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क्या खोया क्या पाया अपनी अभी तक की जिंदगी में…. अपना खुद का निजी हिसाब किताब..

आज ऐसे ही अपनी बीती हुई जिंदगी का मतलब निजी हिसाब किताब कर रहे थे। तो हमने पाया कि बहुत कुछ हमने खोया है और बहुत कुछ पाया है।

और शायद जो खोया है अब हमें मिल भी नहीं सकता है और जो हमने पाया है कभी भी हमसे छिन सकता है या खो सकता है, शायद यह सभी के साथ होता है।

जो खोया है वह है हमने अपनों के करीब रहने का सुख, खुद के लिये समय और परिवार के लिये नितांत निजी समय, पर अपने खुद में इतना उलझ गये हैं कि ये सब बेमानी हो गया है। और जो मिला वो है अपने आप की दुनिया, नेट की दुनिया, जिसे हम कभी भी खो सकते हैं। वैसे तो इस नश्वर शरीर का भी कोई भरोसा नहीं है, परंतु प्यार तो हो ही जाता है।

इसीलिये तो भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है इस दुनिया को “दुखालयम”, मतलब कि दुखों का घर। इस भौतिक दुनिया में दुखों के बिना जीवन संभव नहीं है।

खैर हमने खोया भगवान की भक्ति को भी, पर फ़िर भी उनके प्यारे भक्तों के मधुर धुनों और बातों को सुनते रहते हैं, नेट से शायद हमने सबसे अच्छी चीज यही पायी है। हम भले ही कितनी दूर हों पर भगवान की मधुर बातें उनके चर्चाकारों द्वारा की गई हमारे पास सभी जगह उपलब्ध हैं।

शायद बाहरी तौर पर केवल इतना ही प्रकट कर सकते हैं, क्योंकि और ज्यादा हम बताना नहीं चाहते हैं। खोते तो सभी हैं और पाते भी सभी हैं, हम कोई अनोखे थोड़े ही हैं, ये तो बस माया का खेल है। अगर कुछ बताना चाहें अपने खोये पाये के बारे में तो अवश्य टिप्पणी में बतायें।

दिल और मन का विश्लेषण, आपके ऊपर क्या हावी रहता है, दिल या मन। दिल तो पागल है दिल दीवाना है / मन तो पागल है मन दीवाना है… (An Analysis of your Internal thoughts..)

    दिल जो केवल वही बात मानने को तैयार होता है जो कि व्यक्ति आत्मिक रुप से ग्रहण कर सकता हो, और उससे किसी को दुख नहीं पहुंचता हो, जो दिल चाहता है वह अगर उसे नहीं मिलता हो तो भी वह संतुष्ट रहता है कि चलो शायद अपना नहीं था।

     मन जो केवल वही बात मानता है जिसे मन चाहता है, जो कि व्यक्ति बाहरी रुप से ग्रहण करता है, फ़िर उससे किसी को कितनी भी चोट लगती हो उससे मन को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है, अगर चाही वस्तु मन को नहीं मिली तो हमें बहुत बुरा लगता है और असंतुष्ट असहज रहता है। मन जो चाहता है हासिल करना चाहता है, फ़िर चाहे वह बुरा हो या भला, इससे मन को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।

    जब हम कहते हैं कि अपने दिल के बात बताऊँ तो वह एक सच्ची बात होती है, परंतु जब हम मन की बात करते हैं तो वह हमारे ऊपरी आवरण के अहम को संतुष्ट को करने वाली बात करते हैं।

    अगर दिल की बात पूरी नहीं होती है तो हमें बुरा नहीं लगता है, कि चलो कोई बात नहीं कहकर अपना दिल बहला लेते हैं। परंतु अगर मन की बात पूरी नहीं होती है तो गहरी टीस हमेशा मन के किसी कोने में पलती रहती है और धीरे धीरे अहम के रुप में परिवर्तित होती जाती है।

    दिल और मन कहने को हम एक रुप में ही कहते हैं, परंतु दोनों के कर्म और सोच बिल्कुल अलग हैं, दिल अगर साधु प्रकृति का है तो मन दुष्ट प्रकृति का है।

    दिल और मन का विश्लेषण कैसा लगा, आपके ऊपर क्या हावी रहता है, दिल से बताईयेगा मन से नहीं।

    तभी तो मैं कहता हूँ कि दिल तो पागल है दिल दीवाना है / मन तो पागल है मन दीवाना है…

काश कि हम पतले ही रहते मोटे न होते, और अब ….. हाल बुरा है…. और क्या जबाब दें अपनी इस मोटी चर्बी की बेशर्मी का !!!

