Category Archives: अनुभव

क्यों हमें धन के लिये कार्य करना पड़ता है ? क्या हमारे बुजुर्गों ने सही निवेश नहीं किया था ?

    समाज में देखा होगा कि नौकरी पेशा व्यक्ति केवल और केवल धन के लिये ही कार्य करता है, अगर वह कार्य करना बंद कर दे तो उसकी मासिक आय रुक जाती है, और उसकी जरुरतें पूरी नहीं हो पायेंगी।

    क्या गलत है ? मैं यह सोच रहा हूँ, मेरे दादा भी पैसे के लिये कार्य करते थे, मेरे पापा भी और अब मैं भी !! इसका मतलब कि जितना कमाया वह बहुत कम था ऐसा तो नहीं ?

    नहीं !! मुझे लगता है कि हमारे बुजुर्गों ने कमाया पर सही तरीके से निवॆश नहीं किया, जिसके कारण हमें आज भी पैसे के लिये कार्य करना पड़ रहा है, मैं बुजुर्गों को कोस नहीं रहा हूँ केवल अपनी बात रख रहा हूँ।

    अगर सही तरीके से निवॆश किया जाता तो मुझे अपना भविष्य चुनने की आजादी होती और मैं किसी थियेटर में कार्य कर रहा होता या कहीं नदी किनारे बैठकर कविता लिख रहा होता।

    आज भी वक्त है हमारे खुद के लिये कि हम चेत जायें और अपनी भविष्य की पीढ़ी को वो देने की कोशिश करे जो हमें नहीं मिला, कम से कम उनको तो धन के लिये कार्य नहीं करना पड़े और वे अपने मनोनुकूल अपनी राह चुन सकें नहीं तो उनकी भी जिंदगी केवल धन कमाने में निकल जायेगी।

    ये मेरे विचार हैं और आजकल ये प्रश्न बहुत ही तेजी से धाड़धाड़ करके दिमाग में कौंधता रहता है ।

गपोड़ी बेटेलाल की गप्प के किस्से ३१०७२०१०

    बेटेलाल को सुबह स्कूल के लिये बस पर छोड़ने जाते हैं तो कल उनकी एक मारक गप्प वहीं सुनी, लगभग ५ मिनिट मिलते हैं रोज जब मैं और मेरा बेटा बिल्कुल पास होते हैं, तो अभी दो दिन से स्कूल बस की जगह वीडियोकोच बस आ रही है, मैंने पूछा कि स्कूल बस कहाँ गई और ये वीडियोकोच बस क्यों आ रही है।
    तो बोले कि दो दिन पहले जब हम स्कूल से घर की ओर आ रहे थे तो हमारे स्कूल के ग्राऊँड में से अचानक धुआँ आने लगा तो पता चला कि बस जल गई, हमने कहा ऐसा क्या, चलो फ़िर तो बस अभी आयेगी तो पूछ लेंगे, तो बोलते हैं
“नहीं डैडी, मत पूछना प्लीज”
मैंने कहा “नहीं उससे पूछना पड़ेगा, कि कैसी बसें चलाते हो स्कूल के लिये”
बेटेलाल बोले “डैडी स्कूलबस नहीं जली थी, मैं तो बस ऐसे ही बोल रहा था” “उल्लू बनाया चरखा चलाया”
पर वीडियोकोच बस में बैठे हुए सारे बच्चे बहुत खुश नजर आते हैं।
 

प्रात:भ्रमण के दौरान “मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे…”

    आज सुबह घूमने के दौरान कुछ पुरानी यादें ताजा हो गईं, घूमते हुए एक वृद्ध सज्जन के पास से निकले तो उनके जेब में रखे मोबाईल से गाना बज रहा था “मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे…”, हमें अपने घर की याद आ गई, क्योंकि हमारे पापा और मम्मी जी को भी यह गाना बहुत पसंद है, और मुझे भी, शास्त्रीय संगीत पर आधारित (मेरे ज्ञान के अनुसार) गाना लाजबाब है।

कोहिनूर (1960) फ़िल्म के इस  गाने का लुत्फ़ उठाईये –

अंधेरी में ज्ञान पाने के लिये मुंबई के २ २ मिनिट की कीमत बारिश के बीच जद्दोजहद …. विवेक रस्तोगी

