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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

पिछले ९-१० सालों से मोबाईल उपयोग कर रहे थे पर आज पहली बार मोबाईल गिरा है, आखिरकार हमसे भी लापरवाही हो ही गई।

परसों याने कि २३ जून को हमारा मोबाईल फ़ोन कहीं गिर गया और जहां गिरने का अंदेशा था वहां हमने कई बार जाकर ढूंढा पर न मिलना था और न ही मिला। एक रुपये वाले डिब्बे से फ़ोन मिलाया अपने मोबाईल नंबर पर लेकिन आऊट ओफ़ कवरेज ऐरिया का मैसेज आ रहा था। घर आकर सबसे पहले अपने एक मित्र को फ़ोन मिलाया जिनके साथ भी यह सब हो चुका था और उनसे बातचीत करने के बाद हमने अपने मोबाईल की आऊटगोइंग बंद करवाने के लिये काल सेंटर फ़ोन किया और वापिस से नंबर कैसे हमें मिलेगा इसकी जानकारी ली। अब हम परेशान कि क्या करें, वह नंबर तो वापिस नया मिल जायेगा परंतु जो फ़ोन बुक के नंबर गये जो जरुरी एस.एम.एस. थे उसका क्या करें, क्योंकि हमने कभी भी हाई-फ़ाई फ़ोन नहीं लिया । फ़ोन का मतलब हमारे लिये होता है कि आवाज आना जाना, एस.एम.एस. आना जाना। पर अब समस्या कि फ़िर नया फ़ोन खरीदें और फ़िर इतने सारे मोबाईल नंबर वापिस से ढूंढ कर नये मोबाईल में अपडेट करने की हम्माली करना पड़ेगी।

वो तो हमारी अकल चल गयी थी थोड़े दिनों पहले तो हम अपनी फ़ोन बुक एक्सेल शीट में लिख रहे थे और एन तक ही कंपलीट हो पाई थी अब ओ से जेड तक के फ़ोन नं की चुनौती हमारे सामने है। इसलिये अब सोच रहे हैं कि कोई ऐसा फ़ोन लेंगे जिससे अपने लेपटाप पर सीधे बेकअप ले सकें, भले ही उसके लिये नंबर बदलना पड़े, अब तकलीफ़ तो हो ही गई है तो थोड़ी सी और सही क्या फ़र्क पड़्ता है। सीडीएमए में इतने अच्छे मोबाईल नहीं हैं जितने कि जीएसएम में। सीडीएमए मोबाईल महंगे भी है और सुविधाएँ भी कम हैं, जबकि जीएसएम मोबाईल में कम दाम वाले फ़ोन में अच्छी आधुनिक सुविधाएँ हैं।

नंबर बदलने की कठिनाइयां जो हमें नजर आ रही हैं –

  • कुछ लंगोटिया मित्रों के फ़ोन नंबर भी थे जो हमें अब याद नहीं हैं और केवल मोबाईल से ही संपर्क में थे, उनसे संपर्क टूट जायेगा।
  • जहां जहां मोबाईल नंबर दे रखे हैं सब जगह अपडेट करवाना पड़ेगा।
  • तब तक कुछ जरुरी मार्केट संबंधी जो एसएमएस आते थे उनसे महरुम रहना पड़ेगा मतलब रोज नुक्सान, अब ट्रेडिंग ही नहीं कर पायेंगे इसलिये L

वैसे हम लगभग पिछले ९-१० सालों से मोबाईल उपयोग कर रहे थे पर आज पहली बार मोबाईल गिरा है, आखिरकार हमसे भी लापरवाही हो ही गई।

खैर अगर मोबाईल किसी ने चुराया है तो जैसे ही सिम बदलेगा हमारे घर वाले मोबाईल पर मैसेज आ जायेगा क्योंकि उसमें मोबाईल ट्रेकर को हमने चालू कर रखा था। आज भी उम्मीद है कि हमें मोबाईल मिलेगा पर जब भी काल करो फ़ोन इस स्विच्ड ओफ़ सुनने को मिलता है।

