विस्टा कोई भी गतिविधी करने से मना कर देता है। जब कल अपना लेपटॉप खोला तो ये वाला बग आया हमारे OS में, अब गूगल पर अपने डेस्कटॉप में इसका समाधान ढ़ूँढ रहे हैं।

जितने भी समाधान बताये गये हैं, वह सब कर चुके या कोशिश कर रहे हैं, परंतु अभी तक सफ़लता नहीं मिली 
है –
१. Ctrl + Alt + Del बटन दबाकर टॉस्क मैनेजर में जाकर नये टॉस्क पर क्लिक कर iexplorer.exe करें तो यह शुरु हो जायेगा।
२. रजिस्ट्री में संपादन के लिये remove C:WINDOWSsystem32driversntndis.exe from
KEY_LOCAL_MACHINESOFTWAREMicrosoftWindows
NTCurrentVersionWinlogonShellexplorer.exe
C:WINDOWSsystem32driversntndis.exe
समस्या यह है कि किसी भी तरह से हम इस विस्टा को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं, F8 दबाने के पश्चात सेफ़ मोड में भी नहीं आ रहा है, Last good configuration भी नहीं चल रहा है,  विन्डो पीई से अब USB से बेकअप ले रहे हैं, फ़िर देखते हैं कि क्या कर सकते हैं।
अभी कोशिश जारी है, क्योंकि उसमें विन्डोज लाईव राईटर में कुछ लेख हमने लिखे हुए हैं, उन्हें बचाना है। और कुछ महत्वपूर्ण फ़ाईलें भी हैं। खोज जारी है, और तो और हमारी विस्टा की रिकवरी डिस्क भी काम नहीं कर रही है, अब विस्टा को डाऊनलोड कर इंस्टाल करना होगा।
यहाँ हम इसके सवाल के जबाब के लिये घूम चुके हैं – 

“ऐ टकल्या”, विरार भाईंदर की लोकल की खासियत और २५,००० वोल्ट

    हम चल दिये ५ दिन के लिये मुंबई से बाहर, बोरिवली स्टेशन से हमारी ट्रेन थी, हम ट्रेन के आने के ठीक १० मिनिट पहले प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँच गये, तो चार नंबर प्लेटफ़ार्म से ट्रेन जाती है, और इसी प्लेटफ़ॉर्म से विरार, भाईंदर की लोकल ट्रेनें भी जाती हैं। इन लोकल ट्रेन में पब्लिक को देखते ही बनता है, बाहर की पब्लिक तो इन लोगों को देखकर आश्चर्य करते हैं।विरार भाईंदर की लोकल ट्रेन को देखकर बाहर के लोगों को आप आँखें फ़ाड़ फ़ाड़कर देखते हुए देखे जा सकते हैं ।

    विरार भाईंदर लोकल ट्रेन की बहुत सारी खासियत हैं, मसलन ट्रेन की छत पर यात्रा करना, बाहर से खिड़की के ऊपर चढ़कर यात्रा करना, बंद दरवाजे की रेलिंग पर चढ़कर यात्रा करना, गेट पर खड़े हुए हीरो लोग प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े हुए लोगों पर फ़ब्ती कसते हैं, डब्बे में इतनी भीड़ होने के बाबजूद और लोगों का चढ़ जाना, और सबसे बड़ी खासियत गुटबाजी अगर आप पहली बार जा रहे हैं तो गेट पर खड़े लोग आपको चढ़ने ही नहीं देंगे, और अगर उतरना है तो उतरने नहीं देंगे।

    भले ही बेचारे रेल्वे वाले चिल्ला चिल्लाकर अधमरे हो जायें, कि ट्रेन की छत पर यात्रा न करें २५,००० वोल्ट का करंट बहता है, कई लोग तो निपट भी चुके हैं, पर हीरोगिरी करने से बाज आयें तब न, बस इनको नहीं सुनना है तो नहीं सुनना है, शायद कानून को मजाक समझते हैं ये लोग।

    हम अपनी हेयरश्टाईल याने कि टकले थे, (टकलापुराण और टकले होने के फ़ायदे रोज ४० मिनिट की बचत) तो एक फ़ब्ती हमें भी मिली “ऐ टकल्या”, तो हमने पहले अपने आसपास खड़े लोगों को देखा तो पाया कि “केवल अपन ही टकले हैं, और कोई टकला नहीं है”, बड़ा ही आनंद आया कि चलो कोई तो है जो हमको फ़ब्ती कस सकता है।