    आज अंधेरी में जागोइन्वेसटर पाठक मिलन था, समय तय किया गया था सुबह १० बजे से दोपहर २ बजे तक । क्लास रुम का जितना भी खर्च आना था वह सबको साझा करना था। सही मायने में वित्तीय प्रबंधन शिक्षा के लिये यह मुंबई में शुरु किया गया एक प्रयास है। जागोइन्वेस्टर.कॉम ब्लॉग मनीष चौहान लिखते हैं।

   तो सुबह ९ बजे घर से निकल पड़े थे क्योंकि अंधेरी पहुँचने में पुरे ४५ मिनिट का अनुमान लगाया था। ९ बजे नहीं निकल पाये हम निकल पाये ९.०५ बजे घर से और हाईवे तक पैदल बस स्टॉप पर ९.०८ बजे पहुँच गये। वहाँ जाकर बोरिवली स्टेशन की बस पकड़ी, हमारा अनुमान था कि लगभग ९.१७ बजे तक हम बोरिवली स्टेशान पहुँच जायेंगे।

    बोरिवली से कांदिवली ३ मिनिट, कांदिवली से मालाड ४ मिनिट, मलाड से गोरेगांव ४ मिनिट, गोरेगांव से जोगेश्वरी ६ मिनिट और जोगेश्वरी से अंधेरी लगभग ३ मिनिट लगता है, याने कि बोरिवली से अंधेरी २० मिनिट लगते हैं।

  और फ़िर हमें टिकट भी लेना था क्योंकि हम रोज लोकल ट्रेन में तो जाते नहीं हैं, हमारे पास रेलकार्ड है, जिसे कि रेल्वे स्टेशन पर लगे टर्मिनल से फ़टाफ़ट टिकट लिया जा सकता है। हमने रिटर्न टिकट लिया मतलब बोरिवली से अंधेरी जाने का और वापस बोरिवली आने का।

    फ़िर वहीं लगे उद्घोषणा टीवी पर देखा कि ९.२१ की चर्चगेट स्लो तीन नंबर प्लेटफ़ॉर्म और ९.२५ की चर्चगेट फ़ास्ट दो नंबर प्लेटफ़ार्म पर थी। हम फ़टाफ़ट दौड़ते हुए २-३ प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचे और ब्रिज से ही देखा कि ९.२१ की ट्रेन तो नदारद थी लगा कि चली गई परंतु भीड़ देखकर और इंडिकेटर पर ९.२१ का समय देखकर अंदाजा लगाया  कि ट्रेन लेट है। हमें तो अंधेरी तक ही जाना था तो हम ९.२५ की लोकल में चढ़ लिये।

  सेकंड क्लॉस के डिब्बे में बहुत दिन बाद चढ़े थे, अरे लोकल में ही बहुत दिनों बाद चढ़े थे और पीक समय था पर शनिवार होने के कारण चढ़ने को मिल गया था। अंदर घुसते ही पीछे से धक्का पड़ा और आवाज आई “अंदर दबा के चलो …. ” “भाईसाहब जरा धक्का मारकर !!!”, हम हाथ में छाता और अपनी किताब कापी पकड़े भीड़ में दुबके खड़े थे, जो गेट पर खड़े थे वो हर स्टॆशन पर दरवाजे की जनता का बराबर तरीके प्रबंधन कर रहे थे, “ए कांदिवली वालों को चढ़ने दे रे, जगह दे रे…”, “ऐ मालाड चलो आओ रे, ऐ इस तरफ़ से नहीं चढ़ने का” “ चल दबाके अंदर होले…”

    फ़िर जोगेश्वरी निकला और हम भी गेट के पीछे की भीड़ में लाईन में खड़े हो लिये और आगे वाले से पूछ कर आश्वस्त हो लिये “अंधेरी….” तो उसने धीरे गर्दन “हाँ” में हिला दी, और बाहर बारिश अपने पूरे जोरों से शुरु हो चुकी थी, ऐसी बारिश मुंबई के लिये थोड़ी अच्छी नहीं होती क्योंकि मुंबई में बारिश का पानी भर जाता है।

