ब्लॉग में php का अपडेट, निवेश क्यों करना चाहिये वीडियो, पंजीर लड्डू और सरकारी बैंकें

जिन चीजों के बारे में जानकारी न हों वे बहुत सारा समय खा जाती हैं, पिछले सप्ताह से परेशान था कि php का नया वर्शन कैसे ब्लॉग के लिये अपडेट करना है, आज भी सुबह से ३ घंटे परेशान हो लिया, क्योंकि वर्डप्रेस का नया वर्शन php के अपडेट के बाद ही अपडेट होता, होस्टगेटर ने नया सॉफ्टवेयर बहुत ही साधारण वाला बना दिया, पर कहीं कोई जानकारी नहीं, खैर cpanel और blog में backup लेकर अपडेट कर ही दिया। अब अपनी वेबसाईट php 7.3 पर हैं।

इसी कारण से पिछले सप्ताह से कोई ब्लॉग भी पोस्ट नहीं कर पा रहे थे, अब कर पायेंगे। Continue reading ब्लॉग में php का अपडेट, निवेश क्यों करना चाहिये वीडियो, पंजीर लड्डू और सरकारी बैंकें

वित्तमंत्री का यू टर्न U Turn of Finance Minister

वित्तमंत्री के कल बजट के गड़बड़ी वाले फैसलों में U टर्न के बाद शेयर बाजार के विश्लेषक सोच रहे थे कि अब सोमवार से बाजार फिर तेजी में आयेगा, पर कल रात में ही ट्रम्प बाबा ने गेम कर दिया और अमेरिकी शेयर बाजार 3% नीचे आ गये, ट्रम्प ने अमेरिकी कंपनियों को कहा है कि अपना धंधा चीन से समेटो और किसी और देश में धंधा लगाओ।

वैसे भी ट्रम्प बाबा बहुत बड़े वाले हैं, अगर उनको चीन की वाट लगानी है तो अपनी खुद याने कि अमेरिका की इकॉनॉमी की वाट लगानी पड़ेगी, क्योंकि चीन ही डॉलर बांड का बहुत बड़ा निवेशक है, और तभी चीन की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

तो अब विश्व में जबरदस्त मंदी आने में बहुत देर नहीं है, क्योंकि अगर किसी को परेशान करना हो, वजूद मिटाना हो तो डॉलर हिलेगा, और डॉलर हिला तो सारे देश डांस करेंगे।

यहाँ बताता चलूँ कि कल डॉलर 72 रूपये को पार कर गया है, और बस अब जल्दी ही 75 भी पार कर जायेगा। आप सबको जबरदस्त विकास की बधाई

कुछ फेसबुक स्टेटस

ऐसा लग रहा है कि चिदम्बरम के अंदर जाते ही सरकार को अर्थव्यवस्था सही करने के आइडिया आने लगे हैं, चिदम्बरम को अंदर ही रखो जब तक अर्थव्यवस्था ठीक न हो जाये, अब बेचारे को डंडे के दम पर ही सही सरकार को बताना पड़ रहा है।

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तो अभी तो चौपहिया वाहन बनाने वाली सभी कंपनियों की वाट लगी पड़ी है, पर दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों की बिक्री में गिरावट नहीं है, और हाँ ध्यान रखिये बजाज ऑटो अब आने वाली तेजी में मुख्य भूमिका निभायेगा, हीरो मोटर्स भी है, पर बजाज ऑटो मार्केट लीडर है।

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हम रहते हैं स्वच्छ भारत में जहाँ गोबर या कुत्ते की टट्टी यहाँ वहाँ सर्वत्र मिल ही जाती है, कल MG Road पर घूम रहे थे, हम हमारी दोस्त मंडली के साथ थे, सामने से दो भद्र महिलायें आधुनिक वस्त्र धारण किये हुए थीं, और बातें करते हुए चल रही थीं, तथा साथ ही एक महिला फोन पर चलते हुए कुछ टाईप भी कर रही थीं, तभी बीच में गोबर मिल गया, साथ चल रही महिला मित्र ने रोका अरे संभल कर, तो फोन वाली महिला, जोर से हिन्दी में बोली, बाय गॉड केक कटने से बच गया।