पता नहीं कि हम मोटे हैं या स्वस्थ्य, किस श्रेणी में रखे जाते हैं, पर हाँ सभी लोग जिसे भी जब भी मौका लगता है भाषण जरुर पिला डालता है कि भाई बहुत हैल्थी हो गये हो, लगता है कि खाते पीते घर के हो।

हम भी हमारे पुराने दिन याद करते हैं जब कभी हम पतले हुआ करते थे, कभी हमारी कमर का नाप २८-३० इंच का हुआ करता था, और अब ज्यादा नहीं है पर फ़िर भी बताने में शर्म आती है। सोचते हैं कि काश कुछ ४-६ इंच कम हो जाये।

सोचते भी हैं कि रोज खूब चलें, दौड़ें, जिम मॆं जायें, ये करें वो करें, ये न खायें और कुछ ऐसा खायें जिससे किसी तरह से पतला हुआ जा सके पर हे भगवान !!! कुछ नहीं हो रहा है। कुछ भी शुरु करो तो अपने मन के सातों घोड़ों को काबू में रखना मुश्किल होता है, और समय निकालना भी। क्योंकि चर्बी चढ़ाने के लिये समय हमें बहुत मिल जाता है परंतु कम करने के लिये समय निकालना बहुत मुश्किल होता है, दुनिया का सबसे बड़ा सत्य यही है। शायद सभी लोग मेरी बात से सहमत भी होंगे। हम पीना चाहते हैं, जीना चाहते हैं, खाना चाहते हैं, परंतु कैसे मोटे होकर !!!!

सोचते भी हैं शुरु भी करते हैं परंतु कुछ दिन करने के बाद सब वही ढ़ाक के तीन पात, थोड़े दिन सुबह घूमने गये पूरे जोश के साथ फ़िर वो जोश और जुनून उतर गया और आ गये वापिस अपनी वाली पर, फ़िर जिम जाना शुरु किया फ़िर वो भी बंद कर दिया, अब ये हालत है कि कोई पूछता है कि भई नया क्या शुरु किया है, तो अपनी बगलें झाँकने लगते हैं। अब तो हम यही बोलने लगे हैं हाँ सुबह ५-७ किलोमीटर घूम लेते है और दौड़ भी लेते हैं, उठने के पहले। 🙂

अब और क्या जबाब दें अपनी इस मोटी चर्बी की बेशर्मी का। शायद मोटे लोग ओह !!!! माफ़ कीजियेगा हैल्थी लोग ही कुछ नया नुस्खा बताकर मेरी मदद करेंगे और अपनी भी।

चैन्नई में भी कम लूट नहीं है.. लुटने वाला मिलना चाहिये..

जैसा कि आमतौर पर सभी शहरों में होती है लूट वैसी ही लूट चैन्नई में भी है, अब अभी समझ नहीं पा रहे हैं कि लूट कम है कि ज्यादा है, हमें तो ये पता है कि लूट, लूट ही होती है, चाहे वह कम हो या ज्यादा।
यहाँ पर ऑटो मीटर से चलाने का रिवाज ही नहीं है, हमें अपने गंतव्य तक जाने के लिये रोज ही मगजमारी करना पड़ती है, रोज इन ऑटो वालों से उलझना पड़ता है, जितनी दूरी का ये लोग यहाँ ८० रुपये मांगते हैं, उतनी दूर मुंबई में मीटर से मात्र १५-१८ रुपये में जाया जा सकता है।
अब और देखते हैं कि कौन कौन लूट मचा रहा है, क्योंकि टैक्सी वालों के भाव भी बहुत ज्यादा हैं, प्रीपैड टैक्सी अगर २८० रुपये लेती है तो बाहर अगर आप टैक्सी से मोलभाव करने जायेंगे तो वो ८५० रुपये से कम में नहीं मानेगा।
चारों तरह लूट मची है, लूट सके तो लूट !!!!