    जैसे ही अंधेरी स्टेशन आया तो आवाज आई “ऐ चल उड़ी मार उड़ी…” और जब तक ट्रेन स्टेशन पर रुकती तब तक तो हम भी प्लेटफ़ॉर्म पर थे। बारिश पूरे जोरों पर थी, हमने एक ओर पाठक से ९.४५ पर मिलना तय किया था, अंधेरी स्टेशन के एक्सिस बैंक के ए.टी.एम. के पास, वो हैं आशुतोष तिवारी जो कि हिन्दी ब्लॉगर भी हैं उनका ब्लॉग है मेरी अनुभूतियाँ । जोरों की बारिश में हम चल दिये अपने गंतव्य की ओर।

    वहाँ जाकर ४ घंटॆ कैसे निकल गये पता ही नहीं चला, गजेन्द्र ठाकुर जो कि सी.एफ़.पी. भी हैं, उन्होंने म्यूचयल फ़ंड पर इतनी अच्छी जानकारियाँ जुटाई थीं, कि समय का पता ही नहीं चला। अब अगली मीटिंग का दिन २८ अगस्त का है जिसमें एस.आई.पी., एस.टी.पी और एस.ड्ब्ल्यू.पी. पर जानकारी साझा की जायेगी।

सिगरेट का असली नशा तो धुआँ अंदर लेने पर ही होता है, और असली नुक्सान भी। …. अपने किस्से … विवेक रस्तोगी

    कॉलेज के मेनगेट पर शटर के पास बैठकर दो विल्स मुँह में दबाई और चपरासी काका से शिप माचिस ली फ़िर उसमें से एक तीली निकाली और आग लगाने के लिये जैसे ही माचिस पर घर्षण करने वाले थे कि प्रिंसिपल सर आते दिखे, चुपचाप माचिस साईड में रखी, दोनों विल्स सिगरेट एक हाथ में पीछे दबाई और प्रिंसिपल सर जैसे ही पास आये दूसरे हाथ से झुककर चरण स्पर्श किये, और प्रिंसिपल सर अंदर अपने रुम में चले गये।

    फ़िर वापिस से दोनों विल्स मुँह में और माचिस की तीली घर्षण के लिये अग्रसर, और एक सर्र की आवाज से तीली जली और मुँह में लगी दोनों विल्स सिगरेट में जोर से अंदर कश मारा, जिससे दोनों विल्स सिगरेट एक बार में ही जल ली।

    एक विल्स सिगरेट अपने दोस्त को दी और दूसरी अपने मुँह में दबाये कश खींचे जा रहे थे, तब सिगरेट पीनी तो आती नहीं थी, बस झांकीबाजी करते थे, मुँह में धुआँ लेकर नाक से निकालने को ही सिगरेट पीना समझते थे।

हमारे एक सीनियर आये जो कि अच्छॆ मित्र भी थे, बोले “ऐ क्यों सिगरेट खराब कर रहे हो”

हम बोले “क्यों”

सीनियर बोले “बताओ हम बताते हैं कि सिगरेट कैसे पीते हैं”

    और उन्होंने हमारे हाथ से सिगरेट ली और कश अंदर खींचा और धुएँ का तो अता पता ही नहीं था बोले धुआँ पेट में अंदर तक लो तभी तो नशे का मजा आयेगा। फ़िर थोड़ी देर बाद अपने पेट में से पता नहीं कैसे पूरा धुआँ मुँह से बाहर निकाला। हम तो देखकर ही दंग रह गये, कि ऐसा भी होता है।

सीनियर बोले “अब ऐसा करके बताओ”

हम बोले “लाओ, हम भी करके देखते हैं”

    फ़िर जो सुट्टा मारा तो जो खाँसे कि बस आँखें लाल और आँखों से पानी बाहर, सिगरेट पीने का अभ्यास बहुत ही महँगा सा लग रहा था। पर माने नहीं, केवल दो दिन की सिगरेट प्रेक्टिस के बाद उस्तादी हो गई।

    साथ ही हमें सीनियर ने बताया कि सिगरेट का असली नशा तो धुआँ अंदर लेने पर ही होता है, और असली नुक्सान भी।

