सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४२ [चम्पानगरी जाते हुए प्रकृति का सुन्दर चित्रण… ]

    दूसरे दिन ही मैं और शोण दोनों हस्तिनापुर से चल दिये। यात्रा बहुत लम्बी थी इसलिए हमने श्वेत घोड़े लिये। हम दोनों को ही अब अश्वारोहण का अच्छा अभ्यास हो गया था। मुझे तो सब प्राणियों मॆं अश्व बहुत ही अच्छा लगता था। वह कभी नीचे नहीं बैठता है । सोते समय भी वह […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४१ [कर्ण के गुरु और चम्पानगरी जाने की उत्कण्ठा… ]

   बहुत दिन हो गये थे। मैं जब से हस्तिनापुर आया था, तब से केवल एक बार ही चम्पानगरी गया था। वह भी उस समय जब गुरुदेव द्रोण ने अपने शिष्यों की परीक्षा ली थी। उसके बाद पाँच वर्ष बीत गये थे। इच्छा होने पर भी इन पाँच वर्षों में मैं एक भी बार चम्पानगरी […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४० [यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य द्वारा मेरे लाये गये चीते को यज्ञ के लिए निषिद्ध बताना….]

    वह झपटकर दूर हट गया। अब मैंने उसपर भयंकर आक्रमण करना प्रारम्भ किया। एक के बाद एक। बँधी हुई मुट्ठी के सशक्त प्रहार उसकी पीठ पर, पेट पर, गरदन पर, जहाँ स्थान मिला वहीं पर करने लगा। वह अब पहले से अधिक बौखलाया हुआ-सा मुझपर आक्रमण करने लगा। लगभग दो घड़ी तक हम दोनों […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३९ [यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य की एक विचित्र प्रथा और मेरा बाघ को लाने का प्रण.. ]

    प्रत्येक वर्ष के अन्त में युद्धशाला में एक विशाल यज्ञ हुआ करता था। उस यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य ने एक विचित्र प्रथा चला रखी थी। युद्धशाला के प्रत्येक शिष्य को यज्ञ में बलो देने के लिए एक-एक जीवित प्राणी अरण्य से पकड़कर लाकर अर्पण करना पड़ता था। किसी ने उनसे उस प्रथा के […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३८ [कर्ण और भीम के बीच का रोचक प्रसंग..]

    एक बार मैं और अश्वतथामा दोनों खड़ग के अखाड़े के पास खड़े थे। उस अखाड़े के चारों ओर सब्बल-जैसी मोटी-मोटी लोहे की छड़ों की चहारदीवारी थी। उस चहारदीवारी की एक छड़ की नोक को किसी ने झुकाकर धरती पर टेक दिया था। वह उसी स्थिती में थी। वही एकमात्र छड़ उस चहारदीवारी से बाहर […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३७ [अश्वत्थामा द्वारा कर्ण को कर्ण का सौंदर्य वर्णन.. ]

   अश्वत्थामा पर मेरा जो प्रेम था, उसका रुपान्तर अब प्रगाढ़ स्नेह में हो गया था। समस्त हस्तिनापुर में वही एकमात्र मेरा प्राणप्रिय मित्र बन गया था।   एक बार हम दोनों गंगा के किनारे बैठे बातें कर रहे थे। अकस्मात सहज रुप में उसने कहा, “कर्ण, तुम मुझको अच्छे लगते हो, इसका कारण केवल […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३६ [कर्ण का तारुण्य… यौवन के रथ के पाँच घोड़े.… पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा, निर्भयता, अभिमान और औदार्य ]

     तारुण्य ! जवलन्त धमनियों का अविरत स्पन्दन । प्रकृति द्वारा मानव को प्रदत्त सबसे श्रेष्ठ वरदान। जीचन के नगर का एकमात्र राजपथ। प्रकृति के साम्राज्य का वसन्त, मन-मयूर के पूर्ण फ़ैले हुए पंख, विकसित शरीर-भुजंग का सुन्दर चितकबरा फ़न, भावनाओं के उद्यान का सुगन्धित केवड़ा, विश्वकर्ता के अविरत दौड़नेवाले रथ में सबसे शानदार घोड़ा, […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३५ [युवराजों के कारनामे बताता कर्ण…]

     शाला के अन्य युवराज-शिष्यों की स्थिति इसके विपरीत थी। कृपाचार्य और द्रोणाचार्य दोनों का अत्यन्त लाड़ला था युवराज अर्जुन। वह अकेला ही क्यों प्रिय है, इसलिए युवराज दुर्योधन जान-बूझकर कोई अन्य कारण ढूँढ़कर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता। उसक पर्यावसान झगड़े में होता। अपने भाई को छेड़ने के कारण भीम को क्रोध […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३४ [कर्ण की अपने गुरु के प्रति श्रद्धा…..]

       काल के वायु के साथ ही ऐसे दिन और रात के अनेक सूखे-हरे पत्ते उड़ गये। प्रतिदिन प्रत्युषा में उठना, गंगा में जी भरकर डुबकियाँ लगाना, प्रात:काल से दोपहर तक, जबतक पीठ अच्छी तरह गरम न हो जाये, गंगा में रहकर ही सूर्यदेव की आराधना करना, दिन-भर युद्धशाला में शूल, तोमर, शतघ्नी, प्रास, भुशुण्डी, […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३३ [द्वन्द्वयुद्ध के दाँव….]

     छह वर्षों का समय तो ऐसे उड़ गया जैसे पक्षियों का झुण्ड उड़ जाता है। उसका पता भी न चला। युद्धशास्त्र में कुछ भी सीखना शेष नहीं बचा। बल्कि मैंने और शोण ने रात में जो अतिरिक्त अभ्यास किया था, उसके कारण हमने प्रत्येक शास्त्र के कुछ ऐसे विशिष्ट कौशल सीख लिये थे जो […]
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