हम सोच रहे थे कि हम ताली बजाकर जन्मदिन मुबारक थोड़े ही गाने वाले थे 😂😂😂😂

#MG_रोड_के_किस्से

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लो जी अब पता चला है कि लार्ड माउंटबेटन होमो था, तब भी नेहरू जी से बहुत पटती थी, आश्चर्य है। यह भी हो सकता है कि इसी ब्लैकमेल के चलते वो प्रधानमंत्री बने हों, FBI फाइल्स खोलो मोटा भाई, जबरदस्त मसाला मिला है।

अब जम्मू कश्मीर लेह लद्दाख में रोजगार पैदा करने की जरूरत

अनुच्छेद 370 खत्म और 35Aस्वत: खत्म, आजाद हुई हमारी ‘जन्नत’ इस हेडलाईन के साथ आज का समाचार पत्र आज सुबह मिला। वैसे तो कल ही सुगबुगाहट चल ही रही थी और जब सदन से यह ऐलान हो गया तो, बस दिल बागबाग हो गया, अच्छी खबर यह भी थी कि जम्मू कश्मीर से लद्दाख अलग कर दिया गया है व उन्हें अब अलग अलग केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया है। पूरी घाटी में पिछले 2-3 दिनों से भारी मात्रा में सुरक्षा बल तैनात हैं और पूरी दुनिया से अलग थलग कर दिया गया है, जिससे कोई भी अलगाववादी ताकतें घाटी में आतंक न फैला सकें।

इस खबर के साथ ही सोशल मीडिया में बहुत से स्टेटस आने लगे कोई कहता कि अब तो जम्मू कश्मीर, लेह लद्दाख में जमीन खरीदेंगे, घर खरीदेंगे, अब घाटी की सुँदर लड़कियों से शादी भी कर सकते हैं इत्यादि। अभी तक जम्मू कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा था और करोड़ों रूपया भारत सरकार द्वारा बहाया जाता रहा है, जिसका कोई हिसाब किताब भी नहीं था, बस वह दो नंबर के जरिये कुछ राजनैतिक दलों और राजनैतिज्ञों की जेब में पहुँच जाता था। अब तक कोई भी विकास का कार्य नहीं हुआ और न ही कोई रोजगार पैदा हुए।

अब इस बात के आसार लग रहे हैं कि जम्मू कश्मीर में नये व्यवसाय लगेंगे, जिससे वहाँ रोजगार पैदा होंगे। जम्मू, श्रीनगर, लेह, लद्दाख इतनी प्यारी जगहें हैं, ये भारत के अपने खुद के स्विट्जरलेंड हैं, जहाँ हम चाहते हुए भी जाकर रह नहीं सकते हैं, जैसे यूरोप में कई बेहतरीन जगहों पर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट सेंटर हैं, वैसे ही कुछ नये सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट सेंटर खुलने चाहिये, जिससे IT वालों को भी भारत के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने का मौका मिले, साथ ही जब एक अच्छी नौकरी वहाँ शुरू होगी तो एक नौकरी से कम से कम 10रोजगार पैदा होते हैं, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट सेंटर के लिये विशेष तरह के स्किल की जरूरत होती है, जो कि हो सकता है कि वहाँ के रहवासियों में अभी न हों, परंतु दैनिक जीवन के जरूरत वाले कई कार्यों के कारण वहाँ अन्य रोजगार पैदा होंगे।

जब जम्मू कश्मीर में रोजगार पैदा होंगे तो वहाँ के रहवासी, अलगाववादियों की बातों में नहीं आयेंगे और वे खुद ही अच्छे बुरे में फर्क पैदा कर पायेंगे, व 100 रूपये में पत्थर फेंकने को तैयार नहीं होंगे, साथ ही आतंकवादियों को समर्थन अपने आप ही कमी आ जायेगी। इस सबसे सबसे बड़ा अंतर भारत के खजाने पर पड़ने वाला बड़ा बोझ कम हो जायेगा। विश्व के पर्यटन मानचित्र पर जम्मू कश्मीर हीरे की तरह चमकेगा। रोजगार पैदा होने से सबसे बड़ा फायदा होगा कि पाकिस्तान पर जबरदस्त दबाब होगा, साथ ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों द्वारा भी पाकिस्तानी सरकार पर इसी तरह के व्यवसाय को स्थापित करने का दबाब होगा, अगर पाकिस्तानी सरकार द्वारा यह नहीं किया जाता है तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोग भारत में विलय होने के लिये दबाब बनायेंगे और जन आंदेलन की शुरूआत होगी।