नवभारत टाइम्स से (NBT)- दूसरे पैराग्राफ़ में लिखा है “महाराष्ट्र के कोंकण बेल्ट में ७ जून को मौसम ने दस्तखत दे दी, लेकिन उसकी गति थम गई।“ अब आप ही बताईये सही वाक्य क्या होगा।

नवभारत टाइम्स हिन्दी मुम्बई संस्करण के मुख्य पृष्ठ पर हिन्दी की गल्तियां अब रोज ही होने लगी हैं, पता नहीं इसके एडिटर क्या एडिट करते हैं।

अभी हाल ही की गलती देखिये शनिवार २० जून २००९ की, मुख्य पृष्ठ पर एक समाचार छपा था – “सिर्फ़ ३० दिनों के लिये बचा है पानी”। इसमें दूसरे पैराग्राफ़ में लिखा है “महाराष्ट्र के कोंकण बेल्ट में ७ जून को मौसम ने दस्तखत दे दी, लेकिन उसकी गति थम गई।“, अब भला बताईये क्या यह सही है क्या इसे ऐसा नहीं होना चाहिये था – “महाराष्ट्र के कोंकण बेल्ट में ७ जून को मौसम ने दस्तक दे दी, लेकिन उसकी गति थम गई।“

अब ब्लाग पर तो हम भाषा को सही तरीके से लिखने का प्रयत्न करते हैं पर क्या एक जिम्मेदार अखबार की जिम्मेदारी नहीं है सही हिंदी लिखने की।

अगले सप्ताहों के लिये मार्केट टिप्स – सेनसेक्स एवं निफ़्टी के लिये

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कृपया अपने विवेक से निर्णय लें। हानि या लाभ की स्थिती में ब्लाग की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

कुल्लू मनाली और बर्फ़ के पहाड़ों की सैर – कुल्लू और मनिकर्ण साहिब, गरम पानी के कुंड जिसमें खाना पकाते हैं।





अब आज हम निकल पड़े कुल्लू और मनिकरण की सैर को। मनाली से हम लगभग ११ बजे निकल पाये हम वहीं व्यास नदी के किनारे पर बैठ कर उसके कल कल निर्मल जल को निहार रहे थे और हमारा बेटा उसकी लहरों के साथ अठखेलियां कर रहा था। पर थोड़ी देर बाद हमें निकलना ही पड़ा क्योंकि समय ज्यादा हो चला था और फ़िर एक दिन और था नदी के पानी के साथ खेलने के लिये।
थोड़ी दूर जाने के बाद एक ढाबे पर चाय नाश्ते के लिये टेक्सी रोकी और थोड़ी दूर जाने के बाद ही वैष्णोमाता का मंदिर पड़ा, वहां पर मंदिर तो बहुत ही भव्य बन रहा था, लगभग ४ मंजिला अलग अलग भगवानों के मंदिर बना रखे थे और लंगर भी चल रहा था, कहते हैं कि पार्वती जी ने यहां तपस्या की थी जब उनका नाम उमा था। पर मंदिर का नाम वैष्णोमाता के नाम पर क्यों था हमें पल्ले नहीं पड़ा तो जितने भी पुजारी थे हमने सबसे यही सवाल पूछा कि यहां का महात्म्य क्या है, एक पुजारी तो गुस्सा हो गये कि आपने यह सवाल पूछने की हिमाकत कैसे की, पर बाकी सभी पुजारियों के एक ही रटे रटाये जबाब थे कि एक बाबाजी ने तपस्या की थी और उन्हें वहां पर वैष्णो देवी ने दर्शन दिये थे। पर हमारे मन को और दिल को यह मंदिर बिल्कुल नहीं जमा, ऐसा लगा कि धर्म की दुकान में आ गये हैं।
फ़िर शाल के कारखानों पर टेक्सी रुकी जहां पर हमने पशमीने की शाल देखी, लग अच्छी रही थी पर असली और नकली की पहचान न होने के कारण हमने रिस्क लेना ठीक न समझा। वहीं पर एक कोल्डड्रिंक की दुकान थी जो १० रुपये का कोल्डड्रिंक १५ रुपये में बेच रहा था तो बस हमारा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उससे हड़्का कर पूछने लगे कि भाई ये क्या लगा रखा है क्या यहां भारत का कानून नहीं चलता है क्या जो सीधे इतना मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में हो। पर वही एक जबाब लेना है तो लो नहीं तो आगे बड़ लो आखिर टूरिस्ट सीजन है न।
थोड़ी आगे जाने के बाद रिवर राफ़्टिंग पाईंट आने लगे थे। हमें पानी में जाने से डर लगता है इसलिये किनारे से ही दूसरे लोग रिवर राफ़्टिंग कर रहे थे, उन्हें निहार कर ही अपने मन को संतुष्ट कर रहे थे।