कल सूर्यग्रहण था और ग्रहण का पहला प्रकोप हमारी शर्ट पर निकला, तो शायद हम बच लिये… “बांके बिहारी लाल की जय”

   कल सदी का सबसे लंबा सूर्य ग्रहण था, शायद वैसे जैसा कि महाभारत में हुआ था क्योंकि दोपहर को ही सन्ध्याकाल जैसी स्थिती निर्मित हो गई थी।

   हम ग्रहण काल में घर से निकले ऑफ़िस जाने के लिये और बड़े इत्मिनान से ऑटो को हाथ देकर रोकने लगे। कई ऑटो रुके पर कोई उस तरफ़ जाने को तैयार ही नहीं था (ये तो रोज की बात है ), एक ऑटोवाले ने सहमति दी तो हम जैसे ही उसमें बैठने लगे पता नहीं कैसे हमारी शर्ट की ऊपरी जेब ऑटो के मीटर में उलझ कर फ़ट गयी, और हम हतप्रभ से अपनी शर्ट को देखने लगे।

   वैसे भी मन तो शंकालू ही होता है सोचा कि चलो ग्रहण की शुरुआत हो चुकी है अपने ऊपर अब बेटा दिनभर के लिये तैयार हो जाओ, पता नहीं दिन कैसा जाने वाला है। फ़िर क्या था ऑटो से उतरे वापिस घर आये और शर्ट बदल कर वापस चल दिये। क्योंकि अपनी तो पहले की हिस्ट्री भी खराब है ग्रहण के दिनों की, हाँ यह पहला सूर्य ग्रहण था और अभी तक जितने भी बड़े बदलाव या नुक्सान हुए थे वो चंद्र ग्रहण से हुए थे। हो सकता है कि हम खुद ही उस समय लापरवाह हो गये हों और हमारी शर्ट फ़ट गयी हो।

   पर हाँ दिनभर काफ़ी अच्छा गया, और तो और जिन कार्यों के न होने की उम्मीद थी वे कार्य भी हो गये। लगता है कि शनि शर्ट पर ही था। 🙂

   यह तो सब जीवन में चलता ही रहता है, और जीवन इन्हीं उतार-चढ़ाव का नाम है, इनके बिना जीवन अधूरा है।

   पर फ़िर भी मन में यह तसल्ली रही कि चलो इस बार ग्रहण से अपन बच लिये, कोई नई समस्या या जिंदगी में नई पेचिदगियाँ नहीं आईं और सब मस्त रहा। सब मुरलीवाले की माया है। इसलिये हम तो हमेशा “बांके बिहारी लाल की जय” कह लेते हैं।

फ़ोरेनरों को उनके देश से पढ़ा के भेजा जाता है कि “भारतीय चोर होते हैं”, और वे खुद…

    क्या आपने कभी सुना है कि भारत का वीसा मिलने के बाद फ़ोरेनरों के लिये उनका दूतावास एक मोडरेशन क्लास लेता है और उसमें भारत में बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताया जाता है और लगभग यह वाक्य हर बार दोहराया जाता है “कि भारतीय चोर होते हैं..”, और वे खुद..