अब केवल जम्मू कश्मीर लेह लद्दाख में एक अच्छी बेहतर नीति की जरूरत है, जिससे हम वैश्विक पटल पर भारत की छवि को अच्छे से दिखा सकें व गर्व से कह सकें कि अखण्डता पुनप्रतिष्ठित हुई।

शेयर बाजार का यूँ गिरना और सरकार का कोई कदम न उठाना

शेयर बाजार का यूँ गिरना, सब बजट का कमाल है, बस यह अलग बात है कि कुछ लोग जो सरकार के सहयोग में खड़े रहते हैं, वे इसे मानने को तैयार नहीं हैं, जिनके ऊपर ज्यादा टैक्स थोपा गया है, वे लोग ज्यादा कमाई करते हैं और उनके पास निवेश करने के लिये बहुत से देशों में जाने के ऑप्शन हैं, मेरे कुछ जानकार तो बजट के पहले ही सिंगापुर जाने की तैयारी कर चुके थे और बजट के बाद उन्होंने कहा भी कि देखा यह सरकार केवल अपनी कमाई का सोच रही है, पर जनता की कमाई का और उनकी सुविधओं का नहीं सोच रही है, तो हम अपना पैसा भारत से ले जायेंगे और बहुत से ऐसे देश हैं जहाँ कम कर लगता है, वहाँ निवेश करेंगे।

खैर उनकी बात तो सही है, और बाजार बजट के बाद से लगातार ही गिरते जा रहा है, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने अभी हाल ही में ही पिछले 3दिनों में 10,000 करोड़ रूपयों की बिकवाली की है, और खरीददारी के लिये भारतीय संस्थागत निवेशकों में से कोई भी खड़ा नहीं दिखाई दिया, पहले LIC बाजार से खरीददारी करके शेयर बाजार को सँभाल लेती थी।बजट के बाद से रोज ही विदेशी संस्थागत निवेशकों ने बिकवाली की है और निवेशकों को बजट के बाद से 10 लाख करोड़ का नुक्सान उठाना पड़ा है, यह राशि उस राशि से बहुत ज्यादा है जो कि सरकार कर के रूप में वसूलना चाहती है।

कुछ लोग कह रहे हैं कि ये नये बदलाव हैं और इस तरह के झटके तो लगने ही हैं, वहीं कई लोगों का कहना है कि अर्थव्यवस्था में गति कहाँ से आ रही है, कोई कुछ समझाने की कोशिश करेगा। वहीं सरकार सारे सरकारी उपक्रमों को बेचने पर तुली हुई है, हो सकता है कि यह समय की माँग है जैसे कभी सरकार उपक्रमों को सरकारी बनाने के लिये जद्दोजहद कर, भारत की अर्थव्यवस्था को ऊँचाई पर ले जाना चाहते थे, पर सरकारी कर्मचारियों की अकर्मण्यता और सरकारी तंत्र की जटिलता के कारण यह तरीका भी नाकाम साबित हुआ।

