जब से लॉकडाऊन लगा है, तब से हम यूट्यूब पर ज्यादातर वीडियो खाने पीने व ट्रेवलिंग के वीडियो बहुत देखने लगे हैं। खाने पीने के वीडियो ज्यादा देखने का एक मूल कारण यह भी है कि लॉकडाऊन के चलते बाहर का खाना लगभग बिल्कुल ही बंद है। बेटेलाल अपनी परीक्षा के बाद बोर होने लगे थे, तो खाना बनाने में रूचि जागृत हुई, हम उन्हें रसोई में जाने की इजाजत नहीं देते थे, परंतु सोचा कि चलो अब लॉकडाऊन के चलते अपनी देखरेख में रसोई में काम करने की इजाजत दे देते हैं।
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हम तो वैसे कई प्रकार के वीडियो देखते हैं जैसे कि एक्सेल के फंक्शन को उपयोग करने के तरीके, पॉवरपॉईंट प्रेजेन्टेशन को किन तरीकों से ओर बेहतर बनाया जा सकता है, नई चीजों को सीखना, जैसे कि टैब्ल्यू, पॉवर बीआई इत्यादि।
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खैर हम आते हैं अपने लखनवी समोसे पर, फोटो नहीं खींच पाये, कल रात को ही यूट्यूब पर रनवीर बरार शेफ के चैनल से सीखा था, रनवीर लगता है कि हमउम्र ही होंगे, पर उनका बोलने का तरीका, खाना बनाने का सिखाने का तरीका, बिल्कुल ही अलग अंदाज है। हमें बहुत अच्छा लगता है उनका देसी तरीका जब वे खाने के मसालों के बारे में बताते हैं या फिर उस डिश से जुड़ी कोई कहानी, या उसकी दास्तान सुनाते हैं। देखिये खाने में कोई धर्म नहीं होता है, इसलिये खाने को खाने की दृष्टि से ही सोचना व देखना चाहिये, यह रनवीर का कहना है। एक बात ओर हर वीडियो में वे कहते हैं, ध्यान से देख लीजिये, या समझ लीजिये यह गड़बड़ी हो जायेगी ओर फिर आप कहेंगे कि रनवीर ने यह तो बताया ही नहीं, तो रनवीर ने आपको यह बता दिया है। तो सबकी अपनी अपनी सिग्नेचर टोन या वाक्य होते हैं, यह रनवीर का सिग्नेचर वाक्य है।
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लखनवी समोसे में नजाकत होती है, मिर्च नहीं होती है, उबले हुए आलू लेने हैं, हाथ में ही चाकू से छोटो छोटे टुकड़ों में काट लेना है, क्योंकि लखनवी समोसे हैं, नजाकत का हर समय ध्यान रखना है। फिर एक पैन में एक चम्मच घी, जीरा, सौंफ, बारीक कटी हुई अदरक, कूटा हुआ सूखा हरा धनिया डाल लें और फिर इसमें कटे हुए आलू मिला लें, अच्छे से आलुओं को चला लें, ऊपर से थोड़ा सा अजवाईन, स्वादानुसार नमक मिला लें। तो यह तो तैयार हो गया लखनवी समोसे का मसाला।
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अब बारी आती है समोसे की परत बनाने की, तो उसके लिये मैदा, थोड़ा अजवाईन व मौन के लिये घी, थोड़ा नमक और इसे मलना है बर्फ के ठंडे पानी से। समोसे का आटा थोड़ा सख्त रखें, आटा होने के बाद थोड़ी देर कपड़े से ढ़ँककर छोड़ दें।
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बस अब आटे से चकले पर रोटियों जैसे बेल लें और उसे बीच से काटकर किनारों पर थोड़ा पानी लगाकर समोसे के आकार में ढ़ालकर थोड़ा थोड़ा आलू का मसाला भरते जायें, ध्यान रखें समोसे छोटे बनायें। जब सारे समोसे भर जायें तब मीडियम तेज आँच पर समोसों को तल लें, ध्यान रखें कि अगर ज्यादा तेज गर्म तेल होगा तो समोसे पर फफोले पड़ जायेंगे। समोसे पर फफोले न पड़ें इसके लिये तेल बहुत ज्यादा तेज गर्म न हो, समोसे तलने में समय ज्यादा लगेगा।
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समोसे तैयार हो जायें तो इन लखनवी समोसे को आप हरी व लाल मीठी चटनी के साथ परोसें।