चांसलर सिगरेट के कसैलेपन से विल्स तक का सफ़र और ऐश की परिभाषा…

    चांसलर सिगरेट लेकर टेकरी के पीछे छुपते हुए दोनों साईकिल से जाते थे…… किसी पहाड़ी में छिपकर रोज वो चांसलर सिगरेट जो गहरे चाकलेटी रंग की होती थी…थोड़ी मीठी सी लगती थी … पर दो-चार कश लेने के बाद फ़िर कड़वी लगने लगती थी… क्यों वो बाद में पता चला .. सिगरेट तो पीनी आती नहीं थी ….. पहले कश में ही सिगरेट का फ़िल्टर अपनी जीभ से गीला कर देते थे और फ़िर वो कसैलापन मुँह में चढ़ता ही जाता ।

    सिगरेट के जलते हुए सिरे को देखते हुए उस सिगरेट को खत्म होते देखते थे… सिगरेट का धुआँ और उसकी तपन शुरु में असहनीय होती थी… बाद में पता चला कि जब सिगरेट जलती है और जो आग उस सिगरेट को ऐश में बदलती है उसका तापमान १०० डिग्री होता है… पहली बार हमारे भौतिकी विज्ञान के प्रोफ़ेसर ने बताया था कि इसे ऐश कहते हैं…

    हम तब तक जिंदगी के मजे लेने को ही ऐश समझते थे, पर उस दिन हमें असलई ऐश समझ आई कि सिगरेट की राख जो कि जिंदगी को भी राख बना देती है, उसे ऐश कहते हैं… पता था कि ऐश करना अच्छी बात नहीं है… परंतु बहुत देर बाद समझ में आई ये बात…

    एक मित्र था कालिया कहता था कि किसी भी नये शहर में जाओ तो सिगरेट और दारु से दांत काटे मित्र बड़ी ही आसानी से बन जाते हैं, किसी भी पान की गुमटी को अपना अडडा बना लो और फ़िर देखो …. जब शहर बदला तो यही फ़ार्मुला अपनाया और चांसलर छोड़ विल्स के साथ बहुत से दोस्त बनाये…

    अब लगता है वो ऐश खत्म होने से अच्छी दोस्ती खत्म हो गई, लोग आपस में बात करने के लिये समय नहीं निकाल पाते… कम से कम ऐश करते समय आपस में पाँच मिनिट बतिया तो लेते हैं…

पर क्या करे हम ऐश करना छोड़ चुके हैं…. पर वो चांसलर का कसैलापन अभी भी याद है…

हमारे घर में नया मेहमान आया है… :) :D

    आज शाम को हमारे घर में एक नया मेहमान आया है, बिटिया आई है, मेरे छोटे भाई शलभ को आज बिटिया की प्राप्ति हुई, बहु दिल्ली में ही थी और भाई शाम की फ़्लाईट पकड़ कर दिल्ली पहुँचा है।

    कितना रोमांचकारी पल होता है पिता बनने का, उससे बात करने से ही पता चल रहा था, जब बिटिया इस दुनिया में आई तो हमारा भाई फ़्लाईट में था, तो हमने तुरंत एक एस.एम.एस. कर दिया … [Congrats Dad !! bitiya ghar me aayi hai, khushiya lai hai :)]

    जब भाई के प्लेन दिल्ली में उतर गया तो जैसे ही मोबाईल खोला हमारा एस.एम.एस. मिलने से उसे पता चला और तब तक तो हम लगभग सभी अपने परिचितों को एस.एम.एस. या फ़ोन कर चुके थे।

    घर पर बात हुई तो मम्मी बोली कि अब तो ताऊ बन गये हो, और घर में बिटिया आई है, अब घर में रक्षाबंधन का त्यौहार भी मना करेगा। हम खुशी के मारे कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। बहुत ही सुन्दरतम एहसास होता है घर में नये मेहमान आने का और वो भी प्यारी बिटिया रानी के आने का।