शेयर बाजार अभी भी अपने उच्च स्तरों पर टिका हुआ है, जिसका मुख्य कारण है कि कुछ कंपनियाँ, जो बहुत अच्छा कर रही हैं, यह जो दिन हम देख रहे हैं यह स्थिति 2008 के वैश्विक मंदी से भी ज्यादा खराब है, क्योंकि 2008 में जो मंदी आई थी, वह वैश्विक मंदी का कारण थी, और पूरा विश्व उस समय मंदी से गुजर रहा था, व जैसे ही मंदी से विश्व उबरा, भारत भी मंदी के संकट से बाहर आ गया था। इस बार यह वैश्विक मंदी नहीं है, यह भारत सरकार के बजट के कारण स्थिति उपजी है, और भारत सरकार इस बारे में कुछ भी करने के लिये प्रतिबद्ध नहीं दिख रही, जो कि खुदरा निवेशकों के लिये और भारत की अर्थव्यवस्था के लिये खराब बात है, क्योंकि यह जो मंदी है, यह कब खत्म होगी इसका कोई भी अंत समझ नहीं आ रहा है।

समस्या को तभी खत्म किया जा सकता है, जब आप समस्या को समझ पायें, अगर आप समझ रहे हैं कि कोई समस्या ही नहीं है तो समस्या का कोई भी समाधान निकालने की कोशिश ही नहीं करेगा। देखते हैं कि सरकार को शेयर बाजार की समस्य़ा गंभीर लगती है या वे इसे मंदी में ही चलने देंगे।

किताबें पढ़ना छोड़ो ऑडियोबुक सुनना शुरू करें

मेरी आदत बचपन से ही किताबें पढ़ने की थी, पापाजी शासकीय वाचनालय से हर सप्ताह ही दो तीन किताबें लाते थे और उनको पढ़ने के बाद फिर दूसरे सप्ताह वापिस से दे तीन किताबें घर में होती थीं, इस तरह से घर में हर महीने ही लगभग बारह से पंद्रह किताबें पढ़ी जाती थीं, और यही मुख्य कारण रहा मुझे किताबें पढ़ने का चस्का लगना का। लगभग सभी की आदत किताब पढ़ने की होती है किताबों में कहानियां लेख उपन्यास सब कुछ आता है जो कि मनोरंजन के लिए पढ़ी जाती हैं। 

किताब पढ़ने के लिए बहुत सारा समय हमें निकालना पड़ता है और कई बार हम किताब पढ़ते पढ़ते कुछ और सोचने लगते हैं कई बार शब्द बड़े बड़े होकर दिखने लगते हैं, तो कई बार शब्द दिखने ही बंद हो जाते हैं। पहले मैं बहुत किताबें पढ़ता था, अमेजॉन से फ्लिपकार्ट से बहुत सारी किताबें खरीदी और पढ़ीं,फिर किताबों के अंबार से परेशान हो गया और किंडल खरीद लिया। फिर किंडल पर किताबें पढ़ने लगा। किंडल एक आधुनिक यंत्र है, जिस पर किताबें पढ़ी जा सकती हैं और बहुत सारी किताबें एक साथ रखी जा सकती हैं तो उससे मेरी किताबें रखने की समस्या का समाधान तो हो गया, लेकिन कुछ सुविधायें भी मिलने लगीं जैसे कि अगर किसी शब्द का मतलब मुझे समझ में नहीं आ रहा है तो मैं उस पर क्लिक करके रखूँगा, तो उसका मतलब किंडल मुझे बता देगा तो इससे यह मुझे और ज्यादा सुविधाजनक लगने लगा। 

लेकिन सारी समस्या समय की थी कि इतना समय कहाँ से निकाला जाए कि रोज ही किताबों को पढ़ पाऊँ, फिर मैंने अमेजॉन ऑडिबल का सब्सक्रिप्शन लिया लेकिन वहाँ समस्या यह थी कि वहां पर हिंदी की किताबें कम हैं और अंग्रेजी की ज्यादा और हम ठहरे हिंदी मातृभाषा वाले। फिर हमने स्टोरी टेल एप्प का नाम सुना तो स्टोरी टेल में बहुत सी किताबें हिंदी ऑडियो बुक के रूप में उपलब्ध हैं। हमने पहले1 महीने का ट्रायल लिया और फिर उसके बाद में 1 महीने के लिए अब ₹299 का भुगतान कर रहे हैं और किताबों को सुन रहे हैं। तो किताबों को सुनने के लिए समय बहुत सारा निकल आता है। मैं लगभग रोज ही एक घंटा घूमने जाता हूँ, तो एक घंटा आराम से साथ में किताबें भी सुनता रहता हूँ। ऑफिस आने-जाने के समय में भी किताबें सुन लेता हूँ, तो इससे मुझे लगभग रोज 3 से 4 घंटे का समय किताबों को सुनने का मिल जाता है कई किताबें और कहानियां मुफ्त में भी उपलब्ध हैं, जिन्हें की पॉडकास्ट में सुना जा सकता है तो उसके लिए आपको गूगल पॉडकास्ट एप्प फोन में इंस्टॉल करना होगा और हिंदी कहानियों का पॉडकास्ट ढूँढना होगा इसके ऊपर मैं एक अलग से ब्लॉग लिखूँगा, जिसमें मैं पॉडकास्ट की खूबियों के बारे में बात करूँगा।