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हम अपनी जबान पर कंट्रोल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, परंतु घर के घर में अब 10 महीने हो गये हैं, कुछ तो एक्साईटेड होना चाहिये, तो खाने पीने में ही सही।
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बताईये आप घर में बंद होकर बोर तो हो ही रहे होंगे, आप कैसे इस समय का सदुपयोग कर रहे हैं, व नया क्या सीख रहे हैं।
सौरव गाँगुली को दिल का दौरा 2 जनवरी 2021 को पड़ा, और उन्हें तत्काल ही अस्पताल में ले जाया गया, तथा अब एन्जियोप्लास्टी भी की गई है, हमने यह अखबारों में व सोशल मीडिया में पढ़ा। दादा जल्दी स्वस्थ हों, हमारी शुभकामनायें उनके साथ हैं।
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सब जगह यही बात चल रही थी कि खिलाड़ी को कैसे दिल का दौरा पड़ सकता है, खिलाड़ी तो इतना दौड़ते भागते हैं, फिर भी उन्हें दिल का दौरा कैसे पड़ सकता है। दरअसल खिलाड़ी होने से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दिल का दौरा मतलब कि हमारे ह्रदय में ब्लॉकेज हो जाना, वो कोलोस्ट्रोल व ट्राईग्लिसराईड से होता है।
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कोलोस्ट्रोल याने कि कोई भी डेयरी उत्पाद जैसे कि दूध, घी, अंडा, पनीर, मांसाहार कुछ भी, वहीं दूसरी चीज है ट्राईग्लिसराईड तो यह मिलता है तेल में, भले कोई तेल हो, बादाम में सबसे ज्यादा होता है, नारियल में भी। तेल कोई हो वह आपको ट्राईग्लिसराईड देगा ही। एक बात और बता दें यहाँ कि तेल को अगर ज्यादा बार उपयोग किया जाता है तो उसमें ट्रांसफैट भी होता है, जो कि बहुत ही ज्यादा हानिकारक है, तेल को मात्र एक बार ही उपयोग करना चाहिये, उसके बाद उसमें ट्रांसफैट बनने लगता है, पर हम भारतीय लोग तेल को जाने कितनी बार उपयोग कर लेते हैं।
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तो होता यह है कि 18 वर्ष की उम्र तक शरीर की ग्रोथ होती रहती है और उसके बाद लंबाई बढ़ना बंद हो जाती है, पर खानपान में कोई सुधार नहीं होता, तो लंबाई की जगह मोटाई बढ़ने लगती है। जितना ज्यादा आप कोलोस्ट्रोल वाली चीजों का उपयोग करेंगे, उतनी ही जल्दी ह्रदयाघात की समस्या होगी। विस्तार से इस पर एक ओर पोस्ट लिख दी जायेगी।
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तो कोलोस्ट्रोल व ट्राईग्लिसराईड डैडली कॉम्बो हैं, और उच्च रक्ताचाप तो सोने पर सुहागा है। हम यही कहेंगे कि डेयरी उत्पादों, मांसाहार, धूम्रपान, मद्यपान व तेल सबसे ज्यादा हानिकारक है। न उपयोग करें, उतना अच्छा। दादा तो बड़ी हस्ती हैं, प्रधानमंत्री जी फोन करके उनसे हालचाल पूछते हैं, व उनके लिये भारत के बेस्ट ह्रदय रोग विशेषज्ञों की तत्काल ही समिति बना दी गई, पर हम साधारण लोग हैं, हमारे लिये तो सामान्य सा डॉक्टर भी हमें लाईन में बिठायेगा। अपना व परिवार की सेहत का ध्यान हमें ही रखना है।
आज सुबह मित्र से बात हो रही थी, तो उन्होंने उनके दो सहकर्मियों के लिये बात करी, जिन्हें मदद की दरकार है –
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पहला बंदा मिडिल ईस्ट में काम कर रहा था, पर उसकी मम्मी की तबियत खराब थी, और अकेला वही देखभाल करने वाला था, कंपनी से छुट्टी माँगी तो नहीं मिली, वह नौकरी छोड़कर घर आ गया और अब 6 महीने की देखभाल के बाद उसकी मम्मी स्वस्थ हैं।