    हम कल का टाईम्स ऑफ़ इंडिया आज सुबह पखाने में पढ़ रहे थे क्योंकि हमारा समाचार पत्र थोड़ा लेट आता है और हमको सुबह उठकर एकदम प्रेशर बन जाता है, तो कुछ समाचार वहीं पर इत्मिनान से पढ़ लेते हैं।

    तो उसमें एक खबर थी कि वकील अपना फ़ोन एटीएम में भूल गया और फ़ोरेनर ने उसे उठा लिया।

   हाईकोर्ट वकील एटीएम में पैसे निकालने गया और अपना कीमती ब्लैकबैरी मोबाईल एटीएम के ऊपर ही भूल गया, जब १५ मिनिट बाद उसे ध्यान आया कि मोबाईल तो एटीएम में ही भूल गया हूँ, लेकिन वापिस आने पर मोबाईल वहाँ नहीं मिला। उन्होंने पहले पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई और फ़िर एचडीएफ़सी बैंक के वीडियो क्लिप देखने पर पता चला कि उनके बाद तीन फ़ोरेनरों ने एटीएम का उपयोग किया था और उसमें से एक उनका मोबाईल उठा कर ले गया मतलब कि चोरी की। वकील ने एचडीएफ़सी बैंक के चैन्नई ऑफ़िस से जानकारी निकाली तो पता चला कि चोर आस्ट्रेलिया का है। वहीं से उनको उसका नाम और बैंक एकाऊँट नंबर भी मिल गया जब मोबाईल को ट्रेस किया गया तो पता चला कि अभी वह दिल्ली में है, उससे ईमेल पर अपील भी की है कि मोबाईल वापिस दे दे और आस्ट्रेलियन दूतावास को भी ईमेल कर शिकायत कर दी गई है, पर अभी तक कुछ नहीं हुआ है, कोलाबा पुलिस मामले की छानबीन कर रही है।

    तो इस बात से ये तो साबित हो गया कि मुफ़्त की चीज सभी को अच्छी लगती है, चोरी के कीटाणु सभी में होते हैं बस किसी के एक्टीवेट होते हैं किसी के नहीं।

पूरा समाचार आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

ये कैसी शादी के बाद की आजादी, जो कुछ करना है वो पर्दे की पीछे करें, सार्वजनिक न करें।

अभी परसों ही में ट्रेन में यात्रा कर रहा था तो जिस केबिन में मेरी सीट थी, उस केबिन में एक परिवार जो कि नागपुर से सफ़र कर रहा था और उनका एक ६ साल का बेटा भी था। साइड लोअर व साइड अपर में एक नवविवाहित दंपत्ति थे। जो कि सबके सामने बड़ी ही अभद्र हरकतें कर रहे थे, खुलेआम एक दूसरे को चूम रहे थे और अश्लीलता की हरकतें कर रहे थे। परंतु बोले कौन ! क्योंकि कोई भी बोलना नहीं चाहता, मैं भी नहीं। क्योंकि इन लोगों को समझाने का कोई मतलब ही नहीं है।

जो परिवार मेरे पास बैठा था वो भी कनखियों से ये सब देख रहा था और बच्चे को अपने में बिजी रख रहे थे ताकि वो उनकी हरकतों पर ध्यान न दें परंतु वो बच्चा तो बड़ी गौर से वही सब देख रहा था और कुल मिलाकर वातावरण प्रदूषित हो रहा था। उस परिवार के सज्जन मुझसे बोले ये लोग क्यों थर्ड एसी में आये यही सब करना था तो सेकंड एसी में जाते कम से कम वहाँ पर्दा रहता है जो भी करते ये लोग उस पर्दे के पीछे कम से कम हमें तो दर्शक नहीं बनना पड़ता वो भी जबरदस्ती।

इस परिस्थिती ने वाकई यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर आप शादी के बाद घूमने (हनीमून) जा रहे हो तो बाहर नैतिकता से रहें और जो कुछ करना है वो पर्दे की पीछे करें, सार्वजनिक न करें।

किसी भी सोफ़्टवेयर को पोर्टेबल कैसे बनाये और पेनड्राईव से सीधे चलायें। (How to convert any application portable and run from a USB drive)