बस किताबों को सुनते वक्त आपको यह ध्यान रखना है कि अगर आप कहीं और व्यस्त हैं तो किताबों को सुनना रोक दें, नहीं तो कुछ हिस्सा कहानी को छूट जाता है, अगर किताब सुनते सुनते ही कुछ सोचने के लिये, ठहरने के लिये समय चाहिये तो अपनी किताब को थोड़ा रोक दें, क्योंकि यह स्वाभाविक प्रक्रिया है, जब भी हम किताब पढ़ते हैं तब भी हम उसे अपने से संबद्ध करके कुछ न कुछ सोचते ही हैं, या कोई नया प्लान बनाने लगते हैं। केवल किताब ग्रहण करने का माध्यम बदला है, पर प्रक्रिया तो वही चलेगी।आप भी देखिये कि अगर आपको किताबें सुनना अच्छा लगे। बस असुविधा यह है कि अभी ऑडियोबुक के तौर पर बहुत बड़ी संख्या में किताबें उपलब्ध नहीं हैं, पर उम्मीद है कि जल्दी ही बहुत सी किताबें ऑडियोबुक के तौर पर भी बाजार में आने लगेंगी, जैसे की अभी नई किताब आई थी ‘ओघड़’, लेखक ने ही इस किताब की ऑडियोबुक में आवाज दी है, तो यह किताब और भी जबरदस्त बन गई है।

बरसात में ऑफिस कैसे जायें? बाइक की फ्लोट सीट से कमर दर्द में आराम।

रोज ऑफिस जाना तो वैसे भी बहुत कठिन काम है, कुछ नया तो करना नहीं होता, बस वही घिसा पिटा करते रहो, पर अब रोज भी ऑफिस में नया करने को क्या मिलेगा, पर फिर भी ऑफिस जाना जरूरी होता है, खैर ब्लॉग का विषय यह नहीं है कि ऑफिस क्यों जायें, विषय है कि बरसात में ऑफिस कैसे जायें?

बैगलोर वैसे तो भारत में IT की राजधानी है, परंतु सड़क और ट्रॉफिक के मामले में हाल बेहाल है, जैसा कि सब जगह होता है, सड़के टूटी फूटी हैं, जगह जगह गड्डे हैं, सड़कों पर गड्डे हम भारतीयों की दुर्गती करते हैं। बैंगलोर में कुछ जगहों पर तो यातायात की रफ्तार इतनी धीमी है कि 3किमी कार से जाने में लगभग एक घंटा लग जाता है, और पैदल चलने की जगह नहीं है, फुटपाथ या तो हैं नहीं या फिर टूटे हुए हैं, अगर ठीक भी हैं तो दोपहिया वाहन कब फुटपाथ पर आकर टक्कर मार जाये कोई भरोसा नहीं।

पिछले वर्ष बारिश के दौरान मैं कार से ही ऑफिस जाता था, पर समस्या समय की ही थी, कि ऑफिस की दूरी घर से लगभग 17 किमी है और कार से जाने से लगभग एक तरफ के 2 घंटे लगते थे, तो रोज ही लगभग 4घंटे सड़क पर बिताने पड़ते थे, फिर ऑफिस जाने के अन्य साधनों को भी परखा गया, एक दिन बस से गये तो बस में आने जाने का समय 2 घंटे और बढ़ गया, फिर शेयर कैब से जाकर देखा गया तो भी समस्या जस की तस थी और रोज फिर से 4घंटे की ड्राईविंग करने लगे, अगर कार ऑटोमैटिक हो तो थोड़ी राहत है, वरना तो हाथ गियर बदलने में और पैर क्लच, ब्रेक और एक्सलीरेटर दबाने में ही थक जाते हैं।