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दूसरा बंदा उसका बॉस उसे बहुत परेशान कर रहा था, गालियों से बात कर रहा था, यहाँ तक कि अगर परिवार में कोई बीमार हो तो अस्पताल तक ले जाने के लिये छुट्टी नहीं देता था, कहता था कि सबसे पहले मेरा काम, परिवार बाद में, उस बंदे को यह बात नागवर गुजरी और बस नमस्ते कर दिया उस कंपनी को, क्योंकि उसके लिये पहले उसका परिवार बाद में कुछ और।
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दोनों ही मामलों मे देखा कि परिवार ही सर्वप्रथम अपनी प्राथमिकता में होना चाहिये, न कि कुछ और, अगर सब कुछ पैसा होता है, ओर पैसा कमाने के बाद अगर खुशी बाँटने को परिवार ही साथ न हो तो, ऐसे पैसे का भी क्या मतलब।
कुछ बातें जो हमें परेशान करती हैं, हमेशा ही दिमाग में घूमती ही रहती हैं। और हम उनके अपने दिमाग में घूमते रहने से ओर ज्यादा परेशान हो जाते हैं। दिन हो या रात हो, जाग रहे हों या सो रहे हों, बस वही बातें दिमाग में कहीं न कहीं घूमती रहती हैं। कई बार यह बड़ी मानसिक परेशानी की वजह हो जाती है। हम चाहे कुछ भी कर रहे हों, पर हमेशा ही वह परेशानी हमारे दिमाग में घूमती ही रहती है। दिमाग शांत नहीं रहता, हमेशा ही अशांत रहता है। दिमाग में जैसे कोई फितूर घुस गया हो।
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कई बार तो लगता है कि व्यक्ति साईको हो जाता है, हम कहीं भी कितना भी भाग लें, पर उन डर के विचारों से पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं, और जब तक कि वह परेशानी सुलझ नहीं जाती, तब तक हम किसी भी बात को सही तरीके से कर ही नहीं पाते, अपना कोई भी मनपसंदीदा काम हो, कोई फिल्म ही क्यों न हो, या फिर आपका कोई प्रिय लेखक ही क्यों न हो। भले घर में मनसपंदीदा व्यंजन बना हो, पर जब इस प्रकार की परेशानी से जूझ रहे होते हैं तो वह भी अच्छा नहीं लगता।
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कहना आसान है कि अपना ध्यान भटकाओ, उसके बारे में मत सोचो, कुछ ओर कर लो, कहीं घूम आओ, पर दरअसल परेशानी हमें छोड़ती ही नहीं, इसका एक कारण मुझे समझ आता है कि हम अपना आत्मविश्वास कमजोर कर चुके होते हैं और उसे हम अपने दैनिक जीवन की बहुत सी आदतों में प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं, कई बार अकेले में बैठकर रोने का मन करता है, कई बार कोने में घुटनों में छुपकर रहना चाहते हैं, तो कई बार हाथ पैर काँपने लगते हैं। यह सब बहुत ज्यादा नेगेटिव वातावरण ओर ज्यादा तकलीफदेह होता है।
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समस्या का समाधान बहुत सीधा नहीं है, क्योंकि किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता है, और न ही किसी को मन की पीड़ा बताई जा सकती है। कई बार छोटी परेशानी भी हम बड़ी समझ लेते हैं ओर परेशान होते रहते हैं। ऐसे समय जितना हो सके अपने आपको अच्छे लोगों के सान्निध्य में रखने की कोशिश करें, नेगेटिविटी कम करें। ध्यान करें, सुबह शाम टहलने जायें, प्रकृति के बीच रहें। छोटी छोटी चीजों में अपनी खुशियाँ ढूँढ़ें। आपने जो उपलब्धियाँ अभी तक पाई हैं, उन्हें याद करें और उनसे पॉजीटिव ऊर्जा लें।
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क्या और भी कोई तरीका है, इन परेशानियों से छुटकारा पाने का, तो बताईये?