फ़िर चल दिये सीधे मनिकरण और साथ में चल रही थी व्यास नदी रास्ता बहुत ही खराब था हम लगभग ३.३० बजे पहुंच गये ये जगह मनाली से ८५ किमी दूर है। यहां पर गुरुद्वारा है और मंदिर हैं, यहां पर गरम पानी के दो स्त्रोत भी हैं जिनका तापमान क्रमश: ८४ एवं ९४ डिग्री है, जिनमें चावल, चने और दाल पकायी जाती हैं, एक कुँड में गुरुद्वारे के लंगर का खाना पकता है। जिसमें भक्त भी अपनी पोटली में अपने चने, चावल या दाल पका सकते हैं हमने भी चने पकाये लगभग ३० मिनिट में कच्चे चने बिल्कुल अच्छी तरह से खाने लायक हो गये थे।

यहां की कहानी शिवजी और पार्वती जी की है उन्होंने यहां पर ११,००० वर्षों तक तपस्या की थी और उसी समय पार्वती जी की अंगूठी वहां गिरकर खो गई, तो शिवजी के सारे गण भी उस अंगूठी को ढूंढने में नाकामयाब रहे तो शिवजी को गुस्सा आ गया और अपना तीसरा नेत्र खोल दिया प्रलय आने लगी, तक्षक ने अपना जहर उगलना शुरु किया जिसकी गर्मी से वहां उथल पुथल मच गयी और बहुत सारे मोती माणिक्य धरती पर आ गये, उसीमें पार्वती जी की अंगूठी भी मिल गई। उसी गर्मी से आज भी वहां ये दो स्त्रोत हैं वहां पर नंगे पैर चलना बहुत मुश्किल है क्योंकि इन गरम कुंडों के कारण पूरा फ़र्श बहुत ही गरम रहता है इसलिये वहां लकड़ी के पटिये लगा रखे है।
जय मनिकर्ण साहिब की। भोले बम कहते हुए हम वापिस मनाली की और लौट पड़े।

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मैंने बहुत पहले एक माचिस के पीछे यह वाक्य पढा था ….

मैंने बहुत पहले एक माचिस के पीछे यह वाक्य पढा था जो कि मुझे आज भी याद है और सभी को बताना चाहता हूँ।

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“Practice makes man perfect, but nobody is perfect then why practice.”


कुल्लू मनाली और बर्फ़ के पहाड़ों की सैर – रोहतांग पास की सैर (स्नोपाईंट) Snowpoint Rohtang Pass


सुबह ५ बजे उठकर कड़ाके की ठंड में नहाकर हम लोग तैयार हो लिये रोहतांग पास (स्नोपाईंट) जाने के लिये। बिल्कुल ६ बजे हम टेक्सी में बैठकर चल दिये पहले तो वो टेक्सी पेट्रोल लेने के लिये लाईन में लगी बहुत बड़ी लाईन थी, नहीं लाईन नहीं थी जिसकी जहां मर्जी वह वहां घुस कर पेट्रोल भरवा रहा था, क्योंकि उस रोड पर वह आखिरी पेट्रोल पंप था इसके बाद फ़िर सीधे लेह में पेट्रोल पंप है।