दोपहिया वाहन से जाना थोड़ा कम थकाने वाला और कम समय में ऑफिस पहुँचने में कारगार साबित हुआ, बाईक से पूरा आधा समय कम हो गया, अब ऑफिस के लिये 4 घंटों की जगह 2 घंटों की ड्राईव करने लगे। अब ऑफिस बाईक से जाते हैं, नया रेनकोट लिया गया, जिससे बारिश में पहना जा सके, बाईक में एक बैग नुमा डिक्की भी लगवाई गई, और घिसे हुए टायर बदलवा लिये गये, फिर भी रोज कमर दर्द से परेशान थे, तो उसका इलाज कुछ मिल नहीं रहा था, सभी बाईक की सीटें एक ही बनावट की होती हैं और एक्टिवा टाईप के स्कूटर को रोज इतनी दूरी के लिये चलाने संभव नहीं क्योंकि उसके टायर छोटे होने से गड्ड़ों में बैलेन्स नहीं बन पाता। सोचा कि बुलेट खरीद ली जाये पर फिर यह भी देखा कि केवल बुलेट की सीट ज्यादा अच्छी होना ही खरीदने के लिये पर्याप्त नहीं, बुलेट भारी भी होती है और इतनी भीड़ भाड़ वाली सड़क पर संभालना थोड़ ज्यादा कठिनाई वाला काम है, तो अपनी पीठ को आराम देने के लिये और भी तरीके ढ़ूँढ़ने लगे।

फ्लोट सीट
फ्लोट सीट
फ्लोट सीट मेरी बाईक पर

बाईक से ऑफिस जाना हो तो बहुत सी सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं, क्योंकि तेज बारिश में कारों से भी कम दिखाई देता है और दुर्घटना की संभावना ज्यादा होती है, तो रेडियम वाली विंडचिटर ली और जूतों पर भी रेडियम रहे इस बात का ध्यान रखा गया।पर पीठ के दर्द का निवारण नहीं मिल रहा था, एक दिन हमने जिस वेबसाईट से विंडचिटर लिया था, उसी पर सर्फिंग करते हुए पाया कि कुछ फ्लोट सीट है, जिसमें हवा भरी जा सकती है और इससे बाईक चलाते हुए कमर में दर्द भी नहीं होता, साथ ही गड्डों के जर्क भी नहीं लगते, व सीट बुलेट जैसी भी है। हमने फ्लोट सीट मँगा ली, और इसमें हवा भरकर बाईक की सीट पर फिक्स कर ली, तो अब थोड़ा आराम है, कमर में ज्यादा दर्द नहीं होता। बरसात में ऑफिस जाना थोड़ा आरामदायक हो गया है, अतिरिक्त सावधानी यह रखते हैं कि बाईक की रफ्तार 40 से ज्यादा नहीं रखते, क्योंकि समय तो ट्रॉफिक के कारण बराबर ही लगता है।

C’est pas le fait de le faire.

C'est pas comme un . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . C'est 12 , ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' C'est pas le fait de l'avoir. C'est pas le bon des '''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''C'est pas le 3, l'autre. C'est pas le 3, l'autre. C'est pas comme un . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

C'est pas le fait de le faire. 4-5, c'est le 4-5, le 4-5, le 4-5, le 4-5, le 4-5, le 4-5. C'est le 9, l'autre. C'est pas le bon des .' '' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' C'est pas le bon des .'