क्या आपने कभी सोचा है कि समाज में अधिकतर लोग गुस्सा, क्रोध व गालियों का शिकार क्यों होते हैं, कोई भी बचपन से गुस्सा, क्रोध या गालियों का आदतन नहीं होता है। यह हमारे आसपास की सामाजिक व्यवस्था के कारण हम सीख जाते हैं। गुस्सा, क्रोध व गालियों में बहुत आत्मनिर्भरता है, जब गुस्सा क्रोध आयेगा तभी आपके मुँह से गालियों की बरसात होगी। गुस्सा आना न आना केवल और केवल आपके ऊपर निर्भर करता है।
गुस्सा हम कब करते हैं, अगर ध्यान से देखा जाये, तो उसके अपने कुछ पहलू होते हैं, पर मुख्य पहलू होता है कि हम किसी काम से खुश न होने पर गुस्सा होते हैं, गुस्सा क्रोध कई लोगों का भयंकर रूप से फूट पड़ता है तो कई लोग उस गुस्से को बेहतरीन तरीके से सीख लेते हुए निगल लेते हैं, परंतु यहाँ मुख्यत: बात यही है कि हमारी कोई बात पूरी नहीं होती है या फिर कोई काम हमारे मनचाहे तरीके से नहीं होता है, हम जैसा चाहते हैं वैसा नहीं होता है, तो गुस्सा अभिव्यक्ति के रूप में निकल आता है।
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गालियों का अपना गणित है, जब गुस्सा क्रोध की अभिव्यक्ति में व्यक्ति गुस्सैल होता है तो उसे अभिव्यक्त करने के लिये कठोर शब्द चाहिये होते हैं जिससे सामने वाला याने कि जिस पर गुस्सा किया जा रहा है, वह आहत हो, इसलिये गालियों का सहारा लिया जाता है, कई बार साधारण सी गालियों से ही काम चल जाता है और कई बार गुस्से से उस व्यक्ति के परिवार की महिलाओं को भी लपेट लिया जाता है। और इस गाली गलौच के चक्कर में कई बार बात इतनी बढ़ जाती है कि वह घटना अपराध का रूप ले लेती है।
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मैंने ऐसे भी वाकये देखे हैं जहाँ बरसों बरस की मित्रता केवल गाली गलौच के कारण खत्म होती देखी है। कई बार हम खुशी में गाली गलौच कर लेते हैं, परंतु ऐसे वाकये कम ही होते हैं, और यह उस परिवार या समाज पर भी निर्भर करता है, जहाँ हमारा उठना बैठना है। गाली गलौच दोस्तों में होना आम बात है, कहा जाता है कि जब तक गाली गलौच न हो तब तक दोस्ती पक्की नहीं होती है।
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आप बताईये क्या आप भी गालियों का सहारा लेते हैं जब आपको गुस्सा क्रोध आता है?
मैं जब ब्लॉग लिखता हूँ तो ब्लॉग के लिये विषय कभी ढूँढ़ता नहीं, बल्कि उस समय जो भी मेरे मन मस्तिष्क में चल रहा होता है, उसी विचार पर ब्लॉग लिख देता हूँ। कई बार ऐसा भी होता है कि हम किसी विषय पर चिंतन कर रहे होते हैं और उससे निकलने के लिये हमें कई बार लिखना होता है तो वह खुद के विचार ब्लॉग के रूप में प्रकट होते हैं।
आज सुबह ऐसा हुआ कि मैं ध्यान में था, और विषय मेरे सामने से निकलने लगा, सोचा था कि उसी पर ब्लॉग लिखूँगा, परंतु हुआ यह कि जब ध्यान से उठा तब तक मैं उस विषय को ही भुला बैठा, तो ऐसा कई बार हो जाता है, कोई सामान्य सी बात भी याद नहीं आती है। मेरे साथ ऐसा कई बार हो चुका है, जैसे कि कुछ चीजें होती हैं जो हम कहीं लिखकर नहीं रखते, वह गोपनीय होती हैं, परंतु हमेशा ही हमारे जहन में रहती हैं, जैसे कि बैंक का लॉगिन आई डी, पासवर्ड, मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ कि लॉगिन आईडी याद ही नहीं आता, फिर उस काम को मुझे टालना होता और थोड़ी देर बाद अपने आप ही याद आ जाता है, फिर उस काम को आगे कर पाता हूँ।