अब हम चल दिये रोहतांग की ओर, निर्मल धवल श्यामल बर्फ़ के पहाड़ों की ओर । फ़िर लाईन से गरम कपड़े की दुकानें रास्ते में आईं जो कि गर्म कपड़े किराये पर देते हैं, क्योंकि ऊपर बहुत ही बर्फ़ीली हवाएँ चलती हैं और आँखों को जलन से बचाने के लिये चश्मे खरीद लिये, साथ में हमने स्कीईंग और गाईड भी लिया।

थोड़ी दूर जाने पर फ़िर हमने अपनी गाड़ी रुकवा कर नाश्ते के लिये एक ढाबा चुना। पीछे कल कल बहती व्यास नदी और ठंडी हवा ओर गर्म नाश्ता वाह।

अब हम चल दिये स्नोपाईंट के लिये तो कहीं पर रोड था तो कहीं पर बिल्कुल भी नहीं, डबल लेन का काम चल रहा था। बीच बीच में बहुत सारे प्राकृतिक झरने मिले। लगभग ३० किमी के बाद एक ग्लेशियर मिला जिसके बीच में से हमारी टेक्सी निकल रही थी। चूँकि हम सुबह जल्दी निकल लिये थे इसलिये हमें जाम भी नहीं मिला और हम लगभग १० बजे रोहतांग पास जो कि समुद्र तल से लगभग १३,०५१ फ़ीट ऊँचाई पर है जा पहुंचे।




वहां पर दो बड़े बड़े ग्राऊंड थे जहां पर लोग आपस में बर्फ़ से खेल रहे थे, स्कीईंग कर रहे थे, याक ओर घोड़ों की सवारी कर रहे थे, स्लेज भी चल रहे थे, बर्फ़ की मोटर साईकिल भी चल रही थीं। बस सब लोग बर्फ़ के इस अद्भुत लोक में आनंदित हो रहे थे।


हमारे परिवार ने भी जमकर स्कीईंग का मजा लिया और फ़िर स्नोबाईक का। फ़िर थोड़ी ट्रेकिंग की वहीं पर कुछ लड़्के पतंग उड़ा रहे थे तो हमने भी पूछ लिया कि भाई इधर पतंग किधर से ले आये तो जबाब मिला कि लखनऊ वाले हैं हरेक जगह पतंगबाजी का शौक पूरा करते हैं। खूब बर्फ़ से खेले और खूब तो फ़िसले। यहां पर व्यास ‌ऋषि का मंदिर है जहां से व्यास नदी निकल रही है, कहते हैं कि अर्जुन ने बाण मारकर यहां पर जल का स्त्रोत निकाला था।


थकान के बाद सोचा कि चलो अब कुछ खाने पीने का कार्यक्रम हो जाये, यहां टेन्ट में बहुत सारे छोटे छोटे ढाबे लगे हुए थे और खाने में गरम चीजों में मिल रहा था आमलेट और मैगी और चाय। खानपान के बाद करीबन १.३० बजे वापिस चल दिये मनाली के लिये क्योंकि मौसम खराब होने लगा था। और ठंडी हवा से हमें बहुत तकलीफ़ भी हो रही थी।


फ़िर वापिस मनाली आते आते वो बर्फ़ के पहाड़ हमसे दूर होते जा रहे थे। फ़िर हम उसी ढाबे पर रुककर चायपान किया और गर्म कपड़े किराये वाले वापिस किये और चल दिये आराम करने के लिये अपने होटल ।

अगले दिन का प्रोग्राम था कुल्लू रिवर राफ़्टिंग और मनिकरण का।
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कुल्लू मनाली और बर्फ़ के पहाड़ों की सैर – मनाली की लोकल सैर