पोर्टेबल उत्पाद मुझे बहुत ही अच्छे लगते हैं क्योंकि उन्हें संस्थापित (Installation) करने की जरुरत नहीं पड़ती है। ये उत्पाद आपके विन्डोज की रजिस्ट्री में दर्ज नहीं होते और सबसे बड़ी बात आप इन पोर्टेबल उत्पादों को अपने साथ पेनड्राईव पर ले जा सकते हैं। पोर्टेबल उत्पाद केवल पोर्टेबल चीजों के लिये नहीं आप इसे पीसी पर भी उपयोग कर सकते हैं, ओर जैसा मैंने पहले बताया है बिना संस्थापित किये। केवल हार्डडिस्क पर कापी कीजिये और चलाइये। बहुत सारे उत्पाद अपने पोर्टेबल रुप में उपलब्ध हैं, लेकिन सारे नहीं। इसलिये मैं आपको बताने जा रहा हूँ कि कैसे किसी भी सोफ़्ट्वेयर उत्पाद को पोर्टेबल उत्पाद में बदल सकते हैं। माइक्रोसोफ़्ट ऑफ़िस २००३ के साथ यह समझते हैं कि कैसे पोर्टेबल उत्पाद में बदला जाता है।


पोर्टेबल उत्पाद में बदलने के लिये हम लोग उपयोग करेंगे एक सोफ़्टवेयर जो कि वीएमवेयर थिन (VM Ware Thin) के नाम से जाना जाता है। वीएमवेयर थिन एक ऐसा सोफ़्टवेयर उत्पाद है जो कि किसी भी सोफ़्टवेयर को एक EXE फ़ाईल में बदल देगा जिसे आप बिना संस्थापन के सीधे चला सकते हैं और कहीं से भी किसी भी मीडिया से पेनड्राईव, सीडी, डीवीडी, हार्डडिस्क इत्यादि। यह एक वर्चुअल ओपरेटिंग उत्पाद बनाता है एवं वीएमवेयर थिन उत्पाद खुद की रजिस्ट्री और फ़ाईल सिस्टम उस EXE में शामिल कर लेता है।

वीएमवेयर थिन मे सब कुछ अच्छा है केवल इसके दाम को छोड़कर, इसका दाम है $8,187 (लगभग साढ़े चार लाख रुपये, पता नहीं उन्होंने क्या सोचकर इतने दाम रखे हैं!) । लेकिन वे उपलब्ध करवाते है एक पूर्ण उपयोगी उत्पाद ६० दिन के ट्रायल वर्शन पर, ओर यह डाउनलोड रिक्वेस्ट पर उपलब्ध है।

वीएमवेयर थिन को जरुरत होती है एक साफ़ पीसी, जिस पर फ़्रेश विन्डोज संस्थापित किया गया हो, ओर वो उत्पाद जिसे आप पोर्टेबल उत्पाद में बदलना चाहते हैं, संस्थापित हों। लेकिन चिंता करने की कोई बात नहीं है यह पुराने संस्थापित विन्डोज पर भी समान रुप से कार्य करता है। (EXE वायरस मुक्त हो इसलिये ये सुझाव दिया गया था)| मेरे पीसी पर माइक्रोसोफ़्ट ऑफ़िस उपलब्ध था जिसे मैंने इस प्रक्रिया को करने से पहले हटा दिया जो कि बिल्कुल ठीक काम कर रहा था। लेकिन इस बात का मैं कह नहीं सकता कि यह सभी उत्पादों के लिये ठीक होगा। इसके लिये निम्नलिखित तरीके को अपनायें –

१. वीएमवेयर थिन संस्थापित कर सेटअप केप्चर चलाइये। (वीएमवेयर थिन का मुख्य फ़ाईल) स्टार्ट पर क्लिक करें।

२. चुनिये सी ड्राइव (C Drive) एवं कोई अन्य ड्राइव जहाँ पर आप माइक्रोसोफ़्ट संस्थापित करना चाहते हैं, अगर आप
ऑफ़िस सी ड्राइव पर ही संस्थापित करना चाहते हैं तो केवल सी ड्राइव ही चुनिये।

३. प्री-इंस्टाल स्केन पर क्लिक करें और प्रोग्राम को चुनी हुई ड्राईव की पूरी स्केनिंग करने दें।

४. स्केनिंग पूरी होने के बाद ऑफ़िस को वापस से अपने पीसी पर संस्थापित कर लें, जैसे कि साधारणतया: करते हैं।