मुझे लगता है कि यह सामान्य प्रक्रिया है, और शायद सबके साथ होता है, जैसे कि कई बार मैं फोन या हैंड्सफ्री अपने आसपास ही कहीं रख देता हूँ, ढ़ूँढ़ता हूँ तो नहीं मिलते हैं, फिर परेशान होकर घर में भी सबसे पूछता हूँ, अंतत: पता चलता है कि मैं अपने पास रखा हुआ हूँ और बस वहीं न देखकर सारे घर में ढ़ूँढ़ रहा हूँ। यही जीवन में भी होता है, कई बार हममें ऐसे बहुत से अच्छे गुण होते हैं, या बातें होती हैं, जिन्हें हम जानते नहीं, परंतु हम उन्हें सीखने या पढ़ने के लिये बेताब होते हैं।
विषय की यात्रा की भी अपनी ही एक कहानी है, जैसे कि आप ब्लॉग के लिये विषय ही याद न रहना पर ही यह ब्लॉग लिख दिया। मन में कई बातें कई बार एक साथ, तो कई बार एक के बाद एक अपने आप चुपके से आने लगती हैं, और उन पर हमारा कोई वश नहीं होता। कई बार हमें सामान्य घटना में भी कोई अच्छा भाव मिल जाता है और कई बार हम उस पर गौर ही नहीं करते। इस मन की राह बहुत कठिन है।
बताईयेगा कि आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है, या होता है, या होता ही रहता है।
कई बार मुझे लगता है कि मैं कुछ ज्यादा ही दार्शनिक हो जाता हूँ। दार्शनिक मतलब कि दर्शन की बात करने वाला, और कई बार ऐसा होता है कि मुझे खुद ही दर्शन समझ नहीं आता या फिर मैं दार्शनिकों से भागने की कोशिश करता हूँ, शायद यह मूड पर निर्भर करता है। मैं दार्शनिक प्रोफेशनल से नहीं हूँ तो यह मेरा शौकिया शगल भी हो सकता है। Continue reading नीरस जीवन, दार्शनिकता और लालसा का अंत→
कई बार हमारे जीवन में ऐसा भी दौर आता है जब हम उसे पसंद नहीं करते, परंतु यह हमारी मर्जी पर निर्भर नहीं करता कि हम उसे दौर से न गुजरें। यह एक प्रक्रिया है, जिससे निकलना जरूरी होता है, भले दिन में लाख बार चिंता में रहें, भले करोड़ों बार आशा की नई किरण के बारे में सोचें, जो होना होता है,उसके लिये शायद हम ही जिम्मेदार होते हैं। Continue reading जीवन के वे दौर जो हमें पसंद नहीं→
इंसान असफलता से घबराता है, क्योंकि इस प्राणी का सफलता का प्रतिशत ज्यादा होता है। पर क्या आपको पता है शेर जो कि जंगल का राजा होता है, जिससे सब डरते हैं उसके शिकार की सफलता का प्रतिशत मात्र 25% होता है और 75% बार उसे असफलता मिलती है, मतलब उसे 4 बार शिकार करने पर मात्र 1 बार ही शिकार होने की संभावना होती है। पर शेर शिकार करना छोड़कर घास, फूल पत्ती नहीं खाने लगता, क्योंकि प्रकृति का अपना नियम है, सबके खानपान निश्चित हैं। असफलता से दुखी न होकर अपनी प्रकृति पहचानें व सफलता की ओर अग्रसर हों, शेर बनने की जरूरत नहीं पड़ेगी, उससे पहले ही सफलता मिलनी निश्चित है, पर आपको उतनी ही लगन से व एकाग्रचित्त होकर सफलता के लिये प्रयासरत होना होगा।
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एंटरप्रेन्योरशिप के लिये आइडिया