ये आई.ए.एस. में लोग सेवा करने जाते हैं या कमाने जाते हैं ? यह एक यक्ष प्रश्न है कि इन आई.ए.एस. की इज्जत करें या न करें, और अगर आज के युवा की सोच ही ऐसी होगी परिवार की होगी तो इस राष्ट्र का भविष्य क्या होगा।

    दो साल पहले की बात है, हम करोल बाग में एक रेस्त्रां में खाना खा रहे थे, और हमारे पीछे वाली टेबिल पर कुछ छ: लड़के बैठे हुए थे, जो कि मूलत: झारखंड और बिहार के लग रहे थे।

    हमने खाना ऑर्डर किया और अपनी बातें करने लगें परंतु ये लड़के अपनी बातें इतनी तेज आवाज में बात कर रहे थे कि हम अपनी बात कर ही नहीं पा रहे थे और वे जिस तरह की बातें कर रहे थे वैसी हमने पहले कभी सुनी भी नहीं थीं, इसलिये चुपचाप हमने उनकी ही बातें सुनने का फ़ैसला ले लिया।

    वे बात कर रहे थे सिस्टम की, जी हाँ प्रशासन की, क्या हम यहाँ झक मारने आये हैं समाज के लिये नहीं !!!, आई.ए.एस. बनना है और करोड़ों कमाना है, अरे रुतबा का रुतबा और कमाई की कमाई, किसी कंपनी का सीईओ भी क्या कमाता होता आई.ए.एस. की कमाई के आगे।

    बातों में पता लगा कि उनमें से २-३ के पिता आई.ए.एस. हैं, और बाकी २-३ सामान्य लोग हैं परंतु दाँतकाटी दोस्ती लग रही थी उन सबमें, जिनके पिता आई.ए.एस. थे वे कुछ किस्से बता रहे थे कि फ़लाने ने आई.ए.एस. की पोस्टिंग मिलने के २-३ साल के अंदर ही करोड़ रुपया अंदर कर लिया वो भी किस सफ़ाई से, कहीं कोयला खदान की बात हो रही थी कि वहाँ पर किसी परमीशन या ठेके के लिये आई.ए.एस. ने ४० करोड़ की रिश्वत ली थी और मंत्री को पता चल गया तो मंत्री ने कमीशन माँगा तो उस आई.ए.एस. ने उस मंत्री को पैसे देने की जगह पैसा खर्च करके उसको गद्दी से ही हटवा दिया।

    फ़िर किसी आई.पी.एस. की बात चली कि ये लोग भी कम नहीं होते हैं, रंगदारी करते हैं और व्यापारियों से एक मुश्त रकम या फ़िर सप्ताह लेते रहते हैं, बस व्यापारी बड़ी मुर्गी होता है।

    तभी उनमें से एक आई.ए.एस. का सुपुत्र बोला उसके दूसरे मित्र को जो कि शायद किसान परिवार से था, कि बेटा पढ़ाई कर जम कर और केवल हरे हरे नोटों के सपने देख, और देख कि तेरा रसूख कितना बढ़ जायेगा, लोग सलाम ठोकेंगे, कभी भी करोड़ रुपया अंदर कर सकता है। तो किसान परिवार के लड़के का उत्तर सुनकर तो हम दंग ही रह गये, वो बोला “हमारे पिताजी ने कहा है कि तू केवल पढ़ाई पर ध्यान दे, और ये आई.ए.एस. की परीक्षा पास कर ले, जितना पैसा खर्च होता है ३०-४० लाख रुपया होने दे, तू चिंता मत कर हम खेत खलिहान बेच देंगे घर बेच देंगे, तू आई.ए.एस. बन गया तो ये खर्चा तो कुछ भी नहीं है ये तो निवेश है, इसका दस गुना तुम हमें २-३ साल में कमा कर दे दोगे” !!!

    हम हमारे विचारों में खो गये कि ये आई.ए.एस. की परीक्षा और आई.ए.एस. बनने का जुनून तो किसी और दिशा में मुड़ गया है। और ये केवल करोलबाग की ही बात नहीं है, जहाँ आई.ए.एस. की तैयारी कर रहे लोग मिलेंगे, आपको इस तरह की बातें सुनना शायद आश्चर्यजनक न लगे। क्योंकि हमने ये चर्चाएँ कई बार दिल्ली में अलग अलग जगह पर सुनी हैं।

    इसलिये अब हमारे सामने यह एक यक्ष प्रश्न है कि इन आई.ए.एस. की इज्जत करें या न करें, और अगर आज के युवा की सोच ही ऐसी होगी परिवार की होगी तो इस राष्ट्र का भविष्य क्या होगा।