कुल्लू मनाली और बर्फ़ के पहाड़ों की सैर


बस की १४ घंटे की लंबी यात्रा के बाद बहुत थकान थी पर चारों तरफ़ देवदार के वृक्ष और बर्फ़ के पहाड़ देखकर थकान कुछ हल्की हुई। होटल ने पिकअप के लिये टेक्सी भेजी थी हम उसमें सवार हो लिये और फ़टाफ़ट नाश्ता कर, तैयार होकर थोड़ी देर आराम करने का प्लान किया आँख खुली दोपहर एक बजे और फ़िर चल पड़े लोकल साईटसीन पर।


सबसे पहले तो हमने माल रोड पर दोपहर का खाना खाया और फ़िर चल पड़े वन्य विहार, जहाँ पर देवदार के ऊँचे पेड़ और बच्चों के झूले थे। हमारे बेटेलाल ने खूब तो झूले झूले और ठंडी हवा का आनंद लिया। वहीं पर एक छोटा सा वोटिंग क्लब भी था। 


फ़िर गये मोनेस्ट्री, बुद्ध भगवान का मंदिर। जिंदगी में पहली बार मैं किसी बोद्ध मोनेस्ट्री में था और बहुत ही अलग अनुभव था। मंदिर के दरवाजे के खंबों पर ड्रेगन बने हुए थे। भगवान बुद्ध की प्रतिमा बहुत ही अच्छी लग रही थी।


वहाँ से गये वशिष्ठ मंदिर जहाँ पर ‌ऋषि वशिष्ठ ने तपस्या की थी और अर्जुन ने यहां पर गुस्से में तीर मारकर गरम पानी का स्रोत निकाला था। कहते हैं कि इस पानी में नहाने से त्वचा संबंधी सारे रोग खत्म हो जाते हैं। रास्ते में वूलन वाले आवाज लगाते रहे चिंगू देख लो, हम भी एक दुकान पर देखने लगे चिंगू के कंबल देखे और बताया कि चिंगू एक बर्फ़ में रहने वाला प्राणी है जो कि आजकल बहुत ही दुर्लभ है अब उसके बालों को काट कर ये कंबल बुने जा रहे हैं ना कि मारकर ऐसा हमें बताया गया, ये सर्दी में गरम और गर्मी में ठंडे होते हैं और साथ में ५ आइटम फ़्री थे। पर चूंकि हमें कंबल लेना ही नहीं था इसलिये हम निकल लिये। वहां पर एक बहुत ही आश्चर्य़जन चीज देखने को मिली, छोटे छोटे ढाबों पर भारतीय व्यंजन नहीं, बाहर देशों के व्यंजनों के नाम लिखे हुए थे।

फ़िर निकल पड़े हिडिम्बा मंदिर जो कि भीम की पत्नी थीं वहां पर हिडिम्बा के पैरों के निशान आज भी मौजूद हैं और कहते हैं कि हिडिम्बादेवी के बिना मनाली का दशहरा पूरा नहीं हो सकता। मंदिर के बाहरी दीवार पर तरह तरह के सींग लगे हुए थे। वहीं पर घटोत्कच का एक मंदिर भी है। यहां पर हमने पहली बार याक देखे आज तक केवल फ़ोटो में ही देखे थे।
फ़िर निकल पड़े होटल आराम करने क्योंकि अगले दिन रोहतांग पास बर्फ़ के पहाड़ देखने के लिये सुबह ६ बजे निकलना था।