गपोड़ी बेटेलाल की गप्प के किस्से १८०७२०१०

शाम को पार्क में घुमाने ले गये तो बेटेलाल की गप्प सुनिये –

हमारे स्कूल में रोज कराटॆ करवाते हैं और कराटे करवाते हुए २ किमी दौड़ते हैं।

मैंने पूछा और कराटॆ मॆं फ़र्स्ट कौन आता है, तो बोले “कराटे में नहीं दौड़ में, हमेशा मैं फ़र्स्ट आता हूँ, और हमारे सर इतना तेज दौड़ते हैं, तब भी मेरे पीछे रह जाते हैं”

“फ़िर दौड़ ४० किमी की हो जाती है और ४० किमी की दौड़ खत्म होते ही ७० किमी की हो जाती है, फ़िर नदी आ जाती है, तो सर कहते हैं कि उड़ के पार कर लो”

मैंने पूछा “उड़के !”

तो बेटेलाल बोले “हाँ सर कहते हैं कि दोनों हाथों को पंख बनाकर उड़ाते हैं, और पैर से किक मारते हैं, तो उड़ने लगते हैं”

आज से गपोड़ी किस्से शुरु किये हैं। जिससे बचपन के किस्से जो हम भूल जाते हैं, वो लिखित में हमेशा मेरी पास यादें बनकर मेरे पास और आपके पास रहें।

INR Logo  ॓यह रुपये का नया रुप है क्या दिखाई देता है। हमने INR Font डाऊनलोड किया है। अगर यहाँ नहीं दिखाई दे तो चित्र लगा देते हैं।

पॉवर-पैक जींस जिसकी जेब में 220 वोल्ट बिजली दौडती है

सोचिये अगर कोई जेबकतरा आपकी जींस की जेब में आपका पर्स निकालने के लिये हाथ डालता है तो उसे 22o वोल्ट का बिजली का झटका लगता है, जी हाँ यह विशेष जींस तैयार की है वाराणसी के हाईस्कूल फ़ेल नौजवान ने, जो कि विज्ञान के सामान्य सिद्धांत पर आधारित है।

जींस को तैयार किया है श्याम चौरसिया ने जो कि वाराणसी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। यही नहीं वे कहते हैं कि अगर उनके अनुसार थोड़े से सुधार और किये जायें तो आपके सारे कपड़े ही “पॉवर-पैक” हो जायेंगे।

जिस भी कपड़े को “पॉवर-पैक” करना हो उसमें एक छोटी सी बैटरी से चलने वाली किट लगानी होगी।

श्याम चौरसिया का कहना है कि “जब मैंने यह तैयार की थी तो केवल जेबकतरों को ही ध्यान में रखा था, पर अगर इसे लड़्कियों की टी शर्ट और कपड़ों में भी लगा दें तो छेड़खानी के मामले रुक सकते हैं।”

अब अगर आपको लगता हो कि ये बैटरी से चलने वाला अविष्कार महँगा होगा, तो नहीं बिल्कुल नहीं केवल तीन सौ रुपये खर्च करने होंगे और अगर और उन्नत तकनीक चाहिये तो १०० रुपये ज्यादा खर्च करना होंगे।

ज्यादा जानकारी यहाँ पढ़ सकते हैं।

क्या आपको हिन्दी वर्णमाला आती है ? [ Do you know Hindi Alphabets]

जब से मेरा बेटा पढ़ना सीख रहा है, मुझे भी वापस पूरी हिन्दी वर्णमाला याद हो गई है।अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अ:
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड़ ढ ण
त थ द ध न
प फ़ ब भ म
य र ल व स श ष ह
क्ष त्र ज्ञ

हमने याद किया कि हमें आखिरी बार वर्णमाला कब याद थी, तो याद आया कि स्नातकोत्तर संस्कृत में हमने यह पढ़ा था, पर किसी कारणवश हम उपाधि नहीं ले पाये थे। फ़िर अपने मोबाईल पर वर्णमाला मिली, पर उस समय हमें वर्ग याद रहता था, फ़िर बाद में वर्ग भी भूल जाते थे।

और सुधिजन विद्वान बतायें कि क्या यह हिन्दी वर्णमाला पूर्ण है, क्योंकि आजकल कुछ नये शब्द इसमें जोड़े जा रहे हैं, जो कि मुझे पच नहीं रहे हैं।
जैसे कि – ड़, ढ़, श्र

आप बताईये क्या आपको हिन्दी वर्णमाला आती है ?