C'est pas le même. C'est pas le bon des .' C'est pas comme un .' C'est pas le bon des .' C'est la TPS. 50-60 , '''''''''''''''' '' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' ' '

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C'est pas comme un . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . C'est pas comme un . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . C'est pas le bon des .' C'est pas comme un . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

الـ”لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا

اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا و الـ"لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، و" و اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا،

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اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا الـ50-60%

اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، اةي ؛ لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا، لا

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आयकर भरते हम सरकारी बंधुआ मजदूर

इस बार जब आयकर विभाग का रिटर्न भरने की प्रक्रिया में था, तो भरा गया आयकर देखकर बहुत कोफ्त हुई, कमाते हम साल भर के 12महीने हैं, सरकार का उस कमाई में कोई योगदान नहीं, न हमें अच्छी पढ़ाई दी, न हमें अच्छे रोजगार के अवसर दिये। हम जैसे तैसे संघर्ष करके यहाँ तक पहुँचे। अब जब आयकर का हिसाब लगाकर देखते हैं तो पता चलता है कि हम अपने लिये केवल 9 माह कमाते हैं, और बाकी के 3 महीने यानि कि जनवरी से मार्च तक सरकारी बंधुआ मजदूर हैं। क्योंकि हमारी 3महीने की कमाई सरकार आयकर के रूप में हमसे ले लेती है। न देने का कोई ऑप्शन भी नहीं है, कि सरकार कहे, हम ये सुविधायें नहीं दे पा रहे हैं तो आपको आयकर भरने की जरूरत नहीं है।

हर कोई सरकारी बंधुआ मजदूर है, भले 1 दिन का हो या 4-5महीने का, कोई एक दिन की कमाई का आयकर चुका रहा है तो कोई 4-5 माह की कमाई का आयकर चुका रहा है। मैं भी मन लगाकर अब 9 महीने ही काम कर पाता हूँ, बाकी के 3 महीने अनमने मन से काम करता हूँ, क्योंकि यह कमाई मैं अपने और अपने घरवालों के लिये नहीं बल्कि सरकार के लिये कर रहा हूँ। दुखी तो हर कोई है, परंतु हर कोई लिख नहीं पाता।

आयकर के साथ ही जमाने भर के सेसलगा दिये जाते हैं, अभी स्वास्थ्य और शिक्षा के लिये 4%का कर लगाया गया है, तो भी हमें न स्वास्थ्य की सुविधायें हैं न शिक्षा की सुविधायें हैं, अगर हमें स्वास्थ्य और शिक्षा सरकार नहीं दे सकती है तो कम से कम हमें उतनी रकम की छूट आयकर में मिलनी ही चाहिये, जितनी हम इन मदों में खर्च कर रहे हैं। अगर हम निजी क्षेत्र से स्वास्थ्य और शिक्षा लेते हैं तो भी सरकार हमसे उस पर GSTवसूल करती है, इस तरह से अगर सही हिसाब लगाया जाये तो व्यक्ति अपनी आय का कम से कम 50-60% कमाई का हिस्सा किसी न किसी तरह के कर देने में ही खर्च कर देता है।

सरकारी नौकरी वाले चाकरों के तो हाल ओर भी बुरे हैं, वे तो अपने मौलिक अधिकार का भी उपयोग नहीं कर सकते, कोई भी सरकारी नौकरी वाला अपनी अभिव्यक्ति का स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उपयोग नहीं कर पाता है, अगर कोई अपने मौलिक अधिकार का प्रयोग करता भी है तो उसे इसकी कीमत नौकरी की आँच से चुकानी पड़ती है, साथ ही कई अन्य नुक्सान भी हो सकते हैं।

भले कोई आयकर देता हो या न परंतु आप कोई भी समान खरीदें उस पर कोई न कोई टैक्स तो जरूर देते हैं, हर कोई सरकारी बंधुआ मजदूर है, भले ही आप सेवानिवृत्त हो जायें और कमाई के हिस्से पर जीवनभर आयकर भी दें, फिर उस कमाई में से बचत से हो रही ब्याज की आय पर भी आयकर दें, तो जब तक जिंदा हैं, तब तक आयकर तो देना ही है। इस तरह से मुझे तो कई बार लगता है कि हम केवल कुछ दिन या महीनों के ही बंधुआ मजदूर नहीं हैं बल्कि जीवन भर हम बंधुआ मजदूरी ही कर रहे हैं।