अपने आइडिया लिखने आने चाहिये, अच्छी तरह से उन्हें प्रस्तुत भी करना आना चाहिये, पर एंटरप्रेन्योरशिप में आइडिया अगर केवल 1 पेज का भी हो, तो भी बहुत कुछ हो जाता है। इसी को फॉलो करते हुए कल बेटेलाल ने एक आइडिया जनरेशन किया, शुरुआत है, आगे बात तो बननी ही है, किसी न किसी आइडिया को हिट तो होना ही है, बस उसके पहले बहुत सारे आइडिया सोचने होंगे, लिखने होंगे, तभी तो अनुभव आयेगा।
कोरोना से बचकर रहना होगा
लोगों को जो लगता है वह लगता रहे, मुझे लगता है कि वैक्सीन का हो हल्ला है, दूर दूर तक इसके अते पते नहीं हैं, आज की दुनिया स्वार्थी व महाबेईमानी है वे बस ऐसे ही सपने बेचते रहेंगे। लगता कि कम से कम अगले 5 से 6 वर्ष तो घर के अंदर ही गुजारने होंगे, नहीं तो बाहर राक्षस हवा में बैठा इंतजार कर ही रहा है। बाहर जाने से बचें, बस यही एकमात्र उपाय है।
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ज्यादा रिश्ते बनाने से ओर उनको निभाने से हम कमजोर व दुखी होते हैं। अंतरतम में झाँकें, व सुखी रहें, यही एक कुँजी है।
कल से बेटेलाल की इंडिपेंडेंट बैंकिंग शुरू हो गई, 811 Kotak में अपने नाम से 5 मिनिट में नया एकाउंट खुलवाया और कुछ पैसे ट्रांसफर किये, तो बेटेलाल खुश कि अब उनके पास ऑनलाइन बैंकिंग है, UPI ID, NEFT, IMPS सब कुछ है। वहीं से सीधे म्युचुअल फंड में भी निवेश कर सकते हैं।
बेटेलाल के नाम से खाता तब तक ऑनलाइन खुल नहीं सकता जब तक कि वे 18 वर्ष के न हो जायें, पर मनी मैनेजमेंट लेसन अभी से सीखना जरूरी है, जितना जल्दी सीखेंगे, उतना अच्छा रहेगा।
Kotak 811 में अमेजन का ₹250 का ऑफर चल रहा था तो हमने थोड़े ज्यादा पैसे जमा कर दिये, बेटेलाल कहने लगे अरे डैडी ये बहुत ज्यादा हैं, हमने कहा चिंता न करो सोमवार को वापिस ले लेंगे, बस जितने तुम्हारे हैं उतने ही इस खाते में रहेंगे। फिर भी कहते रहे कि डर लग रहा है।
फिर कहा कि कुछ ऑनलाइन खरीदना है, पर ऑनलाइन खरीदने का कॉन्फिडेंस नहीं है, जब भी ऑनलाइन ट्रांजेक्शन करूँगा, आपके साथ बैठकर ही करूँगा, हमने कहा कि यह भी ठीक है।
#आत्मनिर्भर #भारत की ओर बढ़ते कदम
कुछ अन्य फेसबुक स्टेटस
अगर आपको समझ न आ रहा हो कि कौन सा पिज़्ज़ा ऑर्डर करें, मार्गरिटा आर्डर कर लीजिये।
मार्गरिटा पिज़्ज़ा वैसा ही है, जैसे म्युचुअल फंड में इंडेक्स फंड, जब कोई म्युचुअल फंड न समझ आये तो इंडेक्स फंड ले लेना चाहिये।
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आज सुबह मैं सपने में 10 वर्ष आगे पहुँच गया था, तो घूमता रहा भविष्य में, जब आँख खुली तो वर्तमान में,
बस कुछ शेयर्स की उस समय की कीमत याद रह गई, पर यहाँ पब्लिकली क्या किसी की प्राइवेटली भी नहीं बताऊँगा।
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आज फ़िल्म देखी “आपला मानूस”, मराठी फिल्म है, नाना पाटेकर ने पूरी फिल्म में समां बांध दिया, पारिवारिक परिस्थितियों में कैसे कैसे समीकरण बनते हैं, इस पर बहुत ही बारीकी से इस फ़िल्म की कहानी में काम किया गया है, कहानी में बेटे बहु व ससुर के संबंधों पर बहुत अच्छे से कार्य किया गया है, काश ऐसी फिल्में हिन्दी में भी बनती। एक बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर फिल्म जिसमें कहानी परिवार के रिश्तों के इर्दगिर्द घूमती है।