५. ऑफ़िस संस्थापित होने के बाद क्लिक करें पोस्ट-इंस्टाल स्केन को और फ़िर से इंतजार करें इस स्केन के खत्म होने का।

६. अब यह उत्पाद आप से पूछेगा कि कौन सी चलने वाली (executables) फ़ाईलों का पोर्टेबल उत्पाद बनाना है। दी गई
सूची में से चुन लीजिये व कन्टीनय़ू पर क्लिक करें।

७. अब आप से पूछा जायेगा कि इन फ़ाइलों को कहाँ पर स्टोर करना है।

८. जहाँ फ़ाईलों को आपने स्टोर किया है उस फ़ोल्डर को खोलकर बिल्ड.बेट (build.bat) चलाइये।

वीएमवेयर थिन अब पोर्टेबल फ़ाईल बनाकर उसी फ़ोल्डर में बिन नामक फ़ोल्डर बनाकर सेव कर देगा। बिन फ़ोल्डर में आपको exe ऑफ़िस की फ़ाईल मिल जायेंगी। इस फ़ोल्डर को आप अपनी पेनड्राईव पर कापी कर लीजिये और अपनी पेनड्राईव से सीधे ऑफ़िस चलाइये।

मन का ब्लागर होना बहुत जरुरी है ब्लाग लिखने के लिये, ब्लागर मन आखिर क्या चाहता है कुछ विश्लेषण

अब तो मेरा मन भी ब्लागर हो चला है, क्योंकि मन का ब्लागर होना बहुत जरुरी है ब्लाग लिखने के लिये, ब्लागर मन आखिर क्या चाहता है कुछ विश्लेषण –

१.आज कौन से नए विषय पर लिखा जाये कि पाठकों का असीम स्नेह मिले और ब्लागर मन की तड़पन को शांति मिल सके।
२.आसपास और अपनी जिंदगी में झांककर, घटी हुई घटनाओं को शब्दों के जादू से बुनकर अपनी जिंदगी के रंग सब को दिखा
दूँ।
३.साहित्यिक भाषा का उपयोग करुँ, जिससे ब्लागर मन के किसी कोने में बैठे साहित्यकार को दुनिया को दिखा सकूँ। (पहले
मैं कविताएँ लिखता था परंतु कार्य की व्यस्तता में सब खत्म हो गया।)
४.तंत्रजाल पर बहुत कुछ नया उपलब्ध है उसके बारे में खोजबीन कर अपने ब्लाग पर जानकारी प्रकाशित करुँ।
५.हिन्दी में अपने प्रोफ़ेशन के बारे में कुछ लिखूँ । ( लिखा था पर न ज्यादा हिट्स आये और न ही प्रतिक्रिया)
६.घरवाली ब्लाग लिखने पर काश झगड़ा न करे और यह भी सुनने को न मिले कि तुम मेरा समय चिठ्ठाकारी को दे देते हो।
(कई बार तो बड़े और तगड़े झगड़े हो चुके हैं। अब घरवाली को भी चिठ्ठाकारी के लिये राजी कर लिया है। अब वह भी जल्दी
ही चिठ्ठाजगत में प्रवेश करने वाली है।)
७.रिटायरमेंट के बाद फ़ुल टाईम ब्लागिंग करुँ।

भारत के नौजवानों को मेरा सलाम उनके जवानी से लबालब भरे खून के जोश को मेरा सलाम।

आखिरकार जवानी से लबालब भरे खून ने जोश दिखाया। कांग्रेस ने सपने में भी इतनी बढ़ी जीत का अहसास नहीं किया होगा पर जवानी से लबालब भरे खून ने जोश दिखाया और वो कर दिखाया जो शायद सपने में भी कोई नहीं सोच सकता था। कांग्रेस में युवा चेहरे ने कमाल दिखाया है २० साल बाद। २० साल बाद कांग्रेस में युवा चेहरा आया है और उसने राजनीति के मैदान में ऐसे पत्ते फ़ेंके जो बीजेपी समझ ही न पायी।