कुल्लू मनाली और बर्फ़ के पहाड़ों की सैर

हमारा एकदम घूमने का कार्यक्रम बन गया और हम दिल्ली में थे तो घूमने के लिये विकल्प भी बहुत थे क्योंकि हम उत्तर भारत में कहीं भी घूमने जा सकते थे। हमें और हमारे परिवार के मन में बर्फ़ के पहाड़ देखने की बहुत इच्छा थी तो एकदम कार्यक्रम बनाया गया कुल्लू मनाली का।
अपने ट्रेवल एजेंट से हमने दिल्ली से मनाली तक का वोल्वो बस का टिकट करवा लिया और टाईम तो था नहीं कुछ भी प्लान करने के लिये, कि कहां रुकेंगे क्या क्या घूमेंगे कैसे घूमेंगे। हमारे ट्रेवल एजेंट ने हमें आइडिया दिया कि आप मनाली में उतर कर बस स्टेंड से थोड़ा आगे जायेंगे तो माल रोड या फ़िर किसी और रोड पर होट्ल में मोलभाव कर लीजियेगा पर हमने सोचा कि कुछ अपने परिचित भी हैं जो कि यह जगह घूम आये हैं उनसे भी राय मशविरा कर लिया जाये और इस तरह से हमें चंडीगढ़ के एक ट्रेवल एजेंट का मोबाईल नंबर मिल गया और हमने उससे पूछा कि कुल्लू मनाली कितने दिन में घूम सकते हैं, तो उसने हमें ३ रात और ४ दिन का पैकेज बताया और हम भी उस पैकेज पर सहमत हो गये क्योंकि हमारे दिल्लीवाले ट्रेवल एजेंट ने पहले ही बोल दिया था कि सीजन चल रहा है और होटल भी बिल्कुल पैक होंगे अच्छा होगा कि आपको कोई पैकेज मिल जाये। तो हमने भी यह पैकेज फ़ाइनल कर घूमने जाने का फ़ैसला किया।
वोल्वो बस दिल्ली से मनाली के लिये जनपथ कनाट प्लेस पर होटल इंपीरियल के पास के पेट्रोल पंप से मिलती है। हमें समझ में नहीं आया कि पेट्रोल पंप से सवारी बैठाने की व्यवस्था क्यों। वैसे तो इन बसों को मजनूँ के टीले से चलना चाहिये पर शायद ये वोल्वो बसें दिल्ली ट्राफ़िक को ठेंगा दिखा रही थीं या फ़िर सब मिलीभगत थी। आखिरकार ५.०० बजे शाम के रिपोर्टिंग टाईम देने के बाद बस ७.०० बजे चल दी, बीच में एक अच्छे होटल पर रुकी जहाँ पर रात का खाना खाया गया और फ़िर जब सुबह नींद खुली तो देखा कि सड़क के साथ साथ विहंगम नदी चल रही थी और कोई बहुत बड़ा शहर नदी के उस पार था। नदी “व्यास” थी और शहर था “कुल्लू”। फ़िर सुबह ९.३० बजे हम लोग मनाली पहुंच गये।

कनाट प्लेस में तैनात कमांडो (commando) और हमारी आत्मीयता

हम पिछले एक महीने से कमांडोज को पालिका बाजार के पास तैनात देख रहे हैं और सोचते हैं कि कितना मुश्किल काम करते हैं ये लोग। भरी दोपहर बुलेटप्रूफ़ पहनकर और भारी बंदूक लेकर अपनी ड्यूटी बजा रहे हैं केवल इसलिये कि हम लोग सुरक्षित रहें। इनकी ड्यूटी २४ घंटे रहती है।

 

जब रात को हम अपने ओफ़िस से निकलते हैं और आटो वाले से भावताव करते हैं, आटो वाले हमेशा ज्यादा पैसा मांगते हैं तो हम उनसे कहते हैं कि भैया चाकू दिखाकर लूटो ऐसे जबान से क्यों लूट रहे हो इसमें तो ये कमांडो भी हमारी मदद नहीं कर पायेंगे अगर चाकू दिखाओगे तब ये लोग हमारी मदद करेंगे। इस तरह से हमारी तो आत्मियता बन गई है इन कमांडोज के साथ।

 

कमांडोज अपना बुलेटप्रूफ़ और हथियार अपने साथ रखकर हमेशा युद्ध के लिये तैयार रहते हैं सलाम है मेरा उनके जज्बे को और हिम्मत को और उनके परिवार को।